चिंता का पहलू दूरगामी है


उत्तराखंड में हुए ताजा हादसे को देखें तो नुकसान के लिहाज से इसे बहुत बड़ी घटना नहीं माना जाता। इसके बावजूद इसकी खबर दुनिया भर में सुर्खियों में छायी हुई है, तो इसलिए कि इससे जुड़े पहलू का असर दूरगामी10 हो सकता है। यह तय नहीं है कि हादसा ग्लेशियर के फटने से हुआ, या हिमस्खलन से। लेकिन अगर ग्लेशियर का पहलू इसमें है, तो फिर यह बेशक सारी दुनिया के लिए चिंता की बात है। फिलहाल इस बारे में अनुमान ही लगाए जा रहे हैं कि आखिर अलकनंदा और धौलीगंगा नदियों में अचानक पानी का स्तर बढ़ने के पीछे क्या कारण था। जानकारों का अनुमान है कि संभव है कि नंदा देवी ग्लेशियर में बनी एक प्राकृतिक झील फट गई होगी और उसमें जमा पानी अचानक नीचे आ गया होगा। ग्लेशियर बर्फ के बड़े बड़े टुकड़े होते हैं, जो अक्सर नदियों के उद्गम पर स्थान होते हैं। इन्हें हिमनदी या बर्फ की नदी भी कहा जाता है। लेकिन ये जमीन पर बनते हैं ।

इनका आकार बदलता रहता है और इनकी बर्फ भी पिघलती रहती है। ग्लेशियर बनते समय जमीन को काट कर उसमें गड्ढे बन जाते हैं। फिर पिघलती हुई बर्फ जब इन गड्ढों में गिरती है, तो उससे ग्लेशियल झीलें बनती हैं। इनमें अक्सर काफी पानी होता है। किसी वजह से जब ये झीलें फटती हैं, तो इनमें जमा पानी पहाड़ों के मलबे के साथ नीचे की तरफ गिरता है। इस समय जानकार यही अनुमान लगा रहे है कि इसी तरह की किसी झील के फटने से पानी और मलबा अलकनंदा नदी में गिर गया, जिसकी वजह से अचानक नदी में बाढ़ आ गई। घटना से दो दिन पहले उसी इलाके में हिमस्खलन हुआ था। इसलिए उसकी वजह से झील फटी हो, इस संभावना से इनकार नहीं किया जा रहा है। लेकिन अगर वाकई ग्लेशियर इस मौसम में पिघला और उसकी वजह से ग्लेशियल झील फटी है, तो यह पूरी दुनिया के लिए गंभीर चिंता का विषय है। बताया जाता है कि उत्तराखंड के जंगलों में पिछले कई महीनों से आग लगी हुई है। उसकी वजह से इलाके में काफी गर्मी पैदा हुई है। मुमकिन है कि आग की ताप से ग्लेशियर पिघला हो। वैसे भी जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियर खतरे में बताए जाते हैँ। क्या ये घटना जलवायु परिवर्तन के परिणामों एक भयानक रिहर्सल है, असल चिंता इस सवाल को लेकर है।


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