गरीबी पर विदेशी रपट और हम !

बलबीर पुंज

यह ठीक है कि 15 अगस्त 1947 को हमारी सैकड़ों वर्ष पुरानी दासता की बेड़ियां टूटी और हम स्वतंत्र हो गए। किंतु क्या मानसिक तौर पर हम अब भी गुलाम नहीं है? क्या एक राष्ट्र के रूप में हमारे चिंतन में आज भी आत्मविश्वास का अभाव और गोरी चमड़ी के प्रति अंधविश्वास नहीं झलकता है? हाल के घटनाक्रम ने इसी शर्मनाक तथ्य को पुन: रेखांकित किया है। विगत 15 अक्टूबर को वैश्विक भूख सूचकांक संबंधी रिपोर्ट विदेशी धरती डबलिन (आयरलैंड) और बॉन (जर्मनी) से जारी हुई, जिसे तैयार करने वाले या तो सभी या फिर अधिकांश विदेशी ही थे। पत्रकारिता के मौलिक सिद्धांतों की अवहेलना करते हुए और रिपोर्ट को सभी कसौटियों पर कसे बिना देश के अधिकांश प्रमुख समाचारपत्रों और मीडिया संस्थानों ने इसे प्रकाशित/प्रसारित कर दिया। बकौल रिपोर्ट, 117 देशों की सूची में भारत 102वें स्थान पर है और यहां भूखे पेट सोने वाले लोगों की संख्या पाकिस्तान, बांग्लादेश व नेपाल से भी अधिक है।

अब इस रिपोर्ट का स्रोत क्या था- इसपर अधिकांश मीडिया संगठनों और स्वघोषित बुद्धिजीवियों ने या तो ध्यान ही नहीं दिया या फिर वैचारिक, राजनीतिक और व्यक्तिगत कारणों से इसकी अनदेखी कर गए। गोरी चमड़ी वाले व्यक्ति के एक-एक शब्द को ब्रह्म-वाक्य मानने की मानसिकता, जिसकी ना पड़ताल होने और ना ही चुनौती देने का विचार है- उससे ग्रस्त होकर कई समाचारपत्रों में आलेख भी प्रकाशित हुए। एक प्रतिष्ठित हिंदी दैनिक के एक स्तंभ में यहां तक दावा कर दिया गया कि भारत की 75.6 प्रतिशत- अर्थात् 82 करोड़ की आबादी गरीबी रेखा से नीचे है। भारत में इस हालिया फर्जी “शोध” के परिणामों को बिना प्रश्न पूछे भारतीय मीडिया ने जिस प्रमुखता के साथ उठाया है, क्या उस तरह विदेशों में किसी विशुद्ध भारतीय रिपोर्ट को महत्व मिलेगा? कल्पना कीजिए, भारत का कोई स्वयंसेवी संगठन, अमेरिका, जर्मनी, आयरलैंड की सरकार या समाज के संबंध में कोई आंकड़े प्रस्तुत करें, तो क्या उसे वहां की मीडिया द्वारा महत्व दिया जाएगा?

अपनी रिपोर्ट के माध्यम से विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश- भारत की छवि को कलंकित करने वालों का परिचय क्या है? रिपोर्ट को दो विदेशी गैर-सरकारी संस्थाओं ने मिलकर तैयार किया है, जिसमें एक आयरलैंड की कन्सर्न वर्ल्डवाइड (concern worldwide), तो दूसरी जर्मनी की वेल्टहंगरहिल्फे (welthungerhilfe) है। इन दोनों की उत्पत्ति 1960-70 के दशक में रोमन कैथोलिक चर्च और ईसाई मिशनरियों ने की थी, जिनका अतीत और वर्तमान भय-लालच के माध्यम से मजहबी मतांतरण में लिप्त रहा है। भारत इसका दंश 16वीं शताब्दी में फ्रांसिस जेवियर के गोवा आगमन से लेकर आज भी छद्म-सेकुलरवाद की छत्रछाया में झेल रहा है।

