शाहीन बाग आयोग की भी विफलता! - Naya India
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शाहीन बाग आयोग की भी विफलता!

अजित कुमार : यह कहने और मानने में हिचक नहीं है कि चुनाव आयोग ने देश में होने वाले चुनावों को निष्पक्ष, पारदर्शी और स्वतंत्र बनाने में बड़ी भूमिका निभाई है। सभी चुनाव आयुक्तों ने और केंद्र व राज्यों की सरकारों या दूसरी एजेंसियों ने भी इसमें भूमिका निभाई है। दिल्ली में अभी चल रहे विधानसभा चुनाव में भी आयोग के कुछ काम बहुत सराहनीय हैं। जैसे आयोग ने करीब सवा सौ ऐसे मतदाताओं की पहचान की है, जो एक सौ साल से ज्यादा उम्र के हैं। उनके मतदान के लिए विशेष बंदोबस्त किए गए हैं। उम्रदराज और दिव्यांग मतदाताओं के लिए भी जरूरी उपाय किए गए हैं। मतदाताओं को जागरूक करने का भी प्रभावी अभियान चल रहा है। आयोग के अभियानों का ही असर है कि पूरे देश में मतदान का प्रतिशत बढ़ता जा रहा है और लोगों का भरोसा भी मजबूत हो रहा है।

इसके बावजूद दिल्ली के चुनाव में प्रचार की जो शैली है, जो मुद्दे हैं, नेताओं की जैसी बयानबाजी है उसे नियंत्रित नहीं कर पाना चुनाव आयोग की बड़ी विफलता है। पिछले लोकसभा चुनाव में भी ऐसा हुआ था। तब भी नेताओं ने जम कर भड़काऊ भाषण दिए थे। सेना और उसके सैन्य अभियानों के नाम पर वोट मांगा गया था। पर तब भी छिटपुट कार्रवाई के सिवा चुनाव आयोग ने ऐसा कुछ नहीं किया, जिससे नेताओं में यह चिंता बने कि अगर वे चुनाव की आचार संहिता का उल्लंघन करते हैं तो उनको वास्तविक नुकसान हो सकता है। किसी नेता के प्रचार पर 24 घंटे या 48 घंटे की पाबंदी लगाने से उनको आचार संहिता के उल्लंघन से नहीं रोका जा सकता है।

मिसाल के तौर पर केंद्रीय चुनाव आयोग ने केंद्रीय राज्यमंत्री अनुराग ठाकुर पर 48 घंटे की पाबंदी लगाई थी। उन पर आरोप था कि उन्होंने अपनी सभा में आपत्तिजनक नारे लगवाए थे। नारे बेहद आपत्तिजनक थे। आचार संहिता के साथ साथ वैसी नारेबाजी सामाजिक सद्भाव और राजनीतिक नैतिकता दोनों के लिए अच्छी नहीं है। पर जब चुनाव आयोग की पाबंदी खत्म होने के बाद वे चुनाव प्रचार में उतरे तो फिर विवादित बयान दिया। उन्होंने कहा कि 11 फरवरी को जैसे जैसे नतीजे आने लगेंगे वैसे वैसे शाहीन बाग खाली होने लगेगा। ध्यान रहे अनुराग ठाकुर भाजपा के अकेले नेता नहीं हैं, जिन्होंने शाहीन बाग में संशोधित नागरिकता कानून, सीएए के विरोध में चल रहे आंदोलन को चुनावी मुद्दा बनाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के साथ साथ पार्टी के तमाम स्टार प्रचारक, जिनमें मुख्यमंत्री और सांसद भी शामिल हैं, सबने शाहीन बाग को चुनावी मुद्दा बनाया।

सवाल है कि क्या चुनाव आयोग को इसका अंदाजा नहीं था कि शाहीन बाग में चल रहा विरोध प्रदर्शन दिल्ली के चुनाव को प्रभावित कर सकता है? जो बात दिल्ली के आम लोगों को समझ में आ रही थी और मीडिया में, जिसके बारे मे लगातार लिखा जा रहा था उसे चुनाव आयोग क्यों नहीं समझ सका? दिसंबर में जब शाहीन बाग का धरना शुरू हुआ तो यह आम धारणा बनी थी कि दिल्ली पुलिस, जो केंद्र सरकार के अधीन आती है, वह शाहीन बाग का धरना जान बूझकर नहीं खत्म कर रही है। असल में केंद्र सरकार नहीं चाहती थी कि धरना खत्म हो। ध्यान रहे इस तरह के धरने उत्तर प्रदेश में कई जगह शुरू हुए पर हर जग पुलिस ने धरना खत्म करा दिया। पर दिल्ली के शाहीन बाग में दिल्ली पुलिस ने धरना खत्म नहीं कराया, जबकि धरने पर बैठे हजारों लोगों की वजह से एक मुख्य सड़क पूरी तरह से जाम है और लाखों लोगों को उससे परेशानी हो रही है।

सोचें, जब चुनाव आयोग को चुनाव की घोषणा के साथ ही छोटे छोटे कर्मचारियों तक के तबादले और पदस्थापना का अधिकार मिल जाता है तो उसके पास यह अधिकार नहीं था कि वह शाहीन बाग का धरना खत्म कराए? चुनाव आयोग मतदान को प्रभावित करने वाली फिल्में रुकवा सकता है, विज्ञापन हटवा सकता है, दिवारों पर लिखे गए नारे मिटवा सकता है पर जिस शाहीन बाग का धरना सीधे तौर पर चुनाव को प्रभावित कर रहा था, उसे उसने नहीं हटावाया! ध्यान रहे यह धरना चुनाव को कई तरह से प्रभावित कर रहा है। लाखों लोग जो इस धरने की वजह से प्रभावित हो रहे हैं उनके ऊपर तो इसका असर हो ही रहा है, चुनाव प्रचार में भी इसका इस्तेमाल करके मतदाताओं को प्रभावित किया जा रहा है।

अव्वल तो चुनाव आयोग को धरना खत्म कराना चाहिए था। चाहे इसके लिए उसे खुद पहल करनी होती या केंद्र व राज्य सरकारों को शामिल करना पड़ता, जैसे भी होता इसे खत्म कराना था। अगर धरने को लोकतांत्रिक अधिकार मानते हुए इसे खत्म नहीं कराया जाता तब भी सड़क खाली कराई जानी थी। सड़क भी खाली नहीं कराई जाती तो सुरक्षा के ऐसे बंदोबस्त करने थे कि जिस तरह वहां तीन बार गोलीकांड हुआ वैसा न हो पाए। अगर आयोग वह भी नहीं कर पाता तो कम से कम नेताओं पर इस बात की पाबंदी लगाई जानी थी कि वे शाहीन बाग के नाम पर वोट नहीं मांगेंगे। पर आयोग ने इनमें से कोई काम नहीं किया। स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव का दावा कर रहे आयोग ने एक ऐसा घटनाक्रम निर्बाध रूप से चलने दिया, जो चुनाव को बुरी तरह से प्रभावित कर रहा है। नतीजों पर इसका बहुत असर नहीं होगा पर चुनाव प्रचार और राजनीति इससे बुरी तरह से प्रभावित हुई है। चुनाव आयोग की ओर से कहा जा सकता है कि उसके अधिकार सीमित हैं और आचार संहिता का उल्लंघन करने वालों पर कार्रवाई करने की भी सीमा है। सीमित अधिकार के साथ और सीमा में रहते हुए भी आयोग शाहीन बाग के राजनीतिक इस्तेमाल को रोक सकता था।

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