वजूद बचाने की कोशिश

पश्चिम बंगाल में इस बार कांग्रेस और लेफ्ट फ्रंट ने औपचारिक रूप से गठबंधन करने का फैसला किया है। इसका एलान कुछ रोज पहले हुआ। इसके पहले भी इन दोनों ने आपसी तालमेल से चुनाव लड़ा था। लेकिन समय रहते पूरे गठबंधन का एलान पहली बार हुआ है। क्या इससे हाशिये पर पहुंच गए इन दलों की तकदीर संवरेगी? राज्य में जो सियासी रूझान हैं, उन्हें देखते हुए इसकी उम्मीद करना मुश्किल लगता है। 2016 के विधान सभा चुनाव में दोनों के तालमेल के बावजूद लेफ्ट को नुकसान ही उठाना पड़ा था। बीते साल हुए लोकसभा चुनावों में स्थानीय स्तर पर अनौपचारिक तालमेल के बावजूद कांग्रेस छह से घट कर दो सीटों पर आ गई, वहीं कभी अपने गढ़ रहे इस राज्य में लेफ्ट का खाता तक नहीं खुल सका। जाहिर है, सत्ता के दावेदार के तौर पर उभरती भाजपा और सत्तारुढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की टक्कर में इन दोनों के लिए वजूद बचाने का संकट खड़ा है।

वैसे मुमकिन है कि गठबंधन की घोषणा के बावजूद जब सीटों के बंटवारे का असल सवाल आएगा, तब उस मुद्दे पर पेच फंसे। कांग्रेस पहले ही ज्यादा सीटों पर लड़ने का संकेत दे रही है। उधर माकपा का कहना है कि सीटों का बंटवारा दोनों दलों की ताकत और जीतने की क्षमता के आकलन के आधार पर किया जाना चाहिए। कांग्रेस खेमे से पार्टी के नेता अधीर चौधरी को मुख्यमंत्री का चेहरा बनाने की मांग उठाई गई है। गौरतलब है कि 2011 के बाद हुए तमाम चुनावों में कांग्रेस और लेफ्ट अपने वजूद की रक्षा के लिए ही जूझते दिखे हैं। हर बार उनके वोट कम होते गए हैं। बीते लोकसभा चुनावों में तो भाजपा ने इन दोनों दलों के वोटों में जबरदस्त सेंध लगाई थी। इसीलिए कांग्रेस और लेफ्ट दोनों के लिए अगला चुनाव बेहद अहम है। इसीलिए यह यह देखना दिलचस्प होगा कि एक बार फिर हाथ मिलाने से क्या इन दलों की किस्मत भी बदलती है। यह होना आसान नहीं है। लेकिन यह जरूर है कि इस गठबंधन के मैदान में होने से ममता बनर्जी से नाराज सेकुलर वोटरों के लिए एक और विकल्प सामने होगा। इसी गणना के आधार पर यह मुमकिन है कि ममता बनर्जी इस गठबंधन के प्रति नरम रुख अपनाएं। ममता की कोशिश अपने विरोधी वोटों के ध्रुवीकरण को रोकना है। इसमें कांग्रेस- लेफ्ट का गंठबंधन काम आ सकता है।

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