• डाउनलोड ऐप
Saturday, April 17, 2021
No menu items!
spot_img

पड़ोसी देशों से संबंध सुधार की पहल

Must Read

भारत की विदेश नीति शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की नीति पर आधारित रही है। हालांकि यह अलग बात है कि पिछले कुछ बरसों में न शांति दिख रही है और न सहअस्तित्व का कहीं अता-पता है। लगभग सभी पड़ोसी देशों के साथ संबंध खराब हुए हैं। नेपाल जैसे पारंपरिक रूप से भारत हितैषी देश ने अपना रुख बदल लिया है।

कहने को कहा जा सकता है कि भारत की वजह से ऐसा नहीं हुआ है, बल्कि चीन की विस्तारवादी नीतियों के चलते ऐसा हुआ है। पर वह भी तो विदेश नीति का ही हिस्सा है कि किसी बाहरी ताकत को इस उप महाद्वीप में पैर जमाने या यहां की भू-राजनीतिक स्थितियों को प्रभावित करने से रोका जाए! तो भारत की सरकारों ने ऐसा क्यों नहीं किया? यूपीए की सरकार के समय से ही कई पड़ोसी देशों के साथ संबंध बिगड़ने लगे थे और मौजूदा सरकार के छह साल के कार्यकाल में इसमें बहुत गिरावट आई है। अब चीन के साथ खुल कर दुश्मनी और युद्ध की बातें हो रही हैं, जैसी बातें पहले सिर्फ पाकिस्तान को लेकर होती थीं। पाकिस्तान के साथ सार्वजनिक दुश्मनी का बिल्कुल उसी रूप में चीन तक विस्तार होने का नतीजा यह हुआ है कि अब चीन और पाकिस्तान एक ईकाई बन गए हैं। उनके साथ साथ बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल और मालदीव भी पाला बदलते रहते हैं।

पिछले कुछ समय से नेपाल लगभग पूरी तरह से चीन के पाले में है। नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टियों ने चीन के साथ तार जोड़े हैं। चीन ने उनको आर्थिक मदद भी दी है तभी नेपाल ने भारत के साथ जबरदस्ती सीमा विवाद बनाया है। श्रीलंका में राजपक्षे बंधुओं के शासन संभालने के बाद से ही माना जा रहा है कि श्रीलंका या तो भारत विरोधी रुख लेगा या तटस्थ रहेगा। यानी उसका पलड़ा भारत के बराबर ही चीन के पक्ष में भी झुका रहेगा। इस उप महाद्वीप में बांग्लादेश एकमात्र देश था, जिसे भारत अपना दोस्त मान सकता पर वहां भी चीन की आर्थिक कूटनीतिक काम कर रही है। विदेश नीति के इस संकट के बीच अच्छी बात है कि भारत ने बांग्लादेश से ही संबंध सुधार का प्रयास शुरू किया है।

विदेश मंत्री एस जयशंकर इस हफ्ते बांग्लादेश की यात्रा पर गए। उन्होंने जितना संभव था उतने उपाय किए कि दोनों देशों के पुराने संबंध स्थापित हो। हालांकि एक यात्रा में यह संभव नहीं है क्योंकि आर्थिक कूटनीति के तहत चीन बहुत बड़ी रकम बांग्लादेश में निवेश कर रहा है। भारत किसी हाल में उसकी मैचिंग का निवेश नहीं कर सकता है। पर भारत बांग्लादेश को यह भरोसा दिला सकता है कि संशोधित नागरिकता कानून से उसके ऊपर कोई असर नहीं होगा। यह भरोसा दिलाना होगा कि भारत किसी को भी नागरिकता के आधार पर देश से नहीं निकालेगा और न उन्हें बांग्लादेश भेजेगा।

ध्यान रहे सीएए और एनआरसी की चर्चाओं ने ही बांग्लादेश को सबसे ज्यादा नाराज किया है। इसी सिलसिले में भारत के नेताओं ने जो बयान दिए उसने भी बांग्लादेश को नाराज किया। जयशंकर ने अपनी यात्रा में टूटे तार जोड़ने के प्रयास किए। उन्होंने बांग्लादेश के आर्थिक मॉडल की तारीफ की, जिसकी सारी दुनिया तारीफ कर रही है। वे बांग्लादेश के राष्ट्रपिता शेख मुजीबुर्रहमान को श्रद्धांजलि देने भी गए। इस प्रक्रिया को भारत को जारी रखना चाहिए और किसी तरह से बांग्लादेश को चीन के पाले में जाने से रोकना चाहिए। यह आर्थिक, सामरिक और भू-राजनीतिक नजरिए से बहुत जरूरी है।

