राजनीतिक भविष्य को लेकर बढ़ी छटपटाहट

दरअसल राज दरअसल राजनीति में जो भी पद दिया जाता है वह फिर अपने पद को बचाए रखने के लिए भी उतनी कवायद करता है जितनी पद पाने के लिए की जाती या जिस बात के लिए पद पाया है । नीति में जो भी पद दिया जाता है वह फिर अपने पद को बचाए रखने के लिए भी उतनी कवायद करता है जितनी पद पाने के लिए की जाती या जिस बात के लिए पद पाया है । उसको करने के लिए लेकिन जिन्हें पद नहीं मिलता है और पद पाने वाले का सबसे बड़ा काम यही होता है । कि वह अपने अधीनस्थ लोगों को संतुष्ट कर सके और जितना सबको साथ लेकर चलेगा उतना ही उसका पद सुरक्षित रहेगा। लेकिन जिन लोगों को पद नहीं मिलता वे अपना महत्व बनाए रखने के लिए नित्य नए राजनीतिक पाखंड करते हैं। बहरहाल प्रदेश के दोनों ही प्रमुख दलों कांग्रेस और भाजपा के नेताओं के बीच इस समय अजीब सी छटपटाहट महसूस की जा रही है।

दोनों ही दलों में अंदर ही अंदर जोड़-तोड़ चल रहा है। जहां तक सत्ताधारी दल कांग्रेस की बात है तो कांग्रेस में सत्ता और संगठन में कुछ निर्णय लंबे समय से टाले जा रहे हैं जिसके कारण पदों की प्रतीक्षा में नेताओं में छटपटाहट है और जो पद पर हैं उनमें अपना पद बचाए रखने की बेचैनी है। खासकर मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर कांग्रेस में बेताबी है। लगभग एक दर्जन ऐसे दावेदार हैं जो इस बार के मंत्रिमंडल विस्तार में यदि शामिल नहीं हुए तो फिर कोई भी कदम उठा सकते हैं जिसका विपक्षी दल भाजपा को इंतजार है। लेकिन वर्तमान में जो मंत्रिमंडल है उसमें लगभग आधा दर्जन सदस्य अपने आपको असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।

इन 10 महीनों का मुख्यमंत्री कमलनाथ ने मूल्यांकन कराया है और हर एक क्षेत्र में दक्षता आंकी गई है। मसलन आम लोगों से मिलने में मंत्रियों ने कितनी रुचि दिखाई, आम जनता से जुड़े कार्यक्रमों में कौन मंत्री कितने समय सक्रिय रहा। इस मामले में जनसंपर्क मंत्री पीसी शर्मा अव्वल माने जा रहे हैं, जिनके बंगले पर सुबह से लेकर देर रात तक भीड़ रहती है। स्वयं मंत्री शर्मा सबसे मिलते हैं और जहां भी अवसर होता है इन लोगों के बीच पहुंच रहे हैं। अभी हाल ही में छठ पूजा के दौरान वह सुबह 5 बजे तालाब पहुंच गए और फिर औपचारिकता नहीं की कि एक ही जगह पूजा में शामिल हुए। वे उन सब जगहों पर गए जहां छठ पूजा की पूजा हो रही थी। लेकिन इसके विपरीत कुछ मंत्री ऐसे हैं जिन्हें लोगों से मिलने में तकलीफ होती है।

इसी तरह विभाग द्वारा किए गए कार्यों का भी मूल्यांकन किया गया है। यही कारण है कि मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर आधा दर्जन मंत्रियों में छटपटाहट है। इसी तरह निगम-मंडलों की नियुक्तियों को लेकर भी दावेदारों के बीच बेचैनी है। यदि यह अवसर चूक गए फिर अगला अवसर कब आएगा इसका कोई ठिकाना नहीं। प्रदेश प्रभारी दीपक बाबरिया की रायशुमारी के बाद निगम-मंडलों के दावेदारों ने अपने-अपने संपर्क दिल्ली तक बढ़ा दिए हैं। पार्टी में सबसे महत्वपूर्ण निर्णय प्रदेश अध्यक्ष का माना जा रहा है जिसके लिए सिंधिया समर्थक लगातार मांग उठा रहे हैं। स्वयं सिंधिया भी परोक्ष रूप से पार्टी पर दबाव बनाए हुए। हालांकि 5 तारीख से उनका चंबल दौरा निरस्त किया गया है।

माना जा रहा है कि यह पार्टी हाईकमान के निर्देश पर हुआ है। पिछले दौरे में सिंधिया ने जिस बेबाकी से बातें की थी उससे विपक्ष को मौका मिल गया था। पूर्व केंद्रीय मंत्री, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया झाबुआ विधानसभा के उपचुनाव में जीतने के बाद सिंधिया की राह में सबसे बड़े रोड़ा माने जा रहे। प्रदेश में अब जो भी पार्टी को निर्णय सत्ता और संगठन में लेना है उसमें मुख्यमंत्री कमलनाथ की भूमिका महत्वपूर्ण है और पर्दे के पीछे से सरकार के संचालन में सहयोग कर रहे पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह कहां पर कौन सी गोटी फिट करते हैं इसको लेकर भी पार्टी में भ्रम बना हुआ है।

दूसरी ओर 15 वर्षों की सत्ता से हटने के बाद भाजपा नेताओं में भी बेचैनी साफ देखी जा रही है। इस समय पार्टी चार फाड़ होते दिखाई दे रही। ऐसे तो पार्टी की ओर से प्रदेश अध्यक्ष के पद पर राकेश सिंह हैं और नेता प्रतिपक्ष के पद पर गोपाल भार्गव। लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह और पूर्व मंत्री नरोत्तम मिश्रा की सक्रियता पार्टी को गुटों में बांट रही है। कई बार पदों पर बैठे नेताओं से पूछे बगैर बैठकें और कार्यक्रम हो रहे हैं जिससे पार्टी का कार्यकर्ता भ्रमित होता है कि आखिर किसके नेतृत्व में पार्टी आगे बढ़ाना चाहे रही है। पार्टी के नेता बार-बार सरकार गिराने की बात भले ही कर रहे हों लेकिन विधायक कहां से आएंगे यह कोई नहीं बता पा रहा है बल्कि भाजपा के विधायक ही घट रहे हैं।

पार्टी में बढ़ती अनुशासनहीनता रोकने के लिए पार्टी हाईकमान अंकुश लगाने जा रही है जिसमें पार्टी की कोई भी बैठक प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह की अनुमति के बगैर नहीं होगी और विधायकों की कोई भी बैठक नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव की अनुमति के बगैर नहीं होगी। कुल मिलाकर दोनों ही प्रमुख दलों कांग्रेस और भाजपा के नेताओं में जहां राजनीतिक भविष्य को लेकर छटपटाहट है वहीं एक-दूसरे पर बढ़त बनाने के लिए बेताबी भी। लेकिन दोनों ही दलों का राष्ट्रीय नेतृत्व अब नेताओं पर अंकुश लगाने जा रहा है जिसमें पदों पर बैठे व्यक्तियों की अनुमति के बगैर कोई भी ना तो बैठक कर पाएगा और ना ही कार्यक्रम। जिस तरह की छटपटाहट है उसमें लगातार अनुशासनहीनता बढ़ती जा रही है।

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