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पुतिन जो चाहें, वो होगा!

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने एक बड़े संवैधानिक सुधार पर रूस की जनता की राय लेने के जनमत संग्रह की घोषणा की। लेकिन पुतिन ने ऐसा किसी संवैधानिक आवश्यकता के कारण नहीं, बल्कि अपने राजनीतिक लाभ के लिए ये कदम उठाया। उन्होंने ‘हां’ या ‘ना’ के एक सरल सवाल को एक अत्यंत पेचीदा मुद्दे के साथ जोड़ दिया। पुतिन ने रूस के नागरिकों से इस संवैधानिक संशोधन को पारित करने के बदले में ‘स्थिरता और सुरक्षा’ का वादा किया। बेशक वे अल्प- अवधि में दोनों ही वादे पूरे कर पाएंग, इस पर उनके राजनीतिक विरोधियों को भी कोई संशय नहीं है। लेकिन सवाल यह है कि यह किस कीमत पर होगा? संविधान में किए गए तमाम संशोधनों का हिसाब लगाया जाएगा, तो कुल मिला कर तस्वीर कैसी उभरेगी? जाहिर है, पश्चिमी और उदारपंथी देश इन संशोधनों और नकारेंगे। इसका असर इऩ देशों से रूस संबंधों पर पड़ेगा। दूसरी तरफ इस जनमत संग्रह में मिले समर्थन के आधार पर क्रेमलिन यानी पुतिन की सत्ता अपने शासन के मॉडल को आगे बढ़ाने के लिए और भी प्रोत्साहित होगी। यानी रूस में पहले से जारी तानाशाही अब और भी मजबूती से आगे बढ़ेगी।

खबरों के मुताबिक वे देश जिन्होंने 30 साल पहले सोवियत संघ से आजादी हासिल की, इस संवैधानिक सुधार को लेकर ज्यादा खुश नहीं हैं। उनके मुताबिक संशोधित संविधान के जरिए रूस एक फिर अपने साम्राज्यवादी मंसूबों की तरफ बढ़ सकता है। उक्रेन के हिस्से क्राइमिया को वह पहले ही हड़प चुका है। बहरहा, नए संविधान की अवधारणाओं में वही दिखता है, जो 20 साल से रूसी राजनीति की पहचान है। पुतिन अपनी शक्ति को और मजबूत करते जा रहे हैं। वे बीते बीस साल में उस निरंकुश व्यवस्था को मजबूत करते जा गए हैं, जिसका मकसद सिर्फ उनका हित साधना है। अब वे 2036 तक देश के राष्ट्रपति रह सकेंगे। फिलहाल यही लगता है कि इस जनमतसंग्रह का परिणाम वही होगा जो क्रेमलिन चाहता है। उसने इस बात को सुनिश्चित करने में क्रेमलिन ने कोई कसर बाकी नहीं रहने दी है। लेकिन ये सवाल भी है कि तब क्या होगा अगर इसका असर बिलकुल उल्टा पड़े? अगर इससे देश में विद्रोह की भावना भड़क गई तो मुमकिन है कि नया कदम पुतिन के महंगा साबित होने लगे।

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