भारत के लिए हाल के दिनों में एक अच्छी बात यह है कि अपनी तमाम कूटनीतिक मजबूरियों के बीच पिछले दिनों श्रीलंका के विदेश मंत्री जयंत कोलंबेज ने कहा कि उनका देश प्रो इंडिया पॉलिसी पर काम करेगा। उन्होंने कहा कि तटस्थ कूटनीति के बीच सामरिक व सुरक्षा के मामले में श्रीलंका इंडिया फर्स्ट की नीति पर काम करेगा।

श्रीलंका की इस राय का सम्मान करते हुए भारत को अपनी तरफ से प्रयास करना चाहिए कि उसकी मदद की जाए। इस समय श्रीलंका बडे आर्थिक संकट में फंसा है। तभी सामरिक जानकार इस चिंता में थे की उसको कर्ज के जाल से निकालने के लिए चीन आगे आएगा। राजपक्षे बंधुओं से पहले से चीन के संबंध अच्छे हैं और अगर वह श्रीलंका को कर्ज या अनुदान के रूप में बड़ी रकम देता है तो भारत कम से कम इस मामले में उसकी बराबरी नहीं कर पाएगा। इसके बावजूद श्रीलंका के विदेश मंत्री का बयान भारत के लिए सुखद है।

भारत को अब आगे की कूटनीति में इसका ध्यान रखना होगा की श्रीलंका वैसे ही चीन का उपनिवेश न बन जाए, जैसे पाकिस्तान बना हुआ है। इस समय पाकिस्तान पूरी तरह से चीन का उपनिवेश बना है। पिछले दिनों उसने सऊदी अरब का एक अरब डॉलर का कर्ज चुकाया। इसके लिए चीन ने उसे पैसा दिया। सोचें, इस्लामिक दुनिया का सिरमौर देश पाकिस्तान की मदद नहीं कर रहा है, बल्कि पाकिस्तान से अपने पैसे वापस मांग रहा है और पाकिस्तान चीन से पैसे लेकर उसे दे रहा है।

यह बदलते भू राजनीतिक परिदृश्य का संकेत है। पाकिस्तान चाहता था कि सऊदी अरब इस्लामिक देशों के सम्मेलन में कश्मीर का मुद्दा उठाए। पाकिस्तान के साथ साथ चीन भी अब चाहता है कि दुनिया के हर मंच पर कश्मीर का मुद्दा उठे और वह भारत को इस मामले में उलझाए रहे। पर सऊदी अरब ने पाकिस्तान की बात नहीं सुनी। उलटे पाकिस्तान से तेल का सौदा रद्द करने और कर्ज चुकाने की मांग की। तब पाकिस्तान की मदद में चीन आगे आया।

पाकिस्तान के साथ तो भारत का पुराना विवाद है। बांग्लादेश, श्रीलंका और नेपाल के साथ भारत के संबंध अच्छे रहे हैं। उन पर चीन ग्रहण लगा रहा है। वह अपनी आर्थिक कूटनीति से भारत तो घेर रहा है। इसके लिए भारत को भी बहुआयामी नीति आजमानी होगी। ज्यादातर सामरिक जानकार तो यह मानते हैं कि चीन के साथ मुकाबले के लिए सबसे पहले भारत को अपनी आर्थिक ताकत बढ़ानी होगी। पर उसमें समय लगेगा। उससे पहले अपनी भू राजनीतिक स्थिति, पारंपरिक संबंध, साझा इतिहास, कूटनीति आदि के जरिए भारत को पड़ोसी देशों के साथ संबंध सुधार करना चाहिए।

- Advertisement -spot_img

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Latest News

West Bengal Election Phase 5 Live Updates : सुरक्षा के कड़े बंदोबस्त के बीच 45 सीटों पर डाले जा रहे वोट

कोलकाता। West Bengal Election Phase 5 Live Updates : कोरोना संक्रमण के फैलते प्रसार के बीच पश्चिम बंगाल (West...

More Articles Like This