घर में ही हिंसा की शिकार

कहा जाता है कि घर वो जगह होता है, जहां आप निश्चिंतता महसूस कर सकें। यानी आपको आकर लगे कि आप सुरक्षित हैं और आप तनावमुक्ति महसूस करें। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि ये सुविधा या आराम महिलाओं को उपलब्ध नहीं है। अधिकांश घरों में वे तभी तक आजादी महसूस करती हैं, जब तक उनके पति घर में ना हों। अब चूंकि तालाबंदी है और सबको घर में रहने की मजबूरी है, तो बड़ी संख्या में महिलाओं पर मुसीबत टूट पड़ी है। पिछले दिनों राष्ट्रीय महिला आयोग ने कहा कि जिस दिन से तालाबंदी शुरू हुई, उस दिन से घरेलू हिंसा के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा ने कहा है कि उन्हें घरेलू हिंसा की शिकायत करते हुए आने वाले ईमेल की संख्या बढ़ गई है। यह आंकड़ा रोज बढ़ता ही जा रहा है। रेखा शर्मा ने कहा कि असली आंकड़ा उनके पास पहुंची शिकायतों से भी ज्यादा होगा, क्योंकि आयोग को अधिकतर शिकायतें ईमेल नहीं बल्कि डाक के जरिए आती हैं।

यानी ऐसा लगता है कि घरों में मार-पीट की प्रवृत्ति वाले पुरुष तालाबंदी में अपनी कुंठा महिलाओं पर निकाल रहे हैं। महिलाओं के अधिकारों के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं का कहना है कि उन्हें जगह जगह से घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं से यही सुनने को मिल रहा है कि अगर उन्हें तालाबंदी से पहले थोड़ा समय मिल जाता तो वे कहीं और चली जातीं। कार्यकर्ताओं ने सरकारी एजेंसियों से कहा कि ऐसे में सिर्फ एक ही उपाय है- शिकायतों पर ध्यान देना, पीडि़तों की समस्या को हल करना और अगर कुछ नहीं हो पा रहा हो तो उन्हें उनके घरों से निकाल कर किसी सुरक्षित स्थान पर पहुंचा देना। वैसे यह समस्या सिर्फ भारत की नहीं है। विश्व के अलग अलग हिस्सों में कई देशों से कोविड-19 की वजह से लागू की गई तालाबंदी या तालाबंदी के जैसे प्रतिबंदों की वजह से घरेलू हिंसा की शिकार महिलाएं हिंसा करने वालों के साथ एक तह से फंस गई हैं। साफ है कि तालाबंदी कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने में बेशक सहायक हो सकती है। पर इसने समाज के कई वर्गों के लिए मुश्किलें बढ़ा दी हैं। देश ने पहले देखा कि कैसे भूखे मर जाने के डर से प्रवासी श्रमिक अपने अपने गृह राज्य लौट जाने के लिए तालाबंदी के बीच पैदल ही निकल पड़े। अब खबर है कि तालाबंदी अनेक महिलाओं के लिए अभिशाप बन गई है।

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