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Saturday, April 17, 2021
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वैश्विक महामारी और डब्लुएचओ

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कोरोना वायरस की वैश्विक महामारी के बीच विश्व स्वास्थ्य संगठन, डब्लुएचओ की भूमिका को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। यह विस्तृत अध्ययन का विषय है कि पिछले साल नवंबर से लेकर जब तक वायरस का प्रकोप रहता है, तब तक उसने क्या किया। निश्चित रूप से यह अध्ययन होगा क्योंकि अमेरिका सहित अनेक विकसित देशों ने उसकी भूमिका पर सवाल उठाया है। पर वह जब होगा, तब होगा लेकिन उससे पहले एक खास भूमिका उसकी स्पष्ट दिख रही है और वह है लोगों को डराने की। जैसे ही दुनिया भर में कोरोना वायरस से मुक्ति की कोई अच्छी खबर आती है, डब्लुएचओ की ओर से डराने वाला बयान आ जाता है।

ताजा मामला वैक्सीन को लेकर है। दुनिया में वैक्सीन को लेकर जो परीक्षण चल रहे हैं उनमें से कम के कम दो परीक्षण ऐसे हैं, जो तीसरे चरण में पहुंच गए हैं और पहले दो चरण के उनके नतीजे बहुत उत्साहजनक हैं। इसमें रूस और चीन के परीक्षण शामिल नहीं हैं। ध्यान रहे ये दोनों देश डब्लुएचओ की किसी गाइडलाइन का पालन नहीं कर रहे हैं। ये अपने यहां वैश्विक महामारी से अपने हिसाब से लड़ रहे हैं। संक्रमण से लेकर मरने तक के मामले में ये डब्लुएचओ के मानकों का पालन नहीं कर रहे हैं तभी चीन ने संक्रमण खत्म होने का ऐलान कर दिया तो रूस भी उस दिशा में बढ़ रहा है।

वैक्सीन की ट्रायल में भी इन दोनों देशों ने किसी को सूचना नहीं दी कि उसने कब पहला परीक्षण किया, कब दूसरा और तीसरा किया। सीधे वैक्सीन के सफल होने का ऐलान किया। इसलिए इन दो देशों में बन रही वैक्सीन अपनी जगह है। इन दो के अलावा ब्रिटेन में और अमेरिका में दो परीक्षण पूरी तरह से सफल रहे हैं और तीसरा ट्रायल शुरू होने के साथ ही कंपनियां उत्पादन शुरू कर देंगी।

ब्रिटेन की लैब और उसकी सहयोगी एस्ट्रोजेनेका की मदद से बन रही वैक्सीन का बड़ा हिस्सा भारत में उत्पादित होगा। पुणे की सीरम इंस्टीच्यूट ऑफ इंडिया ने कोविशील्ड नाम से बनने वाले इस टीके की पैकिंग की फोटो जारी की है और इसके सीईओ अदार पूनावाला ने दावा किया है कि साल के अंत में उनकी वैक्सीन भारत में आ जाएगी। वे शुरुआत में 40 करोड़ डोज तैयार कर रहे हैं और अगले साल तक एक अरब डोज तैयार हो जाएगा। उन्होंने यह भी बताया है कि इसके एक डोज की कीमत एक हजार से कम रहेगी। यह वैक्सीन और भी देशों में उत्पादित होगी। रूस की वैक्सीन अगस्त में आ जाएगी वह अपने लोगों को टीका लगाना शुरू कर देगा। चीन भी सितंबर तक अपने लोगों को टीका लगाने की स्थिति में होगा। अमेरिकी कंपनी मॉडेर्ना का टीका भी अक्टूबर तक आने की उम्मीद है।

