तो जो बाइडेन क्या करें?

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राष्ट्रपति की मंशा समाज में गुस्से को बढ़ाने के बजाय सबको साथ लेकर चलने की है। इसलिए वे टकराव के बजाय समझौते का रुख अपनाए हुए हैं। मगर इससे रिपब्लिकन पार्टी पर कोई फर्क पड़ रहा है, अगर इसका कोई भ्रम किसी को रहा भी हो, तो वह पिछले हफ्ते टूट गया होगा।

अमेरिका में आज विडंबना यह है कि पिछले नवंबर में हुए राष्ट्रपति चुनाव के बाद पराजित रिपब्लिकन पार्टी आक्रामक मुद्रा में है, जबकि राष्ट्रपति जो बाइडेन और उनकी डेमोक्रेटिक पार्टी बच-बचा कर चलने में यकीन कर रही है। कुछ जानकारों ने कहा कि राष्ट्रपति की मंशा समाज में गुस्से को बढ़ाने के बजाय सबको साथ लेकर चलने की है। इसलिए वे टकराव के बजाय समझौते का रुख अपनाए हुए हैं। मगर इससे रिपब्लिकन पार्टी पर कोई फर्क पड़ रहा है, अगर इसका कोई भ्रम किसी को रहा भी हो, तो वह पिछले हफ्ते टूट गया होगा। रिपब्लिकन पार्टी ने बीते छह जनवरी को कैपिटॉल हिल यानी अमेरिकी संसद भवन पर हुए हमले की जांच के लिए आयोग के गठन के प्रस्ताव को रोकने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी। उसने सीनेट में फिलिबस्टर का नियम लागू कर दिया। नतीजा हुआ कि 100 सदस्यों वाले सदन में 54 वोट मिलने के बावजूद येप प्रस्ताव गिर गया। उसके बाद समाज में बढ़ी बेचैनी के बीच टीकाकारों ने कहा कि आज अमेरिका की एक प्रमुख पार्टी लोकतंत्र को खत्म करने पर आमादा हो गई है।

ये बात सच है कि अगर किसी देश में अपने संसद भवन पर हुए हमले की जांच को लेकर आम सहमति नहीं बन सकती, तो साफ मतलब है कि वह देश गहरे संकट में है। हकीकत यह है कि नवंबर के चुनाव के सात महीने बाद भी रिपब्लिकन पार्टी पर पूर्व राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की पूरी पकड़ बनी हुई है। ट्रंप समर्थक सोशल मीडिया के जरिए जो फेक न्यूज फैलाते हैं, उसका असर रिपब्लिकन पार्टी के समर्थकों में बढ़ता ही गया है। क्या यह हैरतअंगेज नहीं है कि एक नए जनमत सर्वेक्षण में रिपब्लिकन समर्थकों के बहुमत ने राय जताई कि कैपिटॉल हिल पर हमला ट्रंप के समर्थकों ने नहीं, बल्कि वामपंथी चरमपंथियों ने हमला किया था? उन्होंने कहा कि वामपंथियों ने ट्रंप को बदनाम करने के लिए ये हमला किया। जब पार्टी समर्थकों में ऐसी राय हावी हो, तो स्वाभाविक है कि रिपब्लिकन पार्टी के नेता वैसी बातों का भी समर्थन कर रहे हैं, जो संभव है कि उनके अपने विवेक खिलाफ हो। तो अब बाइडेन क्या करेंगे? अब उनके समर्थक मानने लगे हैं कि समझौते की राह पर चलते हुए वे पिछले चुनाव में बनी सियासी पूंजी को लुटा देंगे। उन्हें अब टकराव की कीमत पर भी आक्रामक रुख अपनाना होगा। शायद अब यही सही रास्ता है।

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