right to sit tamilnadu राहत की एक खबर
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राहत की एक खबर

तमिलनाडु दूसरा राज्य बना है, जो कानूनन रिटेल स्टोर और दुकानों में कर्मचारियों को “बैठने का अधिकार” देता है। कानून के मुताबिक स्टोर मालिकों से कहा गया है कि वे कर्मचारियों की बैठने की व्यवस्था करें और कर्मचारियों को काम के दौरान जब भी संभव हो आराम करने का मौका दें। right to sit tamilnadu

जिस दौर में अधिकार की चेतना और उसके लिए आग्रह दोनों भारतीय समाज में कमजोर पड़े हैं, तब केरल और तमिलनाडु सरकारों के दो फैसले राहत की बात बन कर आए हैं। केरल की तर्ज पर ही अब तमिलनाडु में भी “बैठने का अधिकार” अमल में लाय गया है। खासकर महिला कर्मचारियों के लिए इसके शुरुआती अनुभव फायदेमंद साबित हुए हैं। ये कर्मचारी कई घंटों तक खड़े हो कर दुकानों और रिटेल स्टोर में काम करती हैं। तमिलनाडु दूसरा भारतीय राज्य बना है, जो कानूनन रिटेल स्टोर और दुकानों में कर्मचारियों को “बैठने का अधिकार” देता है। कानून के मुताबिक स्टोर मालिकों से कहा गया है कि वे कर्मचारियों की बैठने की व्यवस्था करें और कर्मचारियों को काम के दौरान जब भी संभव हो आराम करने का मौका दें। कर्मचारियों का अनुभव रहा है कि अब तक इन शिफ्ट के दौरान एकमात्र आराम का समय उन्हें लगभग आधे घंटे के लंच ब्रेक में मिलता था। वरना, ग्राहक नहीं होने पर भी उन्हें यहां तक कि फर्श पर भी बैठने की इजाजत नहीं होती थी।

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भारत में ऐसे अनगिनत दुकान और रिटेल स्टोर्स हैं, जहां कर्मचारियों को खड़े होकर काम करना होता है। ताजा पहल से ऐसे कर्मचारियों को बड़ी राहत मिलेगी। 2018 में करेल ने इसी तरह का कानून लागू किया था। उसके पहले वहां टेक्सटाइल स्टोर में काम करने वाले कर्मचारियों ने इस अधिकार को लेकर प्रदर्शन किया था। उसका लाभ मिला। अब तमिलनाडु ने उसे अपने यहां अपनाया है। बेहतर तो यह होगा कि इसे पूरे देश में लागू किया जाए। उसके लिए अगर केंद्र सरकार पहल करे, तो ऐसा करना संभव है। केंद्र को चाहिए कि वह इस बारे में एक मॉडल विधेयक तैयार करे, जिसका अनुकरण सभी राज्य करेँ। वैसे ये बात जहां तक पहुंची है, उसकी कहानी दिलचस्प है। बताया जाता है कि केरल में पेशे से दर्जी पी विजी ने बैठने का अधिकार के लिए आंदोलन को शुरू किया। उन्होंने यूनियन का गठन किया। यह खासकर ऐसे कर्मचारियों के लिए था, जो असंगठित क्षेत्र सहायक के तौर पर काम करते हैं। बहरहाल, केरल और तमिलनाडु में जो कानून बने हैं, उन्हें लागू करवाने की चुनौती कायम है। यह तभी हो सकता है कि जब सरकारी अधिकारी लगातार जांच करने दुकानों पर जाएं और कानून पर अमल सुनिश्चित करवाएं।

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