हत्या पर जश्न मनाती भीड़ के खतरे!

अजित कुमार

हैदराबाद में बलात्कार और हत्या के चार आरोपियों के पुलिस ‘मुठभेड़’ में मारे जाने पर पूरे देश में जिस तरह का माहौल देखने को मिला वह एक बड़े खतरे का संकेत है। चाहे जैसे भी हुई हो पर हत्या पर किसी सभ्य समाज का जश्न मनाना व्यापक रूप से समाज में, पुलिस-प्रशासन में और कानून व्यवस्था में किसी बड़ी और गंभीर खामी का भी इशारा है। यह भी मामूली बात नहीं है कि जो चार आरोपी मारे गए उनमें से एक की पत्नी ने कहा कि देश के बाकी आरोपियों को भी इसी तरह मारा जाए और उन्नाव की बलात्कार पीड़ित युवती के पिता ने भी कहा कि उसकी बेटी के हत्यारों के साथ भी हैदराबाद की तरह ही न्याय हो। यानी जो आरोपी है उसके परिजन भी हत्या के पक्ष हैं और जो पीड़ित है उसके परिजन भी हत्या के जरिए ही न्याय चाहते हैं। सोचें, यह कितनी भयावह स्थिति है!

महात्मा गांधी अक्सर कहते थे कि आंख के बदले आंख का सिद्धांत एक दिन पूरी दुनिया के अंधा बना देगा। अफसोस की बात है कि गांधी के अपने देश के लोग उनकी इस बात पर ध्यान नहीं दे रहे हैं। वे आंख के बदले आंख वाले न्याय की ही मांग कर रहे हैं। तभी सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस एसए बोबड़े को कहना पड़ा कि न्याय अगर बदले में तब्दील हो जाएगा उसकी प्रासंगिकता खत्म हो जाएगी। उन्होंने दो बहुत अहम बातें कहीं। पहली यह कि न्याय त्वरित नहीं हो सकता है और दूसरे वह प्रतिशोध की तरह नहीं होना चाहिए।

न्यायिक सिद्धांत के लिहाज से ये दोनों बहुत अहम बातें हैं। क्योंकि त्वरित न्याय होने पर गलती होने की संभावना रहती है और प्रतिशोध की भावना आ जाने पर भी न्याय के गलत होने का अंदेशा रहता है। ऐसे ही अगर न्यायपालिका या पुलिस और प्रशासन लोकप्रिय भावना के आधार पर या सामूहिक चेतना को ध्यान में रख कर कोई भी काम करेगी तो उसमें भी गलती की संभावना रहती है। आम लोग परेशान हैं, उन्हें न्याय मिलने में देरी हो रही है या न्याय नहीं मिल रहा है, अपराधियों के हौसले बढ़े हैं इसलिए लोग तत्काल न्याय चाहते हैं पर उनकी इस तत्काल न्याय की भूख को शांत करने के लिए अगर पुलिस हैदराबाद जैसी कार्रवाई करती रही तो फिर पूरा समाज अराजक हो जाएगा। क्योंकि यह भूख शांत होने की बजाय बढ़ती जाएगी।

यह एक तरह से भीड़ की हिंसा का समर्थन करने जैसा होगा। पिछले कुछ समय से वैसे भी समाज में हिंसा बढ़ी है। मॉब लिंचिंग की घटनाएं अपवाद नहीं रह कर मुख्यधारा का अपराध बन गई हैं। देश के कई राज्यों में गौरक्षा से लेकर बच्चों की तस्करी रोकने या चोरी रोकने के लिए भीड़ ने हिंसा की और आरोपी या कथित आरोपी को पकड़ कर मार डाला। इस तरह की सामूहिक हिंसा को रोकने के लिए सुनियोजित उपाय करने की जरूरत थी पर उसी बीच हैदराबाद की घटना हो गई। इस तरह की घटननाएं अंततः पूरे समाज को और हिंसा के रास्ते पर ले जाएंगी। हैदराबाद की घटना को मौन या मुखर समर्थन देने वाला समाज अंततः भीड़ की हिंसा को भी जायज ठहराएगा, बिना इस बात पर विचार किए कि कभी वह खुद इस किस्म की हिंसा का शिकार हो सकता है।

समाज की इस हिंसा से जुड़े दो तरह के समूह हैं। एक तो वह समूह है, जो कानून हाथ में लेकर भीड़ की हिंसा को अंजाम देता है और दूसरा समूह ऐसा है, जो मनसा, वाचा यानी मन से और अपनी बातों से उस समूह का समर्थन कर रहा है। इस समूह का मुखर समर्थन हैदराबाद की घटना पर देखने को मिला। मध्यवर्गीय लोग, महिलाएं और यहां तक की बच्चे भी पुलिस का समर्थन करते दिखे हैं। असल में इस तरह की घटनाओं से उनके मन में सुरक्षा की एक भ्रामक धारणा बैठती है। उनको लगता है कि अगर सड़क पर न्याय करने वालों की भीड़ रहेगी या पुलिस इस तरह त्वरित न्याय करेगी तो वे अपने घरों में सुरक्षित रहेंगे। यह भ्रामक धारणा उनके अपने लिए, एक समाज के लिए और अंततः देश के लिए बहुत घातक है।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि एक खास राजनीतिक विचारधारा के पोषण के लिए और चुनावी लाभ के लिए समाज को हिंसक बनाने का व्यवस्थित प्रयास किया जा रहा है। इसमें भी कोई संदेह नहीं है कि इसी प्रयास के तहत हैदराबाद की घटना को लेकर न्यायपालिका को निशाना बनाया जा रहा है। ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि न्याय में देरी होने के लिए सिर्फ अदालतें जिम्मेदार हैं। जबकि यह हकीकत नहीं है। हकीकत यह है कि अपराध न्याय प्रणाली को बेहतर बनाने के लिए जितनी जिम्मेदारी अदालतों की है उतनी ही सरकार की है। पर सरकार से यह सवाल नहीं पूछा जा रहा है कि वह इसके लिए क्या कर रही है।

जजों की नियुक्ति में अपनी भूमिका बढ़ाने के प्रयास के अलावा सरकार कुछ और करती नहीं दिख रही है। न तो जजों की संख्या बढ़ाई जा रही है, न नई अदालतें बन रही हैं, न सपोर्ट स्टाफ की बहाली हो रही है और न पुलिस सुधार हो रहे हैं। लाखों की संख्या में पुलिसकर्मियों के पद खाली हैं। बरसों से पुलिस सुधार की चर्चा है और यह कहा जाता रहा है कि कानून व्यवस्था और अभियोजन यानी मुकदमे देखने वाली पुलिस अलग अलग की जाए। जांच करने वाली पुलिस अलग बने और उसे प्रशिक्षण देकर आधुनिक तकनीक से लैस किया जाए ताकि किसी भी घटना की समयबद्ध जांच हो सके। पर सरकारें ऐसा कुछ नहीं करती हैं। उलटे सुनियोजित तरीके से यह नैरेटिव बनाया जा रहा है कि निर्भया के दोषियों को सजा मिलने में देरी हो या हैदराबाद जैसी घटना हो, सबके लिए जिम्मेदार देश की अदालतें हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि इस किस्म के नैरेटिव के पीछे कौन है और इसका लाभार्थी कौन है!

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