फ्रांस से फरीदाबाद तक एक सी कहानी!

फ्रांस में एक कट्टरपंथी मुस्लिम युवक ने एक स्कूल शिक्षक की गला काट कर हत्या कर दी। स्कूल शिक्षक का दोष यह था कि उसने क्लासरूम में बच्चों को पैगबंर मोहम्मद का एक कार्टून दिखाया था। उन्होंने यह भी कहा था कि अगर किसी छात्र को यह पसंद नहीं है तो वह क्लास से बाहर चला जाए। बाद में युवक ने शिक्षक का पीछा किया और उसकी गला काट कर हत्या कर दी। हत्या करने वाला युवक महज 18 साल का था। सोचें, 18 साल की उम्र में उसके दिमाग में यह कट्टरता किसने भरी कि वह फ्रांस जैसे उदार और लोकतांत्रिक देश में रहते हुए भी ऐसा हो गया! फ्रांस की घटना ने पूरी दुनिया में स्वतंत्र, उदार, और लोकतांत्रिक सोच रखने वाले लोगों को आंदोलित किया है। तो दूसरी ओर इस्लामिक दुनिया अलग ही रास्ते पर चल रही है। मुस्लिम देशों में उलटे फ्रांस के बहिष्कार की मुहिम छिड़ी है। कहीं से यह समझदार आवाज सुनने को नहीं मिल रही है कि फ्रांस में 18 साल के युवक ने जो किया वह गलत है।

अभी फ्रांस का आग भड़क ही रही थी कि भारत में राजधानी दिल्ली से सटे फरीदाबाद में एक मुस्लिम युवक ने 20 साल की एक युवती की गोली मार कर हत्या कर दी। वह उस युवती के ऊपर शादी का दबाव बना रहा था। उसने फोन करके या सामने से लड़की को कई बार धर्म परिवर्तन करने और शादी करने के लिए मजबूर करने का प्रयास कर चुका था। युवती के परिजनों ने उसके खिलाफ मुकदमा भी दर्ज कराया था लेकिन उसके माफ मांगने के बाद मुकदमा वापस कर लिया गया था। उसने मंगलवार को स्कूल से लौट रही युवती को सरेराह अगवा करने का प्रयास किया और विरोध करने पर गोली मार कर हत्या कर दी। इस घटना को लेकर पूरी राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र आंदोलित है और देश के दूसरे हिस्सों में भी इस पर प्रतिक्रिया हो रही है।

फ्रांस के सेंट होनोरिन इलाके में हुई घटना और फरीदाबाद की घटना की तुलना को लेकर कहा जा सकता है कि दोनों घटनाओं का प्रकृति अलग थी। फ्रांस में पैगंबर मोहम्मद के कार्टून को लेकर हत्या हुई है, जिस पर पहले भी वहां शार्ली हेब्दो नाम की पत्रिका के दफ्तर पर हमला करके लोगों को मारा गया था। वह धार्मिक कट्टरता और एक तरह से जिहाद का मामला है। और फरीदाबाद की घटना निजी है। लेकिन इस फर्क के बावजदू व्यापक संदर्भ में दोनों घटनाएं एक जैसी हैं और एक खास प्रवृत्ति की ओर इशारा हैं। दोनों ही घटनाओं को अंजाम देने वालों की मानसिकता एक जैसी है। दोनों ने यह मान कर कत्ल किया कि वह कोई अपराध नहीं कर रहा है। दोनों इस सोच से प्रभावित हैं, जो हमारे जैसा नहीं है, काफिर है उसे कुफ्र नहीं है, बल्कि शबाब का काम है। ऐसे काम से अल्लाह खुश होगा।

