ट्रंप की निष्ठा या चाल?

जिस रोज अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन ने ये पोल खोली कि जापान के ओसाका शहर में हुई जी-20 की बैठक के दौरान ट्रंप ने चीनी राष्ट्रपति के सामने यह कह दिया था कि उइगुर मुस्लिम अल्पसंख्यकों का दमन सही कदम है, उसी रोज ट्रंप ने को एक नए कानून पर हस्ताक्षर किए। इस कानून के मुताबिक चीन में उइगुर मुसलमानों के साथ सामूहिक उत्पीड़न करने वाले अधिकारियों पर प्रतिबंध लग जाएगा। नए कानून के तहत अमेरिकी प्रशासन को उन चीनी अधिकारियों पर कार्रवाई का प्रावधान दिया गया है, जो चीन में उइगरों के उत्पीड़न के लिए जिम्मेदार हैं। 2016 से ही चीन की सरकार उइगुर मुसलमानों को गिरफ्तार कर कैंपों में रख रही है। आधिकारिक तौर पर इन कैंपों को वोकेशनल एजुकेशन ट्रेनिंग सेंटर कहा जाता है। लेकिन आलोचक इसे हिरासत कैंप ही कहते हैं। उनका कहना है कि इन कैंपों में उइगुर मुसलमानों की पहचान खत्म करने की कोशिश हो रही है। ये मुद्दा वैसे तो काफी चर्चित रहा है, लेकिन नए अमेरिकी कानून से इस पर नए सिरे से दुनिया का ध्यान गया है। मगर इसके साथ ही उइगुर मुसलमानों के पक्ष में खड़े होने के ट्रंप प्रशासन के इरादे पर नए संदेह खड़े हो गए हैं।

बोल्टन ने अपनी नई किताब में जो बताया है, उससे यह संदेश मिला है कि ट्रंप का ताजा कदम उनके चीन विरोधी नए आक्रामक रुख का हिस्सा भर है, जिसका मकसद अगला चुनाव जीतना है। ट्रंप चीन को खतरा बताकर अमेरिका में मतदाताओं की गोलबंदी करने के प्रयास में जुटे हुए हैं। नए कानून को अमेरिकी कांग्रेस ने लगभग सर्वसम्मति से पारित किया था। इस पर दस्तखत करते हुए डॉनल्ड ट्रंप ने कहा कि यह कानून मानवाधिकारों के उल्लंघन और अपमानजनक शिविरों के व्यवस्थित इस्तेमाल के उल्लंघन करने वाले अधिकारियों को जवाबदेह ठहराएगा। उइगुर और अन्य अल्पसंख्यकों के साथ जबरन श्रम कराने, उन पर निगरानी करने, जातीय पहचान और धार्मिक मान्यताएं खत्म कराने के लिए जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई का प्रावधान इस कानून में है। इस कानून में प्रावधान है कि अमेरिकी प्रशासन को यह निर्धारित करने की जरूरत होगी कि उइगर और अन्य अल्पसंख्यकों के दमन के लिए कौन चीनी अधिकारी जिम्मेदार हैं। कानून के मुताबिक उत्पीड़न करने वाले चीनी अधिकारियों की संपत्ति जब्त कर ली जाएगी और उनकी अमेरिका में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया जाएगा।

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