सख्त नहीं, जल्दी न्याय की जरूरत!

शशांक राय

हैदराबाद की एक युवा पशु चिकित्सक की बलात्कार के बाद हत्या की नृशंस घटना पर पूरा देश उद्वेलित है। ऐसा ही राष्ट्रीय आक्रोश और उद्वेलन सात साल पहले दिसंबर 2012 में देखने को मिला था, जब ऐसी ही वीभत्स घटना राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में हुई थी। तब भी पूरा देश निर्भया को न्याय दिलाने के लिए सड़क पर उतरा था। राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा गुस्सा और दुख देखने को मिला, जिसकी मिसाल नहीं है। तब सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया। दिल्ली की साकेत अदालत में फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन किया गया और सभी पांच आरोपियों का मुकदमा शुरू हुआ।

आज सात साल बाद जब देश एक युवा डॉक्टर के साथ हुई अमानवीयता पर शर्मसार है और आक्रोशित है तब तक निर्भया के आरोपियों को सजा नहीं हुई है। सात साल बाद भी आरोपी सजा के इंतजार में हैं। ऐसा लग रहा है कि अब भी उनके पास कुछ विकल्प बचे हुए हैं। सोचें, जिस घटना की सुनवाई पर पूरे देश की नजर थी उसमें सजा होने में सात साल लग गए तो उन हजारों, लाखों मामलों का क्या होता होगा, जो जनता की नजर से दूर हैं? क्या इसी अपराध-न्याय प्रणाली के दम पर हम अपराधियों के मन में भय पैदा कर सकते हैं? उन्हें अपराध करने से रोक सकते हैं?

हैदराबाद की घटना के बाद बिहार और कई दूसरे राज्यों में भी ऐसी घटनाएं हुई हैं। इसे लेकर संसद में चर्चा हुई तो ज्यादातर सांसदों ने सख्त कानून बनाने की मांग की। किसी ने सात दिन में सजा देने की अपील की तो किसी ने चौराहे पर फांसी पर लटकाने की जरूरत बताई। समाजवादी पार्टी की सांसद जया बच्चन तो इतनी जज्बाती हो गईं कि उन्होंने बलात्कारियों के लिए मॉब लिंचिंग की सिफारिश कर दी। पर सवाल है कि इनसे होगा क्या? क्या सख्त सजा का प्रावधान कर देने से अपराध रूक जाएगा? ऐसा नहीं है क्योंकि निर्भया कांड के बाद कई राज्यों में बलात्कार के मामले में मौत की सजा का प्रावधान किया गया है पर उससे भी कोई कमी नहीं आई है।

ध्यान रहे देश में कई अपराधों के लिए मौत की सजा का प्रावधान है। पर उससे वे अपराध नहीं रूक गए हैं। असल में सख्त सजा से ज्यादा जरूरी यह है कि सजा सुनिश्चित की जाए और वह भी एक निश्चित समय सीमा में। भारत में नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो, एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक बलात्कार के सिर्फ 32 फीसदी मामलों में सजा हो पाती है। यानी सौ में सिर्फ 32 आरोपी सजा पाते हैं और 68 आरोपी छूट जाते हैं। यह आंकड़ा 2017 का है। उससे पहले सजा की दर 32 फीसदी से भी कमी थी। सोचें, जिस अपराध-न्याय प्रणाली में इतनी बड़ी खामी हो, उसमें सजा का प्रावधान बढ़ा देने भर से क्या न्याय सुनिश्चित हो जाएगा?

दिल्ली में निर्भया मामले में और हैदराबाद की डॉक्टर के मामले में वकील कह रहे हैं कि वे आरोपियों का मुकदमा नहीं लड़ेंगे। पर सवाल है कि आखिर लाखों की संख्या में हर साल जो बलात्कारी अदालतों में पहंचते हैं उनका मुकदमा कौन लड़ता है? हालांकि इसका यह मतलब नहीं है कि बलात्कार के आरोपियों को वकील नहीं मिलना चाहिए। उनको अपना बचाव करने का पूरा मौका मिलना चाहिए। पर इस तरह का दिखावा नहीं होना चाहिए कि जो मामला हाईलाइट हो जाए तो उसमें मुकदमा नहीं लड़ेंगे और बाकी मामलों में आरोपियों को बचाने के लिए जी जान लगा देंगे। चाहे उसके लिए पीड़ित लड़की को बदनाम ही क्यों करना पड़ा। बहरहाल, सबसे पहली जरूरत अपराध-न्याय प्रणाली को बदलने की है। जांच का तरीका बदले, पुलिस की सोच बदले, सुनवाई का तरीका बदले, समयबद्ध सुनवाई की व्यवस्था हो और जल्दी से जल्दी सजा दिलाने का प्रावधान किया जाए। सजा बेशक दस साल की ही क्यों न हो पर वह मिले जरूर।

अपराध-न्याय प्रणाली के साथ साथ कुछ सामाजिक बदलाव की भी जरूरत है। लड़कियों को लेकर समाज की सोच बदलेगी, तभी वास्तविक बदलाव आएगा। जैसी वीभत्स घटना हैदराबाद में हुई है या बिहार के बक्सर में हुई है वह एक समाज के विफल होने की भी मिसाल है। आखिर हमारा समाज कैसे इस तरह के इंसान तैयार कर रहा है, जो किसी दूसरे इंसान के साथ ऐसी हैवानियत कर सकता हो? हैदराबाद की युवा डॉक्टर की हत्या करने के बाद उसके शव के साथ दुष्कर्म किया गया! क्या यह कानूनी समस्या है? नहीं! यह इंसानी समस्या है। यह व्यक्ति के इंसान के रूप में गिरावट का सबसे निचला स्तर है। कोई हिंसक पशु भी ऐसी क्रूरता किसी दूसर पशु के साथ नहीं कर सकता है। इसे कानून के जरिए नहीं ठीक किया जा सकता है। ऐसी विकृत मानसिकता हमारा समाज तैयार कर रहा है। सो, जितना जरूरी अपराध-न्याय प्रणाली को बदलने की है उतनी ही ज्यादा जरूरत समाज में बदलाव की है।

हैदराबाद की घटना को से ही जुड़ी एक दूसरी खबर आई है, जो उस घटना से कम विचलित करने वाली नहीं है। एक रिपोर्ट के मुताबिक देश के अलग अलग हिस्सों में 80 लाख लोगों ने अश्लील वेबसाइट्स पर जाकर हैदराबाद बलात्कार कांड के वीडियो सर्च किए। यह खबर ज्यादा गुस्सा और शर्म पैदा करने वाली है। यह इस बात का सबूत है कि हैदराबाद की घटना को अंजाम देने वाले लोगों के दिमाग में जो चीजें चल रही थीं, वहीं चीजें लाखों और लोगों के दिमाग में हैं। ये घरों में बैठे शरीफ लोग हैं, जो हो सकता है कि हैदराबाद की घटना पर गुस्सा भी दिखा रहे हों। यह बलात्कारी मानसिकता भी कम खतरनाक नहीं है। इस मानसिकता को बदलना एक बड़ी चुनौती होगी। और हां, दुष्कर्म की घटनाओं में इस्तेमाल होने वाले मुहावरे भी बदलने होंगे। ‘औरत की इज्जत लूट गई’, ‘अस्मत तार-तार हो गई’, ‘मुंह काला किया’ जैसी बातें लिखना और बोलना दोनों बंद करना होगा। इन मुहावरों से पीड़ित को ही दोषी बनाने में मदद मिलती है।

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