चीन से लंबे टकराव की तैयारी

भारत को चीन के साथ लंबे समय के टकराव की तैयारी करनी चाहिए। इस बार चीन की रणनीति भारत के कुछ हिस्सों पर कब्जा करने, उस पर बैठे रहने या रणनीतिक रूप से पीछे हट जाने की पुरानी रणनीति से भिन्न है। इस बार चीन लंबे समय के टकराव की तैयारी करके सीमा पर आया है और इसलिए उसने देश की पूर्वी और उत्तरी दोनों सीमा पर टकराव का मोर्चा खोला है। इतना ही नहीं वह नेपाल के साथ भारत की लगती सीमा पर अपनी फौजों की तैनाती करा रहा है। खबर है कि पाकिस्तान की फौज उसकी मदद कर रही है और भारतीय एयरबेस के बहुत पास पाकिस्तानी बेस से हवाई गतिविधियां चल रही हैं।

चीन और भारत के सैन्य कमांडरों की वार्ता के दौरान जिन बातों पर सहमति बनी थी, चीन उनका पालन नहीं कर रहा है। वह पैंगोंग झील के पास से पीछे नहीं हट रहा है। उसने गलवान घाटी से जरूर सेना हटा ली है लेकिन पैंगोंग झील के पास खबर है कि उसने आठ किलोमीटर का एरिया कब्जा किया है और दावा किया है कि यह उसका है। उसने पहले गलवान घाटी पर भी दावा कर दिया था। सोचें, 1962 की लड़ाई में भी चीन ने इस पर दावा नहीं किया था और देश के बहादुर सैनिकों ने तब भी गलवान घाटी को बचा लिया था। इस बार उसने पूरी गलवान घाटी पर दावा कर दिया। चूंकि उसे पता था कि इस पर पूरे भारत की नजर है क्योंकि वहां सैनिकों के बीच हिंसक झड़प हुई थी, जिसमें भारत के 20 जवान शहीद हुए थे।

इसलिए वहां से पीछे हट गया। बाद में उसने पैंगोंग झील के पास डेरा जमा लिया और उस पर दावा कर दिया है। भारत का कहना है कि चीन को फिंगर एरिया से पीछे हटना चाहिए। फिंगर फोर से एट के बीच का एरिया हमेशा नो मेंस लैंड रहा है। फिंगर चार पर भारत की वास्तविक नियंत्रण रेखा है और फिंगर आठ पर चीन की नियंत्रण रेखा है। लेकिन चीन फिंगर पांच तक आकर अपनी सैन्य तैनाती कर रहा है और भारत से चाह रहा है वह फिंगर चार से पीछे हट कर अपनी सीमा में ही बफर जोन बनाए। भारत को यह किसी हाल में कबूल नहीं करना चाहिए और इस बात के लिए दबाव बनाना चाहिए कि चीन पीछे हटे और पुराना बफर जोन बहाल हो।

ऐसे ही भारत की सेना पहले पेट्रोलिंग प्वाइंट 14 तक गश्त करती थी अब चीन इसे रूकवाना चाह रहा है। इसका मतलब है कि गलवान घाट से लेकर पैंगोंग झील, हॉट स्प्रिंग, गोगरा, फिंगर एरिया और भारत के पेट्रोलिंग प्वाइंट्स तक को चीन ने विवादित बना दिया है। यह मामूली बात नहीं है कि उसने उन इलाकों पर दावा किया है, जो पहले विवादित नहीं थे। इससे उसकी मंशा जाहिर होती है। उसकी मंशा भारत को 1962 की तरह का सबक सिखाने की है। तभी चीन  के सैन्य अधिकारियों से लेकर भारत में चीन के राजदूत और चीन में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता तक की भाषा धमकी देने वाली है और तेवर आक्रामक हैं।

इसी बीच चीन के राष्ट्रपति शी जिनफिंग ने पूर्वी भूटान पर दावा कर दिया है। यह भी पहली बार हो रहा है किसी देश ने उस इलाके पर दावा किया है, जो उसकी सीमा से सीधे सटा हुआ नहीं हो। यह शी की एक तीर से दो शिकार करने की चाल है। ध्यान रहे भूटान के जिस इलाके पर चीन ने दावा किया है वहां तक भारतीय राज्य अरुणाचल प्रदेश से होकर ही जाया जा सकता है। भूटान का वह इलाका चीन को तभी मिल सकता है, जब अरुणाचल प्रदेश उसको मिले। जाहिर है कि उसने अरुणाचल प्रदेश पर अपना पुराना दावा अब नए तरह से पेश किया है। उसने सीधे अरुणाचल का नाम लेने की बजाय पूर्वी भूटान के एक हिस्से पर दावा किया है। भारत को उसकी मंशा और उसकी तैयारियों को समझना होगा।

उधर नेपाल ने पिछले दिनों भारत के तीन इलाकों- कालापानी, लिपूलेख और लिम्पियधुरा पर दावा किया और इन इलाकों को अपने नक्शे में शामिल किया। उससे पहले भारत ने लिपूलेख के पास एक सड़क बनाई थी, जिसका उद्घाटन रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने किया था। वह सड़क चीन की सीमा तक सीधे पहुंचती है, जिससे भारत के लोगों को कैलाश मानसरोवर की यात्रा करने में आसानी होती। खबर है कि लिपूलेख में नेपाल की सीमा के पास चीन अपने सैनिक तैनात कर रहा है।

इससे भारत को समझ जाना चाहिए कि यह कोई संयोग नहीं है, बल्कि प्रयोग है। इस प्रयोग के तहत चीन ने भारत की पूरी हिमालयी सीमा को विवादित बना दिया है। इसमें किसी न किसी तरह से पाकिस्तान, नेपाल और भूटान तीनों देश शामिल हो गए हैं। भारत ने पिछले दिनों लद्दाख में सैन्य तैनाती बढ़ाई है। लेकिन वह पर्याप्त नहीं है। भारत के बारे में सारे रक्षा जानकार बताते हैं कि भारतीय सैनिक हाइब्रीड माउंटेन वारफेयर में चीन के मुकाबले बहुत ज्यादा सक्षम हैं। सो, भारत को हवाई और जमीनी दोनों युद्ध की तैयारी करनी चाहिए। सैनिकों की तैनाती और वायु सेना के विमानों की तैनाती बढ़ानी चाहिए।

सैन्य तैनाती और तैयारियों के साथ साथ भारत को कूटनीतिक मोर्चे पर भी चीन को सबक सिखाने की तैयारी करनी चाहिए। इसके लिए भारत को चीन की संवेदनशीलता की परवाह किए बगैर उसकी दुखती रग दबानी चाहिए। भारत को हांगकांग, ताइवान, तिब्बत तीनों पर सवाल उठा कर वन चाइना पॉलिसी को चुनौती देनी चाहिए। साथ ही उन तमाम देशों के साथ सैन्य व कूटनीतिक साझा बनाना चाहिए, जो चीन की विस्तारवादी नीतियों की वजह से परेशान हैं। अमेरिका भी ऐसे देशों में है पर राष्ट्रपति ट्रंप की अनिश्चित नीतियों की वजह से भारत उस पर बहुत भरोसा नहीं कर सकता है।

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