विषमता की शिकार महिलाएं

भारत में अक्सर महिलाओं की बदहाली की चर्चा होती है, जो वाजिब भी है। मगर बाकी दुनिया में भी अभी हालत कोई बहुत बेहतर नहीं है। कुछ देशों को छोड़ कर दुनिया के बाकी हिस्सों में आज भी महिलाएं स्वतंत्रता और स्वेच्छा से जीने की स्थिति में नहीं हैं। अगर उनके रोजगार के हाल पर गौर करें, तो यह तस्वीर बिल्कुल साफ हो जाती है। बीते हफ्ते संयुक्त राष्ट्र ने इस बारे में एक रिपोर्ट जारी की, जिसमें महिला अधिकारों की सुस्त प्रगति पर दुख जताया गया। साथ ही यूएन ने चेतावनी दी कि कोरोना वायरस महामारी और आर्थिक मंदी की वजह से महिला अधिकारों को हासिल करने की रफ्तार और धीमी पड़ सकती है। ‘वर्ल्ड वुमन-2020’ रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया ने महिलाओं के अधिकारों और आर्थिक सशक्तीकरण के मामले में मामूली उपलब्धि हासिल की है। रोजगार और घरेलू हिंसा के खिलाफ जो उपाय 25 साल पहले रिपोर्ट में सुझाए गए थे, उनसे स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हुआ। संयुक्त राष्ट्र ने कहा है कि 25 साल पहले बीजिंग घोषणापत्र और प्लेटफॉर्म फॉर एक्शन के पारित होने के बाद से महिलाओं के लिए समान शक्तियों और समान अधिकारों की दिशा में प्रगति लक्ष्य से दूर रही है।कोई भी देश लैंगिक समानता हासिल नहीं कर पाया है। जो भी लाभ इस दिशा में हासिल हुए उसको कोविड-19 संकट खत्म कर सकता है।

रिपोर्ट से यह भी सामने आया है कि जहां पुरुषों को कोविड-19 संक्रमण के खिलाफ बतौर फ्रंटलाइन वर्कर्स के रूप में 70 फीसदी महिलाएं ही काम कर रही हैं। जाहिर है, वे संक्रमित होने के अधिक जोखिम में हैं। रिपोर्ट कहती है कि लॉकडाउन में घरेलू हिंसा के मामले में वृद्धि की संभावना है। दरअसल, कोरोना महामारी के दौरान संभावना है कि महिलाएं अन्य तरह की हिंसा का सामना कर रही हों। इसका डेटा अभी इकट्ठा किया जा रहा है। रिपोर्ट में विस्तार से बताया गया कि प्राथमिक और उच्च विद्यालय में जाने वाली लड़कियों और लड़कों की संख्या समान है। वैश्विक औसत के रूप में यही बात विश्वविद्यालय में भी है। फिर भी आधे से कम महिलाओं को ही रोजगार मिल पा रहा है। रोजगार बाजार में महिलाओं और पुरुषों की भागीदारी 1995 के समान ही है, जब महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर बीजिंग में चौथा विश्व सम्मेलन हुआ था। उस दौरान सदस्य देशों ने जिन लक्ष्यों को हासिल करने का संकल्प लिया था, दुनिया अब भी उनसे दूर है।

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