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कश्मीर और एलओसी का नया मोर्चा!

अजित कुमार- केंद्र सरकार ने पांच अगस्त को जम्मू कश्मीर पर ऐतिहासिक फैसला किया था। उसे विशेष राज्य का दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 के ज्यादातर प्रावधानों को खत्म कर दिया गया और जम्मू कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांट दिया गया। उसी समय विपक्षी पार्टियों के तमाम बड़े नेताओं को नजरबंद कर दिया गया और संवेदनशील इलाकों में कई किस्म की पाबंदियां लागू कर दी गईं। जम्मू क्षेत्र के कुछ नेता नजरबंदी से रिहा हुए हैं पर घाटी के बड़े नेताओं, जिनमें तीन पूर्व मुख्यमंत्री भी  शामिल हैं, उनको नजरबंद रखा गया है और वह भी जन सुरक्षा अधिनियम यानी पीएसए के तहत।

राज्य के ज्यादातर इलाकों में अब भी इंटरनेट और मोबाइल पर पाबंदी लगी है। पिछले करीब साढ़े चार महीने में सरकार का पाबंदी और नजरबंदी का यह फैसला कारगर दिखा है। राज्य में शांति रही है और तभी गृह मंत्री अमित शाह ने कई बार कहा कि अनुच्छेद 370 में बदलाव के फैसले के बाद जम्मू कश्मीर में सुरक्षा बलों को एक भी गोली चलाने की जरूरत नहीं पड़ी है।

पर अब हालात बदल सकते हैं। अब कश्मीर घाटी और नियंत्रण रेखा पर नया मोर्चा खुल सकता है। सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत ने इस बारे में जो बयान दिया है उसे मामूली नहीं समझना चाहिए। वे 31 दिसंबर को रिटायर होने वाले हैं और उसके बाद चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ बनेंगे। यानी सेना के तीनों हिस्से उनकी कमान में होंगे। उन्होंने कहा है कि नियंत्रण रेखा पर किसी भी समय हालात बिगड़ सकते हैं और भारतीय सेना उसका मुंहतोड़ जवाब देने के लिए पूरी तरह से तैयार है। सेना प्रमुख पहले भी इस तरह के बयान देते रहे हैं। पर इस समय स्थितियां अलग हैं तभी उनका बयान भी ज्यादा अहम है।

इस समय पाकिस्तान बुरी तरह से बौखलाया हुआ है। इसके दो कारण हैं। पहला कारण तो जम्मू कश्मीर की संवैधानिक स्थिति में बदलाव है, जिसके बाद उसका विशेष दर्जा खत्म हो गया है और राज्य का बंटवारा भी हो गया है। दूसरा, कारण संशोधित नागरिकता कानून है, जिसके आधार पर सरकार पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से भारत में आए गैर मुस्लिम शरणार्थियों को भारत की नागरिकता देगी। इसे लेकर पूरे देश में अलग आंदोलन चल रह हैं, जिसका असर देर सवेर कश्मीर में होना है। पर पहले पाकिस्तान की चिंता को समझने की जरूरत है, जिसकी वजह से सीमा पर हालात बिगड़ने का अंदेशा है।

भारत में हुए इन दो संविधान संशोधनों के बाद पाकिस्तान के हुक्मरानों और सेना पर वहां की आवाम का दबाव है। उन्हें भारत के विरोध में कुछ बड़ा करना है। तभी कहा जा रहा है कि पाकिस्तान ने अपने यहां संवैधानिक बदलाव करके अपने कब्जे वाले कश्मीर का स्टैट्स बदलने की तैयारी कर रहा है। पाकिस्तान अपने कब्जे वाले कश्मीर को मेनलैंड पाकिस्तान में मिलाना चाह रहा है। भारत ऐसा कतई नहीं होने देगा। क्योंकि पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर को भारत अपना मानता है। भारतीय संसद में एक प्रस्ताव पास करके कहा गया है कि पाक अधिकृत कश्मीर को भारत में मिलाना है। उसके लिए राज्य की विधानसभा और लोकसभा में भी सीटें खाली रखी गई हैं। इसलिए पाकिस्तान अगर अपने कब्जे वाले कश्मीर की संवैधानिक स्थिति में बदलाव का कोई भी प्रयास करता है तो भारत बहुत तीखी प्रतिक्रिया देगा। सेना प्रमुख का इशारा उस ओर भी हो सकता है।

पाकिस्तान इस बात को अच्छी तरह से समझ रहा है इसलिए वह भी सीमा पर अपनी तैयारियां कर रहा होगा। इस बीच पिछले चार महीने में यानी अगस्त में भारत सरकार के फैसले के बाद से संघर्षविराम का उल्लंघन करके सीमा पार से होने वाली फायरिंग में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है। संसद में दी गई जानकारी के मुताबिकत अगस्त से अक्टूबर के बीच में साढ़े नौ सौ बार संघर्षविराम का उल्लंघन हुआ है। सर्दियों में इसमें कमी आनी चाहिए पर वह ऐसा नहीं हो रहा है। ध्यान रहे 1971 की लड़ाई भी दिसंबर में इसलिए हुई थी ताकि बर्फ से हिमालय के ढक जाने के बाद पाकिस्तान को अपने ‘ऑल वेदर फ्रेंड’ चीन की मदद न मिले।

तभी यह कयास भी लगाए जा रहे हैं कि क्या इन सर्दियों में भी ऐसा कुछ हो सकता है। भारत के मौजूदा निजाम के नेता जिस अंदाज में पीओके को अपना बता रहे हैं उससे लग रहा है कि देर सवेर भारत उसे अपना बनाने की पहल करेगा। बहरहाल, संशोधित नागरिकता कानून को लेकर भी कश्मीर घाटी में खदबदाहट है। लेकिन पाबंदियों और विपक्षी नेताओं के नजरबंद होने की वजह से यह आंदोलन की शक्ल नहीं ले पा रहा है। तभी कहा जा रहा है कि पाबंदियां हटेंगी और नेताओं कि रिहाई होगी तो आंदोलन तेज होगा।

हालांकि कई जानकार यह भी मान रहे हैं कि उससे पहले भी कश्मीर घाटी में नागरिकता कानून और नागरिक रजिस्टर को लेकर विरोध शुरू सकता है। पुराने नेताओं की बजाय राजनीति में उतरे शहला रशीद या शाह फैसल जैसे नए लोग इस आंदोलन की कमान संभाल सकते हैं। अभी हालांकि इनकी लड़ाई ट्विटर पर ही है लेकिन जमीनी स्तर पर नाराजगी की खबरों से इनकार नहीं किया जा सकता है। अब देखना है कि उप राज्यपाल शासन कब तक राजनीतिक बंदियों को नजरबंदी से रिहा करता है।

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