बड़े चुनाव सुधारों की जरूरत

सुप्रीम कोर्ट ने दागी नेताओं के चुनाव लड़ने के बारे में कुछ दिशा-निर्देश दिए, जिसके बाद से इस बात पर बहस छिड़ी है कि आखिर कैसे दागी या अपराधी छवि के नेताओं को चुनाव लड़ने से रोका जाए। इस मामले में चुनाव आयोग पहले ही अपने हाथ खड़े कर चुका है। बुनियादी रूप से यह काम राजनीतिक दलों का है, जो सिर्फ जीतने की क्षमता के आधार पर अपराधी छवि के नेताओं को टिकट देते हैं। इस मामले में भाजपा हो या कांग्रेस या कोई क्षेत्रीय पार्टी है, सब समान रूप से जिम्मेदार हैं। यहां तक कि दिल्ली में साफ-सुथरी राजनीति का दावा करने वाली आम आदमी पार्टी के भी आधे से ज्यादा विधायकों पर किसी न किसी किस्म के आपराधिक मामले हैं।

हालांकि यह आपराधिक छवि या आपराधिक मामलों वाली बात कुछ जटिल है क्योंकि कई नेताओं पर बहुत मामूली धाराएं होती हैं और राजनीतिक मामले ज्यादा होते हैं। धारा 144 का उल्लंघन या तय समय से ज्यादा देर तक लाउडस्पीकर चलाने या तय समय के बाद रोड शो करने जैसे मामले भी आपराधिक मामलों की श्रेणी में आते हैं। धरना-प्रदर्शन करने और सरकारी कामकाज में बाधा डालने के मुकदमे भी ज्यादातर नेताओं के ऊपर दर्ज होते हैं। कुछ नेताओं पर आपराधिक मानहानि के मामले होते हैं या चुनावी सभा, प्रचार या मतदान केंद्र पर मारपीट का मामला भी दर्ज होता है। यह कोई ऐसा आपराधिक मामला नहीं है, जिसके आधार पर नेताओं को चुनाव लड़ने से रोक दिया जाए। हां, जिनके ऊपर गंभीर अपराध के आरोप हों या जो आदतन अपराधी हों, उन्हें रोकने का जरूर प्रयास किया जाना चाहिए।

दागी नेताओं का मामला देश की चुनावी राजनीति से जुड़ा एक पहलू है। इसके अलावा अनेक ऐसे मुद्दे हैं, जिनमें सुधार की जरूरत है। असल में बड़े चुनाव सुधारों की जरूरत है ताकि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया में आम लोगों का भरोसा बढ़ाया जा सके। ध्यान रहे चुनाव आयोग के तमाम प्रयासों के बावजूद अगर दिल्ली जैसे शहर में भी मतदान प्रतिशत नहीं बढ़ पाता है तो इसका एक कारण यह भी है कि लोग इस पर संदेह करने लगे हैं। लोगों का भरोसा कायम रखने और उसे बढ़ाने के लिए जरूरी है कि व्यापक चुनाव सुधार हों।

अगर दिल्ली के चुनाव से ही शुरू करें तो एक बड़े सुधार की जरूरत नेताओं को उनके भाषणों के लिए जिम्मेदार ठहराने के मामले में है। सत्तारूढ़ दल के नेताओं और केंद्रीय मंत्रियों ने भड़काऊ भाषण दिए। दूसरे नेताओं के लिए अपमानजनक बातें कहीं। चुनाव को गृह युद्ध और हिंदू-मुस्लिम या भारत-पाकिस्तान की लड़ाई बनाने का प्रयास किया। पर चुनाव आयोग ने किसी मामले में एक भी एफआईआर नहीं दायर की। सोचें, सीएए और एनआरसी के विरोध में नारे लगाने पर लोगों पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत मुकदमे हो रहे हैं पर चुनाव को हिंदू-मुस्लिम या भारत-पाकिस्तान की लड़ाई बताने, ‘गद्दारों’ को गोली मारने जैसे नारे देने पर मुकदमा कायम नहीं हो रहा है। सवाल है कि यह चुनाव आयोग का पूर्वाग्रह है या कानूनी रूप से उसके हाथ में ऐसा करने की ताकत नहीं है? दोनों ही स्थितियों में एक बड़े सुधार की जरूरत है।

ऐसे ही दिल्ली के चुनाव प्रचार के दौरान करोड़ों रुपए की नकदी पकड़ी गई और करोड़ों रुपए की शराब व दूसरी वस्तुएं पकड़ी गई हैं, जिनका चुनाव में इस्तेमाल किया जाना चाहिए था। इतने बड़े पैमाने पर नकदी की जब्ती के बावजूद किसी भी उम्मीदवार के बारे में नहीं कहा जा सकता है कि उसने खर्च की तय सीमा में ही काम किया। लगभग सारे उम्मीदवार और तय सीमा से ज्यादा खर्च करते हैं और चुनाव आयोग के सामने झूठे ब्योरा पेश करते हैं। यह सब चुनाव आयोग की आंखों के सामने होता है। उम्मीदवारों के साथ साथ पार्टियों का खर्च अलग होता है। जिस पार्टी के पास जितना ज्यादा पैसा है वह उतना ज्यादा खर्च करता है। ध्यान रहे सबसे ज्यादा पैसा हमेशा सत्तारूढ़ दल के पास होता है और उसका खर्च भी सबसे ज्यादा होता है। उसे सबसे ज्यादा चंदा भी मिलता है। यह इलेक्टोरल बांड से भाजपा को मिले चंदे से जाहिर होता है। सो, पार्टियों के खर्च, उनके चंदे आदि की निगरानी की जरूरत है और साथ ही उसे तर्कसंगत बनाने की भी जरूरत है ताकि छोटी पार्टियों और निर्दलीय उम्मीदवारों को बराबरी का मैदान मिले। अभी चुनाव लगभग पूरी तरह से बड़ी पार्टियों और बड़ी पूंजी का खेल बन कर रह गया है। अगर इसे ठीक नहीं किया गया तो लोगों का भरोसा और कमजोर होगा।

ऐसा ही एक मामला इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन, ईवीएम का है। भाजपा विरोधी ज्यादातर पार्टियां ईवीएम की विश्वसनीयता पर सवाल उठाती रही हैं। हालांकि राज्यों में जहां विरोधी पार्टियां जीत जा रही हैं वहां वे सवाल नहीं उठा रही हैं। फिर भी एक बुनियादी मामला ईवीएम की साख का है। लंबे प्रयास के बाद बैलेट की जगह ईवीएम की प्रणाली लागू हुई है। बैलेट और बूथ लूट की घटना को रोकने के लिए नब्बे के दशक में तब के मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन ने जो प्रयास किए, उसने चुनावी प्रक्रिया में आम लोगों की भागीदारी बढ़ाई और भरोसा भी बढ़ाया। ईवीएम को लेकर भी वैसा ही भरोसा बहाल करने की जरूरत है। असल में पिछले काफी समय से टुकड़ों टुकड़ों में चुनाव सुधार हो रहे हैं। जिस समय जेएम लिंगदोह मुख्य चुनाव आयुक्त थे उस समय उन्होंने कुछ सुधार कराए। पर अब ऐसे छोटे छोटे सुधारों से काम नहीं चलने वाला है। सरकार को और सभी विपक्षी पार्टियों को भी साथ मिल कर जन प्रतिनिधित्व कानून में व्यापक बदलाव करना होगा ताकि चुनाव प्रक्रिया को ज्यादा स्वतंत्र और निष्पक्ष बनाया जा सके और इसके अंदर की खामियों को दूर किया जा सके।

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