नागरिकता कानून बदलने की राजनीति

अजित कुमार

लगातार दूसरी बार चुनाव जीत कर ज्यादा बहुमत के साथ केंद्र सरकार में आने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने एक झटके में जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को खत्म किया और तीन तलाक को अपराध बनाने का कानून पास कराया। इसके तुरंत बाद सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण का रास्ता साफ हो गया, जिसके लिए अमित शाह ने आसमान छूने वाला मंदिर बनेगा।

तब यह सवाल उठा कि भाजपा के सारे ऐतिहासिक एजेंडे पूरे हो जाएंगे तो पार्टी आगे क्या करेगी? उसका जवाब मिल गया है। भाजपा ने आगे के लिए नया एजेंडा तैयार कर दिया है। वह एजेंडा नागरिकता है।

केंद्र सरकार ने छह दशक से ज्यादा पुराने नागरिकता कानून में बदलाव के विधेयक को मंजूरी दे दी है। सरकार अडिग है कि इसे संसद के चालू सत्र में पास कराया जाएगा। इस विधेयक के जरिए धर्म के आधार पर भारत की नागरिकता देने का प्रावधान किया गया है। कोई भी गैर मुस्लिम अगर किसी पड़ोसी देश से धर्म के आधार पर उत्पीड़न का शिकार होकर भारत में आता है तो उसे एक से छह साल की अवधि के बीच भारत की नागरिकता मिल जाएगी। पहले धार्मिक भेदभाव नहीं था और समय सीमा 11 साल की थी। सरकार इसमें धर्म का प्रावधान कर रही है और समय सीमा घटा रही है।

समय सीमा को लेकर ज्यादा सवाल नहीं है पर धर्म के आधार पर नागरिकता का फैसला करने के कानून से संविधान के बुनियादी उसूल प्रभावित होते हैं। हालांकि इस विधेयक का समर्थन कर रहे लोगों की बात भी अपनी जगह सही है। उनका कहना है कि दुनिया में दूसरा कोई देश हिंदुओं के लिए नहीं है। हर धर्म के लोगों के अपने देश हैं और उनको वहां शरण भी मिलती है। सो, अगर हिंदू या भारत में पैदा हुए दूसरे किसी धर्म जैसे सिख, जैन, बौद्ध आदि के लोग कहीं प्रताड़ित होते हैं तो भारत में उनको शरण निश्चित रूप से मिलनी चाहिए।

भारत सरकार विधेयक लाती रहती है। पुराने कानून हटाए जाते हैं और नए कानून बनाए जाते हैं। पर नागरिकता कानून में संशोधन का बिल रूटीन का या सामान्य किस का बिल नहीं है। यह संवैधानिक, सामाजिक और राजनीतिक रूप से भी बेहद अहम बिल है। सबसे पहले तो इस बिल को लेकर संवैधानिक सवाल खड़े हो रहे हैं। संविधान के अनुच्छेद 14 में धर्म, जाति, नस्ल, रंग आदि के आधार पर किसी से भेदभाव नहीं करने का प्रावधान किया है। संविधान की प्रस्तावना में भारत को धर्मनिरपेक्ष बनाया गया है। इसलिए यह सवाल उठता है कि भारत कैसे धर्म के आधार पर भेदभाव कर सकता है? कानून बनने के बाद इसी आधार पर इसको अदालत में चुनौती मिलेगी।

संवैधानिक और कानूनी सवालों से ज्यादा इसका सामाजिक असर होने वाला है। अब तक इस देश में हिंदू, मुस्लिम और दूसरे धर्मों के लोग मोटे तौर पर सद्भाव के साथ रहते आए हैं। यहां के मुस्लिम और ईसाई भी यहीं के रहने वाले हैं और उनकी जड़ें हिंदू पूर्वजों तक जाती हैं। इसलिए उनकी संस्कृति मोटे तौर पर हिंदुओं वाली ही रही है। तभी थोड़े से अपवादों को छोड़ कर यहां के मुस्लिम आतंकवादी गतिविधियों में नहीं शामिल हुए। पर जब धर्म के आधार पर भेद होना शुरू होगा तो भले एक मामले से शुरू हो पर उससे अविश्वास की भावना पैदा होगी और समाज का पूरा तानाबाना प्रभावित होगा।

असल में यह बिल असम में बनाए गए राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर, एनआरसी का ही स्वाभाविक विस्तार है। असम में सुप्रीम कोर्ट के आदेश से जो एनआरसी बनी उसमें 19 लाख लोगों के नाम शामिल नहीं हुए। ये 19 लाख लोग विदेशी घुसपैठिए हो गए। इनमें बड़ी संख्या हिंदुओं की भी है। तभी भाजपा ने इस एनआरसी को मानने से इनकार कर दिया है। अगर केंद्र सरकार नागरिकता कानून में संशोधन कर देती है तो असम के पुराने एनआरसी से भी भाजपा का काम हो जाएगा।

इस विधेयक के कानून बन जाने के बाद असम के 19 लाख कथित घुसपैठियों में से जो हिंदू हैं उनको भारत की नागरिकता मिल जाएगी और उस रजिस्टर में शामिल सारे मुस्लिम अवैध घुसपैठिए ठहरा दिए जाएंगे। तभी असम और समूचे पूर्वोत्तर में कई पार्टियां इस कानून के विरोध में सड़क पर उतरी हैं। बहरहाल, सरकार पूरे देश में एनआरसी लागू करने की बात कर रही है। उस समय भी जो हिंदू, सिख या बौद्ध, जैन और ईसाई भारत के नागरिक होने का प्रमाणपत्र नहीं दे पाएंगे उनको इस कानून के जरिए नागरिकता मिल जाएगी।

यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि सरकार नागरिकता कानून में जो बदलाव करने जा रही है वह पूरी तरह से राजनीतिक है। यह पूरा बिल ही राजनीति मकसद से लाया जा रहा है। असल में भाजपा कश्मीर, राम मंदिर, समान नागरिक संहिता आदि के मुकाबले कुछ ज्यादा बड़ा मुद्दा लाना चाहती थी, जिससे धार्मिक आधार पर स्पष्ट ध्रुवीकरण हो। इस कानून के जरिए बहुत स्पष्ट धार्मिक ध्रुवीकरण होगा।

जब सरकार पूरे देश में एनआरसी लागू करेगी तो समाज में तनाव बढ़ेगा। सरकार देश भर में एनआरसी के लिए जो भी समय सीमा तय करेगी और जो भी दस्तावेज मांगे जाएंगे, इतना तय है कि उससे करोड़ों मुस्लिम प्रभावित होंगे। इससे देश भर में तनाव बढ़ेगा और उसका फायदा यह होगा कि हिंदुओं में भाजपा के प्रति समर्थन बढ़ेगा। भाजपा उनके लिए स्वाभाविक पसंद की पार्टी बनेगी। अभी यह किसी को समझ में नहीं आ रहा है पर इस कानून के लागू होने और पूरे देश में एनआरसी लागू करने से देश में विभाजन के समय वाले हालात बन सकते हैं, जिसकी एकमात्र लाभार्थी पार्टी भाजपा होगी।

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