What kind of democracy ये कैसा लोकतंत्र है?
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ये कैसा लोकतंत्र है?

कई विशेषज्ञ लोकतंत्र की परिभाषा विचार-विमर्श से शासन के रूप में करते हैँ। विचार-विमर्श में निहित है कि सरकार विपक्षी विचारों का सम्मान करेगी और अधिकतम सहमति बनाते हुए राजकाज चलाएगी। इसके बीच सबसे बड़ा सिद्धांत यह होता है कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन नही होगा। What kind of democracy

राजनीति शास्त्र की परिभाषा के हिसाब से चलें, तो लोकतंत्र और बहुसंख्यक वर्चस्व में फर्क होता है। लोकतंत्र में निर्वाचन सिर्फ एक पहलू है। बल्कि इसमें अधिक ध्यान इस पर रहता है कि निर्वाचित सरकार और प्रतिनिधि बेलगाम ना हो जाएं। इसलिए लोकतांत्रिक संविधान में सत्ताधारी अधिकारियों की जवाबदेही और उन पर नियंत्रण की पुख्ता व्यवस्था की जाती है। संसद के अलावा न्यायपालिका, संवैधानिक संस्थाएं, मीडिया और सबसे ऊपर जनता अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों पर लगाम रखती है। इसीलिए कई विशेषज्ञ लोकतंत्र की परिभाषा विचार-विमर्श से शासन के रूप में करते हैँ। विचार-विमर्श में निहित है कि सरकार विपक्ष, सिविल सोसायटी, और जन संगठनों के विचारों का सम्मान करेगी और अधिकतम सहमति बनाते हुए राजकाज चलाएगी। इसके बीच सबसे बड़ा सिद्धांत यह होता है कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का किसी बिंदु पर उल्लंघन नही होगा। अगर इन पैमानों का पालन ना हो रहा हो, तो निर्वाचित सत्ता बहुसंख्यक वर्चस्व का रूप ले लेती है।

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उसमें अल्पसंख्यक और अल्पमत का उत्पीड़न एक निश्चित परिणाम होता है। अब यह गौर करने की बात है कि आखिर भारत में आज राजकाज लोकतांत्रिक पैमानों पर कितना खरा उतर रहा है। ये सवाल हालांकि आज लगभग रोजमर्रा के स्तर पर उठता है, लेकिन जिस ढंग से संसद में विवादित कृषि कानूनों को रद्द किया गया, उसने एक बार फिर इस पर रोशनी डाली। तीनों विवादास्पद कृषि कानूनों को निरस्त करने वाले विधेयक को सरकार ने संसद के दोनों सदनों से बिना किसी बहस के पास करवा लिया। विपक्ष ने चर्चा की मांग की थी। लेकिन सरकार का नजरिया बुल्डोजर जैसा रहा। इसीलिए विपक्ष के इस आरोप में दम है कि सरकार ने एक बार फिर संसदीय मर्यादा के खिलाफ काम किया है। लोकसभा में तो विधेयक बिना किसी चर्चा के मिनटों में पास हो गया। राज्यसभा में छोटी सी चर्च हुई। लेकिन विपक्ष के सांसदों ने विस्तृत चर्चा ना कराने का विरोध किया और सरकार पर संसदीय परंपरा ना निभाने का आरोप लगाया। गौरतलब है कि सितंबर 2020 में जब सरकार ने तीनों कानूनों को संसद से पारित करवाया था, तब भी सरकार पर ऐसे ही आरोप लगे थे। उसके पहले कानूनों को सबसे पहले जून 2020 में कोविड-19 महामारी के मद्देनजर पूरे देश में लगी तालाबंदी के बीच अध्यादेशों की शक्ल में लाया गया था। ऐसे महत्त्वपूर्ण मामलों में अध्यादेश अपने का रास्ता आप में एक समस्याग्रस्त है। तो आखिर आज हम कैसे लोकतंत्र में रह रहे हैं?

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