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सवाल है कि सूरत बदले

उन्नाव बलात्कार कांड में कोर्ट ने पूर्व बीजेपी नेता कुलदीप सिंह सेंगर को दोषी ठहरा दिया है। यानी कहा जा सकता है कि इस मामले में कम से कम सीमित अर्थों में न्याय हुआ है। लेकिन ये इंसाफ बहुत महंगी कीमत चुकाने के बाद हासिल हुआ। इस क्रम में पाड़िता का पूरा परिवार बर्बाद हो गया। चूंकि मामला मीडिया में उठता रहा, इसलिए सेंगर तक कानून के हाथ पहुंचे। मगर अक्सर बलात्कार कांडों में ऐसा नहीं होता। इस बात की तस्दीक राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े भी करते हैं। उनके मुताबिक दिल्ली के निर्भया सामूहिक बलात्कार के सात साल बाद भी देश में बलात्कार के मामलों में आरोपी के दोषी ठहराए जाने की दर सिर्फ 32.2 प्रतिशत है। इस घटना के बाद यौन उत्पीड़न से निपटने के लिए कानूनों को सख्त बनाये जाने के बावजूद बलात्कार के मामलों में दोषसिद्धि दर कम है। 2017 के एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार, 2017 में बलात्कार के मामलों की कुल संख्या 1,46,201 थी, लेकिन उनमें से केवल 5,822 लोगों को ही दोषी ठहराया जा सका। 2017 में मेट्रोपॉलिटन शहरों में भी बलात्कार के मामलों में दोषसिद्धि दर कम थी। हाल के वर्षों में बलात्कार के मामलों में दोषसिद्धि दर बढ़ी भी है, तो आरोपपत्र (चार्जशीट) दायर करने की दर कम हो गई है। यानी समस्या दूसरी जगह शिफ्ट हो गई है।

एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक, 2017 में चर्जशीट दायर करने की दर 86.4 फीसदी थी, जबकि 2013 में यही दर 95.4 फीसदी थी। 2017 में बलात्कार के कुल 1,46,201 मामलों की सुनवाई हो रही थी, लेकिन इसमें से 18,333 मामलों का ही अदालतों ने निपटारा किया। जानकारों का कहना है कि बलात्कार मामलों की जांच करने वाले पुलिस के क्षेत्रीय कर्मचारियों को अधिक कुशल बनाने की जरूरत है। अभी उप-निरीक्षक स्तर का अधिकारी आरोप पत्र दायर करता है। ऐसे में तथ्यों की गुणवत्ता सुनिश्चित नहीं हो पाती। 2012 में दिल्ली में 23 वर्षीय एक छात्रा से एक चलती बस में सामूहिक बलात्कार किया गया था। सड़क पर फेंके जाने से पहले उस पर गंभीर रूप से हमला किया गया था। बाद में उसकी मौत हो गई थी। इस भयानक कांड के बाद बलात्कार के कानून को सख्त बनाया गया। लेकिन उससे सूरत ज्यादा नहीं बदली है। अभी हैदराबाद कांड से फिर इस मुद्दे पर बहस छिड़ी। लेकिन असल में सूरत कैसे बदले, ये सवाल कायम है।

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