दोनों कातिलों की सोच यह है कि कोई हमारा विरोध कैसे कर सकता है? सारे लोग हमारी तरह क्यों नहीं सोच रहे हैं और जो हमारी तरह नहीं सोच रहा है, हमारा विरोध कर रहा है, हमारी बात नहीं मान रहा है, उसे जीने का हक नहीं है। यह पूरी दुनिया में इस्लामिक कट्टरता का बीज मंत्र है, जिसे खत्म करने का प्रयास इस्लामिक दुनिया का कोई देश नहीं कर रहा है। कोई बुद्धिजीवी इसका प्रयास नहीं कर रहा है। इस कट्टरता को बढ़ावा देकर दुनिया की मुस्लिम आबादी अपने को बाकी दुनिया से अलग थलग कर रही है। ध्यान रहे यूरोप में फ्रांस सबसे उदार और सहिष्णु देश है, जिसने अपने यहां अरब दुनिया से शरणार्थी बन कर आए लाखों मुसलमानों को आश्रय दिया। सीरिया, लीबिया से पलायन करने वाले मुस्लिम, जिनके लिए सऊदी अरब और तुर्की जैसे सिरमौर मुस्लिम देशों ने अपने देश के दरवाजे बंद कर दिए उनको फ्रांस ने अपने यहां शरण दी। वह फ्रांस और पूरा यूरोप आज मुस्लिम कट्टरता के विरोध में खड़ा है। इस्लामिक आतंकवाद के खिलाफ यूरोप के खड़े होने का खामियाजा थोड़े से उदार और भले मुस्लिमों को भी भुगतना पड़ सकता है।

शिक्षक की हत्या पर अफसोस करने और अपने गिरेबान में झांक कर देखने की बजाय दुनिया की मुस्लिम जमात फ्रांस पर टूट पड़ी है। उन्हें इस बात से कोई शिकायत नहीं है कि 18 साल के एक मुस्लिम युवक ने एक शिक्षक की गला काट कर हत्या कर दी। उन्हें इस बात की शिकायत है कि फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने इस्लामिक कट्टरता की बात क्यों की और क्यों वहां की सरकार मदरसों, मस्जिदों और मुस्लिमों के खिलाफ कार्रवाई कर रही है। ध्यान रहे कार्टून दिखाने पर शिक्षक की हत्या के बाद फ्रांस के सहिष्णु नागरिकों ने वहां की दिवारों को ऐसे कार्टून से भरना शुरू किया है। वहां इस किस्म के कई और प्रतीकात्मक विरोध हो रहे हैं।

इस्लामी दुनिया की मसीहा बनने की जी-तोड़ कोशिश में लगे तुर्की से लेकर पाकिस्तान, बांग्लादेश जैसे लोकतांत्रिक देशों ने भी फ्रांस के बहिष्कार की अपील की है। फ्रांस में बनी चीजों के बहिष्कार के तुर्की को ऐलान के बाद खाड़ी में कई देशों में दुकानों से फ्रांस के बने सामान हटा लिए गए। गौरतलब है कि फ्रांस में बने सौंदर्य प्रसाधनों की दुनिया में बहुत साख है और ये बेहद महंगे दामों पर बिकते हैं। खाड़ी के कई देशों में इनका बड़ा बाजार है। वहां इन उत्पादों का बहिष्कार हो रहा है। पाकिस्तान सरकार ने फ्रांस के राजदूत को बुला कर इस बात पर विरोध जताया कि राष्ट्रपति मैक्रों इस्लामोफोबिया को बढ़ावा दे रहे हैं। बांग्लादेश की राजधानी ढाका में भी फ्रांस के खिलाफ प्रदर्शन हुआ और फ्रांसीसी सामानों के बहिष्कार की घोषणा हुई है।

ऐसा करके असल में इस्लामी दुनिया फ्रांस को अलग-थलग नहीं कर रही है, बल्कि खुद को अलग-थलग कर रही है। खुद को दुनिया की नजर में गिरा रही है। उनके प्रति दुनिया में असहिष्णुता बढ़ रही है। अमेरिका से लेकर यूरोप और भारत से लेकर चीन तक कहीं भी उनके प्रति सद्भाव नहीं है। इस हकीकत को समझ कर खुद को बदलने की बजाय मुस्लिम जमात में उलटे मध्यकालीन मानसिकता मजबूत हो रही है।

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