दो दलों के बीच पिसता बेबस किसान

भाजपा की केंद्र में और कांग्रेस की राज्य में सरकार है। दोनों ही दल किसानों की उपेक्षा का आरोप एक-दूसरे पर लगा रहे। किसान का एक-एक हाथ दोनों दल अपनी-अपनी ओर खींच रहे। किसान भाग्यविधाता ही नहीं अब सरकार का निर्माता भी है। यही कारण है कि दोनों दलों की सरकारें भले ही अब तक किसानों का कष्ट दूर न कर पाई हों लेकिन किसानों की हिमायती बनने की होड़ में शामिल जरूर हो गई है।
सोमवार को पूरे प्रदेश में किसानों पर राजनीति करने का दोनों दलों कांग्रेस और भाजपा का तरीका देखा।

प्रदेश में सत्ताधारी दल कांग्रेस किसानों के मामले में केंद्र सरकार पर भेदभाव करने का आरोप लगा रही है और सभी जिला मुख्यालय पर कांग्रेसियों ने प्रदर्शन कर कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में कहा गया है कि अतिवृष्टि से प्रदेश भर में हुए नुकसान के लिए प्रदेश सरकार ने केंद्र से पैसा मांगा है लेकिन केंद्र सरकार ने भेदभाव करते हुए अब तक एक पैसा भी नहीं दिया है जबकि कर्नाटक और बिहार को यह राशि दे दी गई। प्रदेश के साथ पक्षपातपूर्ण रवैया से यहां के किसानों और अतिवृष्टि से प्रभावित हुए लोगों को पूरी तरह से राहत नहीं मिल पा रही है।

वहीं दूसरी ओर केंद्र में सत्तारूढ़ दल भाजपा ने पूरे प्रदेश में किसान आक्रोश आंदोलन एक साथ किया। इस दौरान बिजली के भारी भरकम बिल आने पर बिलों की होली जलाई गई और कर्ज माफी तथा बाढ़ राहत का मुआवजा नहीं मिलने पर कमलनाथ सरकार के खिलाफ नारेबाजी की गई। कुछ जिलों में धारा 144 लागू होने के बावजूद भाजपा नेताओं ने सरकार के विरुद्ध प्रदर्शन में भाग लिया। नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने जहां राजधानी भोपाल में वहीं पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान रीवा में और प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह ने नरसिंहपुर में किसान आंदोलन का नेतृत्व किया। अन्य जिलों में भी भाजपा के दिग्गज नेताओं ने किसान आक्रोश आंदोलन में भाग लिया।

कुल मिलाकर प्रदेश में बेबस किसान कभी भाजपा तो कभी कांग्रेस की सरकार बनवाता है लेकिन किसान की स्थिति जस की तस बनी रहती है। इसी दौरान कभी किसान आत्महत्या करता है तो कभी आंदोलन करता है और जब-जब किसान करवट लेता है तब-तब सरकारें बदलती हैं। प्रदेश में मंदसौर गोलीकांड के बाद किसानों के आक्रोश से 15 वर्षों की भाजपा सरकार के पैर उखड़ गए। इसके पहले कांग्रेस के 10 वर्षों की सरकार को भी किसानों ने ही प्रदेश से हटाया था। यही कारण है कि दोनों दलों की सरकारें किसानों के कष्ट भले ही दूर न कर पाई हों लेकिन किसानों के हिमायती बनने की होड़ में शामिल रहती है और जैसे दो पाटों के बीच अनाज पिसता है वैसे ही दोनों दलों के बीच इस समय किसान पिस रहा है। दोनों ही दल इस समय किसान को नाराज नहीं होने देना चाहते। प्रदेश में पंचायतों और नगरीय निकाय के चुनाव होना हैं। बीच-बीच में उपचुनाव आ जाते हैं। लेकिन किसान अब उसी दल की तरफ रुख करेगा जो उसे मुसीबत से निकालने में मदद करेगा। दोनों दलों के पास मौका है कि वे किसानों पर राजनीति करने की बजाय किसानों के कष्ट दूर करने के लिए ठोस प्रयास करें।

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