वेल्टहंगरहिल्फे की स्थापना वर्ष 1962 में पूर्व जर्मनी के तत्कालीन संघीय राष्ट्रपति, ईसाइवादी राजनीतिज्ञ और रोमन कैथोलिक चर्च के सदस्य हेनरिच लुब्के ने की थी। वर्तमान समय में इस संगठन की कमान सुश्री मरलेह्न थिएमे के हाथों में है, जो जर्मन ईसाई धर्म प्रचार चर्च परिषद से भी जुड़ी है। चर्च के अतिरिक्त, जर्मन कैथोलिक बिशप कमीशन, जर्मनी के वामपंथी राजनीतिक दल (डी-लिंक) और वाम-समर्थित व्यापारिक संघ- वेल्टहंगरहिल्फे संस्था के मुख्य सदस्य है।

इसी तरह, कन्सर्न वर्ल्डवाइड की स्थापना आयरिश ईसाई मिशनरी के कहने पर 1968 में तब हुई, जब नाइजीरिया को ब्रितानी औपनिवेश से मुक्ति मिले 8 वर्ष हो चुके थे और यह अफ्रीकी देश भीषण गृह युद्ध की चपेट में था। स्वभाविक रूप से ऐसे समय जब नाइजीरिया भयंकर भूख, बीमारी और अकाल जैसी स्थिति से जूझ रहा था, तब तथाकथित “सेवा” के माध्यम से मतांतरण करने का सुनहरा अवसर चर्च और ईसाई मिशनरियों को नजर आया।

नाइजीरिया में वर्ष 1914 से 1960 के ब्रितानी राज के दौरान ईसाइयत का प्रचुर मात्रा में प्रचार हुआ, जो अब भी जारी है। वर्ष 1963 में नाइजीरिया की कुल आबादी में मुस्लिम 38, ईसाई 36 तो अन्य पारंपरिक मान्यताओं को मानने 26 प्रतिशत थे। किंतु आज नाइजीरिया की कुल जनसंख्या में मुस्लिम बढ़कर 50, ईसाई 49 प्रतिशत हो गए है, जबकि अन्य पारंपरिक मान्यताओं के उपासकों की संख्या एक प्रतिशत भी नहीं है। क्या इतना बड़ा जनसांख्यिकीय परिवर्तन बिना किसी घोषित मजहबी अभियान (मतांतरण सहित) के संभव है?

भारत और उसकी सनातन संस्कृति के खिलाफ इस तरह के प्रायोजित अभियान का दशकों पुराना इतिहास है। अभी पिछले वर्ष जब दावोस में विश्व आर्थिक मंच से दुनिया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सुन रही थी, तब ब्रितानी स्वयंसेवी संस्था ऑक्सफैम ने देश में बढ़ती आर्थिक असमानता पर एक रिपोर्ट जारी कर दी थी। भारतीय मीडिया और बुद्धिजीवियों के उसी वर्ग ने तब भी औपनिवेशिक मानसिकता का परिचय देते हुए इस रिपोर्ट को अत्याधिक प्राथमिकता दी।

विडंबना देखिए कि उसी कालखंड में ऑक्सफैम के अधिकारियों द्वारा भूकंपग्रस्त अफ्रीकी देश हैती में आर्थिक सहायता देने के बदले महिलाओं से यौन-संबंध बनाने और बच्चों का यौन-उत्पीड़न करने का मामला भी प्रकाश में आया था, जिसे संगठन ने भी छिपाए रखा। इसका खुलासा इंग्लैंड स्थित हाउस ऑफ कॉमन्स (संसद) की गहन जांच में भी हो चुका है। जिस संगठन को उसी के देश की संसद ने यौन-उत्पीड़न मामले में आरोपित किया, वही संस्था भारत की अर्थव्यवस्था को प्रमाणपत्र दे रही है। आश्चर्य इस बात का है कि इसे भी भारत में बिना किसी ने प्रश्न पूछे स्वीकार कर लिया।

