एक बड़े राजनीतिक टकराव की तैयारी

भारत के नागरिकता कानून में बदलाव पहली बार नहीं हो रहा है। फिर ऐसा क्या है, जिसकी वजह से इस बार संशोधन को लेकर इतना हंगामा हो रहा है? इससे पहले 1987 में पहली बार नागरिकता कानून में बदलाव किया गया था। उससे पहले तक यहीं प्रावधान था कि अगर आपने भारत में जन्म लिया है तो आप भारत के नागरिक हैं। 1987 में इसे बदला गया और यह प्रावधान किया गया कि भले आपका जन्म भारत में हुआ हो पर आपके माता-पिता में से किसी एक का पहले से भारतीय होना जरूरी है।

2004 में इसमें फिर बदलाव किया गया और यह प्रावधान किया गया कि आपके माता-पिता में से कोई एक तो भारतीय हो ही पर दूसरा अवैध प्रवासी नहीं होना चाहिए। इन बदलावों को लेकर तब कोई विरोध नहीं हुआ था और न कोई आंदोलन हुआ था।

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पर अब भारत सरकार को जो बदलाव कर रही है उसे लेकर पूरे देश में खास कर पूर्वोत्तर के राज्यों में बड़ा आंदोलन शुरू हो गया है। समूचा पूर्वोत्तर एक तरह से उबल रहा है और कई दूसरे राज्यों में भी आंदोलन चल रहे हैं या उसकी तैयारी हो रही है। कानूनी और राजनीतिक स्तर पर लड़ाई अलग चल रही है। धर्म के आधार पर नागरिकता देने का प्रावधान किए जाने को ज्यादातर जानकार संविधान की व्यवस्था का उल्लंघन बता रहे हैं। इस बारे में अंतिम फैसला संसद में या चुनाव के मैदान में नहीं होगा, बल्कि सर्वोच्च अदालत में होगा।

सरकार नागरिकता कानून में जो बदलाव कर रही है वह अपने आप में संविधान का उल्लंघन है पर वास्तविक अर्थों में वह भारत के नागरिकों पर असर डालने वाला नहीं है। सरकार और इस बिल का समर्थन करने वालों का यह कहना सही है कि भारत के मुसलमानों को इससे डरने या घबराने की जरूरत नहीं है क्योंकि इस कानून से उनकी नागरिकता पर कोई फर्क नहीं पड़ता है। जो पहले से नागरिक हैं वे नागरिक हैं। इस कानून में नई नागरिकता की बात हो रही है।

तीन पड़ोसी देशों से आने वालों को भारत की नागरिकता देने का प्रावधान इसमें हैं। यहां सरकार यह भेदभाव जरूर कर रही है कि वह मुसलमानों को भारत की नागरिकता नहीं देगी। यहां पर धर्म के आधार पर भेदभाव की मंशा साफ दिख भी रही है। यह संविधान विरूद्ध है पर भारत के नागरिकों पर असर डालने वाला नहीं है।

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असली विवाद का विषय राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर, एनआरसी की तैयारी पर है। ध्यान रहे नागरिकता कानून को लागू करना राज्यों की जिम्मेदारी नहीं होगी। पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आकर भारत के अलग अलग हिस्सों में बसे लोग अगर गैर मुस्लिम हैं तो सरकार उनको भारत की नागरिकता दे देगी और वे जहां हैं वहां रहेंगे। नए आने वालों की संख्या भी लाखों में नहीं होने वाली है, उनको सरकार कहीं भी बसा देगी।

इसलिए यह ज्यादा चिंता की बात नहीं होनी चाहिए। पर एनआरसी को लेकर ज्यादा चिंता हो रही है। इसमें भारत के नागरिकों को भी अपनी नागरिकता प्रमाणित करनी होगी। देश के मुसलमानों के लिए यह घबराने की बात है। क्योंकि जो हिंद है वह अगर अपनी नागरिकता नहीं प्रमाणित कर पाता है तो उसे नए कानून के तहत नागरिकता मिल जाएगी, जैसे असम में एनआरसी से छूटे लाखों हिंदुओं को मिलेगी। पर अगर कोई मुस्लिम अपने को भारत का नागरिक नहीं प्रमाणित कर सका तो वह स्टेटलेस हो जाएगा। वह कहीं का नहीं रहेगा।

इसलिए एनआरसी पर बड़ा राजनीतिक टकराव होगा। इसे लागू करने में राज्यों की भूमिका रहने वाली है। केंद्र सरकार अपने दम पर इसे नहीं लागू कर सकेगी। इसके लिए उसे राज्यों से सहमति बनानी होगी। एक तो यह बहुत महंगा काम होगा। अकेले असम में एनआरसी करने में 16 सौ करोड़ रुपए का खर्च हुआ था और हजारों कर्मचारी चार साल तक काम करते रहे थे। सोचें, तीन करोड़ के करीब लोगों की जांच में इतना समय और इतना पैसा लगा था तो 130 करोड़ लोगों की जांच में कितना समय और पैसा लगेगा। तभी माना जा रहा है कि राज्य इस वजह से भी एनआरसी के लिए तैयार नहीं होंगे।

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पर उससे ज्यादा बड़ी चिंता यह है कि सभी राज्यों में आबादी सीधे सीधे दो खांचों में बंट जाएगी। एक बड़ी आबादी को अपनी नागरिकता प्रमाणित करने के लिए मशक्कत करनी होगी। तभी बड़ी अल्पसंख्यक आबादी वाले राज्यों में इसका विरोध शुरू हो गया है। पश्चिम बंगाल सरकार ने साफ शब्दों में कहा है कि वह अपने यहां इसे लागू नहीं करेगी। केरल सरकार भी इसे खारिज कर रही है और कांग्रेस शासित राज्यों ने भी इसे खारिज किया हुआ है। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टेन अमरिंदर सिंह ने कहा है कि वे किसी हाल में अपने राज्य में एनआरसी नहीं होने देंगे।

सोचें, अगर विपक्षी शासन वाले राज्य अपने यहां एनआरसी लागू करने से इनकार कर दें तो क्या होगा? नागरिकता कानून में संशोधन को तो केंद्र सरकार अपने दम पर लागू कर देगी पर एनआरसी को बिना राज्यों की सहमति के कैसे लागू करेगी? भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टियों का शासन देश के 40 फीसदी राज्यों में है। 60 फीसदी राज्य उसके शासन से बाहर हैं और इनमें से ज्यादातर राज्य एनआरसी का विरोध करेंगे।

अगर केंद्र सरकार उनके विरोध को दरकिनार कर जबरदस्ती इसे लागू करने का प्रयास करती है तो समूचा संघीय ढांचा बिखरेगा और बड़ा राजनीतिक टकराव होगा। इसके लिए केंद्र सरकार और भाजपा शायद ही तैयार हो। तभी ऐसा लग रहा है कि असली मकसद नागरिकता कानून को लागू कर देना है और एनआरसी को राजनीतिक मुद्दा बनाए रखना है ताकि उस मुद्दे पर वोट की राजनीति हो सके।

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