संकट में फंसा डब्ल्यूटीओ

नए साल में एक अहम सवाल ये उठा है कि अब विश्व व्यापार संगठन का क्या भविष्य रह गया है? ये संगठन संकट में है। इस बात की पुष्टि एक नए अध्ययन से भी हुई है। इस स्टडी को एक जनवरी को इस संगठन की स्थापना के 25 साल पूरे होने के मौके पर जारी किया गया। जिनेवा से चलने वाले इस संगठन पर अमेरिका लगातार दबाव बना रहा है। अमेरिका का कहना है कि डब्ल्यूटीओ उसके प्रतिद्वंदी देशों को आगे बढ़ाने के हिसाब से नियम बना रहा है। इन नियमों का नुकसान अमेरिका को हो रहा है। डब्ल्यूटीओ के नियम वैश्विक व्यापार में एक सर्वोच्च अदालत के फैसलों की तरह होते हैं। यही वजह है कि अमेरिका ने डब्ल्यूटीओ के नए अपील जज की नियुक्ति के पिछले दो साल से अटकाया हुआ है। इसके चलते दिसंबर की शुरुआत में डब्ल्यूटीओ में सिर्फ एक ही जज रह गया है। जबकि किसी भी व्यापारिक विवाद पर फैसला देने के लिए कम से कम तीन जजों का होना जरूरी है। इसी वजह से फिलहाल किसी विवाद पर फैसला नहीं दिया जा सका है। दूसरे देशों की भी डब्ल्यूटीओ के काम के तरीके को लेकर शिकायतें रहती हैं।

आलोचकों का कहना है कि यहां पर किसी भी विवाद का फैसला होने में बहुत ज्यादा समय लग जाता है। साथ ही चीन जैसी अर्थव्यवस्थाओं द्वारा किए जाने वाले नियमों के उल्लंघनों की जांच करने और उस पर कार्रवाई करने के लिए संगठन के पास जरूरी संसाधन भी नहीं हैं। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि इस संगठन के दो सबसे बड़े सदस्य चीन और अमेरिका अपने व्यापार विवादों को संगठन की सीमा से बाहर आपसी स्तर पर ही निपटा रहे हैं। इस संगठन को जल्दी से खुद को अपडेट करना चाहिए। नियमों को लागू किए बिना कोई भी नियम आधारित संगठन लंबे समय तक नहीं चल सकता है। रिपोर्ट के मुंताबिक विश्व के तीन सबसे बड़े निर्यातक देश जर्मनी, चीन और अमेरिका को विश्व व्यापार संगठन का सदस्य होने का सबसे ज्यादा फायदा मिला है। बेर्टेल्समान फाउंडेशन की 30 दिसंबर को जारी हुई एक रिपोर्ट के मुताबिक डब्ल्यूटीओ के नियमों के मुताबिक होने वाले व्यापार से सबसे ज्यादा कमाई इन तीन देशों ने की है। इस संगठन की खासियत यह है कि यहां फैसला आम सहमति से होता है। अब देखना है कि जिस हाल में यह फंस गया है, वहां से यह निकल पाता है या नहीं।

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