जिस समय पूरी दुनिया में वैक्सीन को लेकर इतनी उत्साहजनक खबर आई उसके एक दिन बाद ही डब्लुएचओ ने कहा कि कोरोना की वैक्सीन अगले साल से पहले नहीं आने वाली है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के इस बयान का अर्थ नहीं समझ में आने वाला है। रूस का तीसरे चरण का परीक्षण पूरा हो गया है और वह अगस्त के अंत में या ज्यादा से ज्यादा सितंबर के पहले हफ्ते में लोगों को वैक्सीन देना शुरू करेगा तो क्या डब्लुएचओ उसे रोक लेगा? जब उसने डब्लुएचओ को कुछ बताए बगैर वैक्सीन बनाई है तो वह क्यों उससे पूछ कर वैक्सीन लांच करेगा? यहीं काम चीन भी करेगा, जो अपने सैनिक अस्पताल में परीक्षण कर रहा है। लोगों को डराने के सिवाए डब्लुएचओ की बात का कोई मतलब नहीं निकलता है। कोरोना के बारे में डब्लुएचओ ने सबसे ज्यादा डर, पैनिक और अफवाहें फैलाईं, जिसका फायदा मास्क, सैनिटाइजर बनाने वालों से लेकर दवा बनाने वालों तक ने उठाया। वहीं काम वह अब भी कर रहा है।

याद करें आधा दर्जन देशों को छोड़ कर सारी दुनिया में कोरोना वायरस काबू होने लगा था तो विश्व स्वास्थ्य संगठन ने क्या कहा था। उसके बयान दिया था कि हालात अभी बद से बदतर होंगे। सवाल है कि कैसे बद से बदतर हालात होंगे? जब खुद डब्लुएचओ कह रहा है कि 80 फीसदी से ज्यादा असिम्पटमैटिक मरीज हैं, 85 फीसदी से ज्यादा लोग अपने आप ठीक हो रहे हैं, संक्रमण और मृत्यु की दर दोनों कम हो रही है, डब्लुएचओ से मान्यता प्राप्त दवाएं असर कर रही हैं तो फिर हालात बद से बदतर कैसे होंगे?

ध्यान रहे दुनिया में चार-छह देशों को छोड़ कर बाकी देशों में कोरोना का असर या तो खत्म हो रहा है या उनका असर हुआ ही नहीं। इस समय दो से सवा दो लाख केसेज पूरी दुनिया में हर दिन आ रहे हैं, जिसमें से आधे से ज्यादा केस सिर्फ तीन देशों से आ रहा है। अमेरिका, भारत और ब्राजील को मिला कर हर दिन डेढ़ लाख केसेज आ रहे हैं। इसके अलावा पेरू, मेक्सिको, चिली जैसे थोड़े से देश हैं, जिनके यहां संक्रमण तेजी से फैल रहा है। लेकिन दुनिया के बड़े हिस्से ने इसे रोक दिया है। लगभग पूरे यूरोप में संक्रमण थम गया है, ऑस्ट्रेलिया महादेश भी काफी हद तक इससे मुक्त हो गया है। अफ्रीका की स्थिति यह है कि दस हजार से ज्यादा मामले वाले कुल 75 देशों में उस महादेश के सिर्फ चार देश हैं। इनमें भी दो देश सबसे नीचे हैं। शीर्ष 50 देशों में से अफ्रीका का सिर्फ एक देश दक्षिण अफ्रीका है।

इसके बावजूद डब्लुएचओ दुनिया के देशों और लोगों को डराने में लगा है कि स्थिति बद से बदतर होगी। अगर सचमुच ऐसा होना भी है तो उसका काम देशों को सलाह देना है। वह सरकारों से बात करे, उन्हें हालात के बारे में समझाए, जरूरी उपाय सुझाए परंतु वह करने की बजाय यह विश्व संगठन सिर्फ बयान जारी कर दे रहा है। जब उसे अपनी भूमिका निभानी थी तब उसने चुप्पी साधे रखी और चीन से संक्रमण सारी दुनिया में फैलने दिया। अब जांच के नाम पर दो लोगों की एक टीम चीन भेज कर उस पर लीपापोती कर रहा है और दूसरी ओर दुनिया को इस बात से डरा रहा है कि संक्रमण की स्थिति बद से बदतर होगी और वैक्सीन अगले साल तक नहीं आने जा रही है।

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