मुझे स्मरण है कि 1970-80 के दशक में समाजवादी व्यवस्था के अंतर्गत भारत गरीबी और निम्न विकास दर से जूझ रहा था, जिसमें लोगों को दूध, चीनी, सीमेंट और टेलीफोन जैसे वस्तुओं के लिए लंबी-लंबी पंक्तियों में लगना पड़ रहा था और उस समय सार्वजनिक रूप से कालाबाजारी होती थी। उस समय वामपंथी अर्थशास्त्री प्रोफेसर राजकृष्ण ने इसके लिए देश की हिंदू सनातन संस्कृति को जिम्मेदार ठहराते हुए ‘हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ’ शब्दावली का उपयोग किया। वामपंथ जनित समाजवादी नीतियों का आकलन करने के बजाय राजकृष्ण तत्कालीन स्थिति के लिए यह स्थापित करना चाह रहे थे कि देश में हिंदू समाज की सनातन मान्यताओं के कारण भारत आर्थिक तंगी और गरीबी से अभिशप्त है।

क्या यह सत्य नहीं कि 1991 में जब आर्थिक सुधार हुए, तब से हिंदू बहुल भारत- दाल, चावल, दूध, अदरक, भिंडी, प्याज, टमाटर, बैंगन, गन्ने, चाय, नींबू, आम, केला, पपीता, अमरुद, अखरोट, मूंगफली आदि जैसे दर्जनों पोषक तत्वों के उत्पादन के मामले में दुनिया का सरताज बन चुका है। विश्व बैंक द्वारा स्थापित मापदंड के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति प्रतिदिन 1.9 डॉलर से कम में गुजारा कर रहा है, तब ही वह गरीब की श्रेणी का कहलाएगा। इस पृष्ठभूमि में भारत की स्थिति क्या है? मान्यता प्राप्त वैश्विक ईकाइयों का दावा है कि भारत में तीव्रता के साथ गरीबी घट रही है। विश्व बैंक के अनुसार, वर्ष 2011 में 21 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा से नीचे थे, जो आठ वर्ष पश्चात एक अनुमान के अनुसार, 14-15 प्रतिशत रह गए है। अब भारत की विशाल जनसंख्या होने के कारण यह अनुमानित आंकड़ा लगभग 20 करोड़ होता है, जो पाकिस्तान की कुल आबादी के समान है।

भूखमरी संबंधित विदेशी रिपोर्ट ऐसे समय पर सामने आई है, जब मोदी सरकार मजहबी मतांतरण में लिप्त गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) पर सख्त कार्रवाई कर रही है। भूखमरी संबंधित रिपोर्ट आने से एक माह पहले गृह मंत्रालय ने विदेशी चंदा लेने वाले सभी गैर-सरकारी संस्थाओं को सरकार के समक्ष यह घोषित करने को कहा है कि वे किसी मतांतरण में शामिल नहीं हैं। क्या इन दोनों खबरों में कोई संबंध है?

इस पूरे घटनाक्रम में मुझे महाभारत का शल्य प्रसंग याद आता है। पांडवों के मामा मद्रराज शल्य, “स्वेच्छानुसार बोलने” की शर्त पर जब योजनाबद्ध तरीके से कौरवों के पक्ष में खड़े हुए- तब दुर्योधन ने उन्हे कर्ण का सारथी बनाया। कुरुक्षेत्र में जब कर्ण पांडवों से युद्ध कर रहे थे, तब शल्य कर्ण को हतोसाहित करने हेतु कभी उनका परिहास करते, तो कभी पांडवों की प्रशंसा। कहा जाता है कि अर्जुन द्वारा कर्ण के वध में शल्य द्वारा किए विकर्षण की भी भूमिका थी। इस पृष्ठभूमि में क्या शल्य की भूमिका वर्तमान भारतीय समाज का वह वर्ग नहीं निभा रहा है, जो औपनिवेशिक मानसिकता से ग्रस्त होकर और “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” का दुरुपयोग करके विदेशी शक्तियों के एजेंडे को प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से मजबूती दे रहा है?

यह सत्य है कि एक ओर जहां भारत स्वतंत्रता के बाद से गरीबी और भूखमरी पर विजय प्राप्त कर रहा है, तो दूसरी तरफ इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि इस दिशा में अभी काफी कुछ किया जाना शेष है। हम तन से स्वतंत्र तो अवश्य है, किंतु भारत के उज्जवल भविष्य हेतु देश की कमजोरी और ताकत का आकलन करने के लिए स्वतंत्र मानसिकता को भी विकसित करने की आवश्यकता है। क्या निकट भविष्य में ऐसा संभव है?

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