गलत से गलत को सही ठहराने का प्रयास

केंद्र सरकार ने सिफारिश की, राष्ट्रपति ने उसे मंजूरी दी और पूर्व चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने राज्यसभा का मनोनयन स्वीकार कर लिया। उसके बाद से इसे लेकर देश में विवाद छिड़ा है। बहस चल रही है। सुप्रीम कोर्ट के कम से कम चार रिटायर जजों ने इसका विरोध किया है और कहा है कि इससे आम लोगों के मन में न्यायपालिका की निष्पक्षता को लेकर सवाल खड़े होंगे। एक पूर्व जज ने तो कहा कि इस नियुक्ति के साथ ही आखिरी किला भी ढह गया। ध्यान रहे इस देश के आम लोगों की नजर में न्यायपालिका ही लोकतंत्र का आखिरी किला है, जिससे वे उम्मीद करते हैं और जिस पर भरोसा करते हैं। अब न्यायपालिका के ही लोग कह रहे हैं कि आखिरी किला ढह गया।

सरकार, भाजपा और उनके समर्थकों की ओर से इस कदम को न्यायसंगत ठहराने के लिए सिर्फ यह तर्क दिया जा रहा है कि पहले भी ऐसा होता रहा है और कांग्रेस ने भी ऐसा किया है। जस्टिस रंगनाथ मिश्रा को राज्यसभा भेजे जाने की मिसाल दी जा रही है। हालांकि वह तुलना भी सही नहीं है। जस्टिस रंगनाथ मिश्रा जब देश के चीफ जस्टिस थे, उस समय ज्यादातर समय गैर कांग्रेसी सरकार थी और कांग्रेस ने उनको उनके रिटायर होने के सात साल के बाद अपनी टिकट से राज्यसभा में भेजा था। यहां तो रंजन गोगोई को रिटायर होने के चार महीने बाद ही सरकार ने मनोनीत किया है।

ध्यान रहे मनोनयन के लिए संविधान ने कुछ मानक तय किए हैं। साहित्य, कला के संवर्धन या समाजिक गतिविधियों में शामिल लोगों को ही राज्यसभा में भेजा जाता है। पर पिछले कुछ समय से यह मानक टूट रहा है। कई पार्टियों ने दूसरे क्षेत्र के लोगों को राज्यसभा में भेजा। पर किसी रिटायर जज के मनोनयन का यह पहला मामला है। सो, राजनीतिक नैतिकता के मानक पर या संवैधानिक मानक पर इसे सही नहीं ठहराया जा सकता है। दूसरे, जहां तक इस बात का सवाल है कि पहले भी न्यायपालिका के लोगों को राज्यसभा में भेजा जाता रहा है तो उस आधार पर भी इसे न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता है। एक गलती से दूसरी गलती को सही नहीं ठहराया जा सकता। अगर कांग्रेस की सरकारों ने या पिछली किसी भी सरकार ने गलती की है तो उस आधार पर मौजूदा सरकार भी वहीं गलती नहीं कर सकती है। कुछ लोग तीन जजों की अनदेखी करके जस्टिस एएन रे को चीफ जस्टिस बनाने के इंदिरा गांधी के फैसले का हवाला दे रहे हैं। पर वे यह भूल जा रहे हैं कि उस काम के लिए इंदिरा गांधी की आज तक आलोचना हो रही है।

केंद्र की मौजूदा सरकार ने सत्ता में आते ही उस समय के रिटायर हुए चीफ जस्टिस पी सदाशिवम को राज्यपाल बनाया था और अब रंजन गोगोई को राज्यसभा में भेजा है। ये दोनों ऐसे फैसले हैं, जिनसे न्यायपालिका की साख पर गंभीर सवाल खड़े होते हैँ। ध्यान रहे पिछले कुछ दिनों से न्यायपालिका सरकार का कथित तौर पर पक्ष लेने की वजह से सवालों के घेरे में है। इससे जुड़ा एक दिलचस्प मामला अभी सर्वोच्च अदालत के सामने विचारधीन है। सामाजिक कार्यकर्ता और रिटायर आईएएस अधिकारी हर्ष मंदर का एक वीडियो अदालत को दिया गया है, जिसमें वे कह रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट से न्याय की उम्मीद नहीं की जा सकती है या न्याय नहीं  मिलता है। उनके कहने का एक संदर्भ है और उस पर व्यापक चर्चा की जरूरत है। इसी से जुड़ी दूसरी मिसाल सुप्रीम कोर्ट के एक कार्यरत जज की है, जिन्होंने पिछले दिनों एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जम कर तारीफ की। उनको दूरदृष्टि वाला नेता बताया और कहा कि वे वैश्विक सोच रखते हैं और स्थानीय दृष्टि से काम करते हैं। इसे भी न्यायिक बिरादरी के ज्यादातर लोगों ने गैरजरूरी माना था।

पिछले दिनों दिल्ली हाई कोर्ट में जस्टिस एस मुरलीधर के तबादले का जो घटनाक्रम हुआ उससे भी सरकार के ऊपर सवाल उठे हैं और साथ ही न्यायपालिका के कामकाज का सवाल भी उठा है। जस्टिस एस मुरलीधर ने भड़काऊ भाषण देने वालों पर 24 घंटे में एफआईआर करने का आदेश दिया तो अगले ही दिन दूसरी बेंच ने पुलिस को एक महीने का समय दे दिया। हालांकि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले में सुधार किया। पर खुद सुप्रीम कोर्ट ने शाहीन बाग में चल रहे धरने को लेकर जैसा रवैया अख्तियार किया है वह भी समझ में नहीं आने वाला है।

कुल मिला कर ऐसा लग रहा है कि देश की उच्च न्यायपालिका इन दिनों संक्रमण के दौर से गुजर रही है। पर ऐसा नहीं है कि पहली बार इस तरह का दौर आया है। पहले भी इस तरह का दौर रहा है। इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री रहते न्यायपालिका को नियंत्रित करने के अनेक प्रयास हुए। वरिष्ठ जजों की अनदेखी करके जूनियर जज को चीफ जस्टिस बनाया गया। यह काम लगातार दो बार हुआ। प्रतिबद्ध न्यायपालिका के लिए सरकार का वह पहला प्रयास था। फिर अब जबकि 30 साल के बाद केंद्र में मजबूत और पूर्ण बहुमत वाली दो लगातार सरकारें बनी हैं तब भी वहीं प्रयास हो रहा है। बीच के समय में जब केंद्र में गठबंधन की और अपेक्षाकृत कमजोर सरकारें थीं, तभी न्यायपालिका का स्वतंत्र व निष्पक्ष स्वरूप सबसे बेहतरीन रूप से उभरा था। तभी यह सवाल उठ रहा है कि क्या मजबूत कार्यपालिका स्वतंत्र व निष्पक्ष न्यायपालिका के लिए चुनौती है? ध्यान रहे इस सरकार के साथ न्यायिक नियुक्तियों और तबादलों को लेकर न्यायपालिका का संघर्ष काफी समय चला है और एक तत्कालीन चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर के तो प्रधानमंत्री के सामने आंसू निकल गए थे। सो, अब यह न्यायपालिका को ही तय करना है कि उसकी साख, स्वतंत्रता और निष्पक्षता कैसे बची रहेगी।

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