राहत की एक सांस

दुनिया भर के मानव अधिकार और अभिव्यक्ति की आजादी के समर्थकों ने राहत की सांस ली है। मशहूर वेबसाइट विकिलीक्स के संस्थापक जूलियन असांज को अमेरिका प्रत्यर्पित करने की याचिका ब्रिटेन की अदालत ने खारिज कर दी। असांज का अगर प्रत्यर्पण हो जाता तो अमेरिका में उन्हें अत्यधिक सख्त सजा हो सकती थी। असांज की तबीयत खराब है। इसके बावजूद अमेरिका प्रत्यर्पण कराने पर तुला हुआ था। उसने ब्रिटेन से मांग की थी कि असांज को अमेरिका के हवाले किया जाए, ताकि वहां उन पर मुकदमा चल सके। लेकिन ब्रिटिश जज ने इस मांग के खिलाफ फैसला दिया। कहा कि असांज की मानसिक स्थिति देखते हुए ऐसा करना उनका उत्पीड़न करना होगा। जज ने कहा- “अमेरिका ने कार्यवाई की जो प्रक्रिया बताई है, उसे देखते हुए मुझे यकीन है कि असांज को आत्महत्या की कोशिश से नहीं रोका जा सकेगा। इस वजह से मैंने फैसला किया है कि मानसिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए यह उत्पीड़न होगा।” विकीलीक्स नाम से वेबसाइट 2006 में रजिस्टर की गई थी। इस पर काम 2007 में शुरू हुआ।

असांज का दावा था कि वे सेंसरशिप के खिलाफ काम कर रहे हैं। उनका कहना था कि अपने सूत्रों को सुरक्षित रखते हुए वे सरकारों की गुप्त जानकारियों को जनता के सामने लेकर आएंगे। अमेरिकी जेल ग्वांतानामो बे से जुड़े दस्तावेज लीक करके असांज दुनिया की नजरों में आए। लेकिन 2010 में उन्होंने तहलका मचा दिया, जब दुनिया भर के अखबारों के साथ मिल कर उन्होंने सरकारों और नेताओं से जुड़ी गुप्त जानकारी सार्वजनिक की। विकीलीक्स ने द न्यूयॉर्क टाइम्स, द गार्डियन, डेय श्पीगल, ले मोंडे और एल पाएस जैसे अखबारों के साथ मिलकर काम किया और एक करोड़ से ज्यादा दस्तावेज लीक किए। इनमें अमेरिका से लेकर यूरोप, चीन, अफ्रीका और मध्य पूर्व तक की सरकारों से जुड़े दस्तावेज शामिल थे। लेकिन वक्त के साथ साथ विकीलीक्स ने अपना सारा ध्यान अमेरिका पर केंद्रित कर दिया। ऐसे खुलासे उचित हैं या नहीं, इसको लेकर विवाद रहा है। लेकिन असांज के पक्ष में सबसे मजबूत तर्क यही है कि उन्होंने जो बातें सामने लाईं, वो सच हैं। तो आखिर सच को सामने लाना अपराध क्यों माना जाना चाहिए? विकिलीक्स ने आखिर वो कहानियां ही दुनिया के सामने लाईं, जिन्हें सरकारों ने खुद अपनी जनता से छिपा रखा था।

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