विवादों में हिंदी फिल्म उद्योग

कोरोना वायरस की वजह से बड़ा आर्थिक संकट झेल रहे हिंदी फिल्म उद्योग के सामने एक नया संकट खड़ा हो गया है। हिंदी सिनेमा की युवा पीढ़ी के सबसे बेहतरीन अभिनेताओं में से एक सुशांत सिंह राजपूत की खुदकुशी ने हिंदी फिल्म उद्योग की कई समस्याओं को एक साथ सामने ला दिया है। ऐसा नहीं है कि ये समस्याएं नई हैं पर अब तक इन पर किसी न किसी तरीक से परदा डाला जाता रहा है। कई कारणों से फिल्म उद्योग की अंदरूनी सचाई और उसकी मुश्किलें सामने आ गई हैं। इनमें एक कारण कोरोना वायरस भी है, जिसकी वजह से फिल्मों और टेलीविजन धारावाहिकों की शूटिंग अटकी है और अनेक निर्माता-निर्देशक दिवालिया होने की कगार पर पहुंचे हैं।

छोटे-बड़े अनेक कलाकार आर्थिक संकट झेल रहे हैं। इसके अलावा एक कारण ऐसे नए प्लेटफॉर्म का उभरना है, जिस पर फिल्म या धारावाहिक का रिलीज होना पहले से आसान हो गया है। इससे फिल्म उद्योग में चंद लोगों की मजबूत पकड़ ढीली हुई है और एक तीसरा कारण अभिव्यक्ति के नए माध्यम आ गए हैं, जिनसे उद्योग जगत की वैकल्पिक आवाजें भी सुनी जाने लगी हैं।

सबसे पहले कोरोना वायरस की वजह से पैदा हुए संकट और आर्थिक मार झेल रहे फिल्मकारों और कलाकारों की समस्या को समझना होगा। सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या की वजह अभी स्पष्ट नहीं है पर कहीं न कहीं उसमें आर्थिक कारण भी होंगे। यह अनायास नहीं है कि पिछले दो महीने में फिल्म और टीवी जगत से जुड़े अनेक लोगों ने आत्महत्या की है। मनमीत ग्रेवाल, प्रेक्षा मेहता, दिशा सालियान आदि ऐसे नाम हैं, जिन्होंने पिछले दो महीने में खुदकुशी की है। कई और कलाकारों ने खुल कर मदद की अपील की और इधर उधर से मिली मदद के दम पर अपने को बचाया है। जिस उद्योग की कमाई के आंकड़े और चमक दमक से देश का युवा वर्ग पागल हुआ रहता है उसकी एक हकीकत यह भी है।

सुशांत की खुदकुशी से फिल्म उद्योग की एक और फॉल्टलाइन जाहिर हुई है। यह बाहरी बनाम फिल्मी परिवारों के सनातन टकराव का मामला है। कई मुखर अभिनेता, अभिनेत्रियां या फिल्मकार खुल कर इस बात की ओर इशारा कर रहे हैं कि फिल्म जगत में एक माफिया काम करता है, जो बाहरी लोगों को इसमें टिकने नहीं देता है। उन्हें या तो माफिया के सामने सरेंडर करना होता है, उन्हें अपना गॉडफादर बनाना होता है या फिर इंडस्ट्री से बाहर हो जाना पड़ता है। जो ज्यादा संवेदनशील हैं उनका हस्र सुशांत सिंह राजपूत की तरह होगा।

हिंदी फिल्मों में भाई-भतीजावाद पहले भी रहा है। बिल्कुल शुरुआती दिनों में भी दो-चार बंगाली और पंजाबी परिवारों का फिल्म उद्योग पर वर्चस्व रहा। उन परिवारों ने अपने सदस्यों को आगे बढ़ाया पर यह प्रयास नहीं किया कि कोई बाहर का आया हुआ व्यक्ति टिके नहीं या उसके साथ भेदभाव हो।

आखिर कपूर, चोपड़ा, मुखर्जी, बनर्जी परिवारों के बावजूद धर्मेंद्र, अमिताभ बच्चन, राजेश खन्ना जैसे अनेक कलाकार शिखर पर पहुंचे। बिना पारिवारिक पृष्ठभूमि के इन कलाकारों ने दशकों तक फिल्म उद्योग पर राज किया। पर पहले के मुकाबले अब फर्क यह आ गया है कि भाई-भतीजावाद या जिसे अभी माफिया गैंग कहा जा रहा है वह सांस्थायिक हो गया है। चूंकि फिल्म उद्योग का दायरा बहुत बड़ा हो गया है और फिल्मी परिवारों की संख्या भी पहले की तरह सीमित नहीं है, बल्कि बहुत बडी हो गई है इसलिए अब सिर्फ अपने लोगों को प्रमोट ही नहीं करना है, बल्कि दूसरे को रोकना भी है। समस्या और टकराव यहीं से शुरू हुआ है।

एक तरफ अभिव्यक्ति के तमाम माध्यमों का लोकतांत्रिकरण हुआ है। आम लोगों की उन तक पहुंच हुई है और खेल से लेकर फिल्म जगत तक के दरवाजे दूर-दराज के गांवों से आने वालों के लिए खुल हैं। वे अपनी प्रतिभा के दम पर अपनी जगह बना रहे हैं और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए उनका प्रचार और ब्रांडिंग भी हो रही है। कहा जा सकता है कि यह संक्रमण का समय है, जहां फिल्म और टेलीविजन में पहले से जमे लोगों या परिवारों का बाहर से आने वालों के साथ टकराव हो रहा है। यह स्थिति हर जगह है। देश भर में सिर्फ पांच सौ राजनीतिक परिवारों का वर्चस्व है और बाहर से आने वालों को पार्षद, विधायक या सांसद बनने के लिए बडी मशक्कत करनी पड़ती है। उद्योग से लेकर कारोबार, खेल, फिल्म, राजनीति कोई क्षेत्र इससे अछूता नहीं है।

इसके बावजूद हर क्षेत्र में ‘बाहर’ और छोटी जगहों से आए हुए लोग अपनी जगह बना रहे हैं और तरक्की कर रहे हैं। हिंदी फिल्मों में खुद सुशांत इसकी मिसाल हैं। उनके अलावा दर्जनों नए कलाकार हैं, जो बिहार, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, दिल्ली से गए हैं और अपनी प्रतिभा के दम पर अपना मुकाम बनाया है।

वे तमाम गुटबाजी के बावजूद फिल्म जगत में जमे हुए हैं। इसलिए सुशांत की आत्महत्या को जो लोग गुटबाजी से जोड़ रहे हैं असल में वे खुद भी अपना एक गुट चला रहे हैं और यह उनकी राजनीति का हिस्सा है, जिसमें वे एक नौजवान मौत को मोहरा बना रहे हैं। इस घटना के बड़े पहलुओं को देखने की जरूरत है, जिसमें आर्थिक पक्ष भी शामिल है और मानसिक स्वास्थ्य का मसला भी शामिल है, निजी जीवन की परेशानियां तो हमेशा ऐसी घटनाओं में एक कारक रहती ही हैं।

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