हिंदुत्व से हिंदुत्व को मात

यह कांग्रेस के बस का रोग नहीं था कि वह हिंदुत्व के रथ पर सवार भारतीय जनता पार्टी को अपने बूते मात दे पाती| यह नरेंद्र मोदी और अमित शाह का ही घमंड था कि उन्होंने खुद भाजपा को मात दे दी। राजनीति के धुरंधर शरद पवार के लिए यह स्वर्णिम मौक़ा था जो वह हिंदुत्व के टुकड़े करके भाजपा को शिकस्त देते। महाराष्ट्र में हिंदुत्व के टुकड़े होते देख कर हिन्दुत्ववादी शक्तियाँ निराश हैं। तभी उदाहरण दिए जा रहे हैं कि 1761में मराठा इसी तरह अहमद शाह अब्दाली से पानीपत की तीसरी लड़ाई हारे थे।

कांग्रेस तो ऐसी टेढ़ी चाल सोच भी नहीं सकती थी ,जो शरद पवार ने कर दिखाया। कांग्रेस के दिमाग को सूझ नहीं पड रहा था कि उस शिवसेना को किस मुहं से समर्थन देंगे , जिसके अध्यक्ष ने बाबरी मस्जिद तोड़ने की जिम्मेदारी ली थी? उसका कोर मुस्लिम वोट बैंक क्या सोचेगा?बाबरी ढांचा टूटने के बाद से उस का कोर मुस्लिम वोट बैंक खिसकने के बाद कांग्रेस की जो गत बन रही है उस से वह भली भांति परिचित है, इसलिए वह शिवसेना के साथ गठबंधन के खिलाफ थी।

शरद पवार के कहने पर कांग्रेस शिवसेना के साथ सरकार में शामिल होने को सहमत तो हो गई हैलेकिन झिझक अभी भी बनी हुई है। इसलिए न तो सोनिया गांधी खुद उद्धव ठाकरे की शपथ ग्रहण में शामिल हुई और न ही उन के परिवार का कोई सदस्य। राहुल गांधी न सही कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गांधी तो शामिल हो सकती थी लेकिन उन्होंने भी परहेज किया।

हालांकि ठाकरे परिवार के वारिस आदित्य खुद तीनों को न्योता देने पहुंचे थे। ऐसा लगता है कि कांग्रेस का मन नहीं था कि वह यह गलती करे, लेकिन उस ने भाजपा को मात देने के लिए शरद पवार की लोहे को लोहे से काटने की दलील मान ली।

मोदी-शाह ने चुनाव के दौरान तीन बड़ी गलतियाँ की थीं। जिस कारण शरद पवार ने यह चुनाव “करो या मरो” का कफन सर पर बाँध कर लड़ा था। अगर मोदी-शाह की जोड़ी चुनाव से पहले एनसीपी के विधायकों में सेंधमारी न करती , ईडी की जांच सूची में शरद पवार का नाम न जुडवाती और चुनाव अभियान में मोदी खुद शरद पवार के खिलाफ व्यक्तिगत हमले न करते तो वह करो या मरो की रणनीति अपना कर चुनाव मैदान में न कूदते।

मोदी-अमित शाह ने असल में यह चुनाव शरद पवार के खिलाफ ही लडा था इसलिए स्वाभाविक है कि शरद पवार को भी इस का जवाब देना था। अगर भाजपा ने शरद पवार को निशाना बना कर चुनाव न लड़ा होता तो एनसीपी 2014 की तरह ही भाजपा की सरकार बनवा सकती थी।

शरद पवार के लिए इस से बढिया मौक़ा और क्या होता कि जब शिवसेना भाजपा को आँखे दिखा रही थी ,तो उन्होंने दुश्मन का दुश्मन दोस्त वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए शिवसेना से हाथ मिला लिया। भाजपा को मात देने के लिए उन्होंने सोनिया गांधी को राजनीति का पहला पाठ पढाया। कांग्रेस ऐसी राजनीति को समझ ही नहीं पा रही थी , शरद पवार को कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्यों को इस के दूरगामी फायदे समझाने पड़े तब जा कर यह सरकार बनी है।

2014 और 2019 के विधानसभा चुनावों में एक बात साझा है। वह यह है कि 2014 में भाजपा ने शिवसेना को खत्म करने के इरादे से चुनाव लड़ा था , और 2019 में भाजपा ने एनसीपी को खत्म करने के लिए चुनाव लडा| भारतीय जनता पार्टी दोनों ही मकसदों में फेल हो गई। पांच साल बाद शिवसेना ने भाजपा से सत्ता छीन कर बदला ले लिया और शरद पवार ने तो तुरंत राजनीति के चाणक्य होने का सबूत दे दिया।

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