सोशल मीडिया नियमन क्या संभव? - Naya India
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सोशल मीडिया नियमन क्या संभव?

अजित कुमार

केंद्र सरकार सोशल मीडिया को नियंत्रित करना चाहती है। उसके लिए नए नियमों की जरूरत बताई जा रही है। जरूरी होने पर नए कानून भी बनाए जा सकते हैं या सन 2000 में बने आईटी कानून में संशोधन किया जा सकता है। पर सवाल है कि क्या ऐसा कर पाना संभव है और अगर ऐसा होता हैतो उसका स्वरूप व तरीका क्या होगा? और सबसे बड़ा सवाल है कि क्या वह लोगों की निजता में दखल नहीं होगा? इन सब सवालों पर अब सुप्रीम कोर्ट को विचार करना है। ध्यान रहे दो साल पहले 2017 में ही सुप्रीम कोर्ट ने निजता के अधिकार पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया था।

सर्वोच्च अदालत ने निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार माना था। दो साल बाद ही हो सकता है कि उसे अपने फैसले को फिर से परिभाषित करना पड़े क्योंकि सोशल मीडिया के नियमन को लेकर एक याचिका यह भी है कि लोगों के सोशल मीडिया एकाउंट को उनके आधार नंबर के साथ जोड़ा जाए। मानवाधिकार कार्यकर्ता इसे लोगों की निजता में दखल मान रहे हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि सोशल मीडिया के प्लेटफार्म- फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप आदि का दुरुपयोग होता है। कई जगह हिंसा भड़काने के लिए इनका इस्तेमाल किया गया। इसके जरिए दुष्प्रचार किए गए। फर्जी खबरें और फोटो व वीडियो वायरल कराया गया। पर ऐसा दुरुपयोग को हर तकनीक का होता है।

सरकार को कंपनियों के साथ मिल कर इसका दुरुपयोग रोकने का प्रयास करना चाहिए, न कि इसके इस्तेमाल को नियंत्रित करने का। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि सोशल मीडिया के दुरुपयोग से लोकतांत्रिक राज्य व्यवस्था को अकल्पनीय नुकसान हो सकता है। अभी तक का अनुभव यह दिखा रहा है कि देश और ज्यादातर राज्यों की सत्तारूढ़ पार्टी ही इसका सबसे ज्यादा इस्तेमाल करती रही है। हालांकि हाल के कुछ दिनों में सोशल मीडिया में सरकार विरोध भी बढ़ा है। तभी इसके राजनीतिक पहलू पर भी नजर रखने की जरूरत है।

इस पूरे विवाद के दो पहलू हैं। एक पहलू तो यह है कि सोशल मीडिया एकाउंट को आधार से जोड़ा जाए। इस मामले में मद्रास, बांबे और मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में कुल आठ याचिका दायर की गई थीं, जिन सबको सुप्रीम कोर्ट ने अपने पास मंगा लिया है। दूसरा पहलू है सोशल मीडिया की सेवा दे रही कंपनियों को नियंत्रित करने का। ध्यान रहे इन कंपनियों ने सरकार को अपना डाटा देने से इनकार किया है।

सरकार चाहती है कि ये कंपनियां अपना इन्क्रिप्टेड यानी कोड के जरिए गोपनीय बनाया गया डाटा भी उसे दें। जो डिक्रिप्टेड यानी सार्वजनिक डाटा होता है वह सरकार की पहुंच में होता है। पर सरकार गोपनीय डाटा भी चाहती है। तभी उसने सुप्रीम कोर्ट में दी गई अपनी याचिका में कहा है कि अगर कंपनियां सरकार को डाटा नहीं देना चाहती हैं तो वे भारत में नहीं आएं। हालांकि फिलहाल इस आधार पर कंपनियों को भारत में काम करने से रोकने का कोई कानून नहीं है। यहीं बात सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कही है। इस पर सरकार का कहना है कि वह नए कानून बनाएगी पर कंपनियों को मजबूर करेगी कि वे सरकार को डाटा दें। ये दोनों पहलू सीधे तौर पर आम लोगों की निजता से जुड़े हैं। अगर उनका सोशल मीडिया एकाउंट आधार से जुड़ता है या डाटा सार्वजनिक होता है तो उनके निजता के अधिकार का हनन होगा।

सरकार इस मामले को लेकर कितनी गंभीर है इसका अंदाजा सुप्रीम कोर्ट में दिए गए उसके हलफनामे से होता है। सरकार ने अपने हलफनामे में इसे लोकतंत्र के लिए बड़ा खतरा बताते हुए कहा है कि वह तीन महीने में इसके लिए नए नियम तैयार कर लेगी। सरकार इसके लिए आईटी कानून 2000 में भी बदलाव कर सकती है।

बताया जा रहा है कि सोशल मीडिया प्लेटफार्म जैसे फेसबुक, व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम, ट्विटर आदि के साथ साथ सरकार संचार की सेवा देने वाली कंपनियों, इंटरनेट की सेवा देने वाली कंपनियों, सर्च इंजन, ऑनलाइन पेमेंट साइट्स, ऑनलाइन ऑक्शन साइट्स, ऑनलाइन मार्केट प्लेस, साइबर कैफेज, वेब होस्टिंग सर्विस प्रोवाइडर्स आदि को भी नियंत्रित करने वाले कानून में बदलाव करेगी। यानी सरकार एक समग्र और ज्यादा व्यापक कानून बनाने की तैयारी कर रही है ताकि सोशल मीडिया के दुरुपयोग को रोका जा सके। इस लिहाज से नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की ताजा रिपोर्ट का एक आंकड़ा भी चिंताजनक है। इसमें बताया गया है कि साइबर क्राइम में 77 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। इसे रोकना भी सरकार की प्राथमिकता है।

सरकार अगले तीन महीने में इसके लिए कानून बन सकती है। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में जनवरी तक का समय मांगा है। हालांकि वह कानून भी न्यायिक समीक्षा का विषय होगा। इसे नियंत्रित करने का प्रयास करते हुए यह भी ध्यान रखना होगा कि सोशल मीडिया ही इन दिनों आम आदमी के हाथ में एक प्रभावी हथियार रह गया है। पारंपरिक मीडिया की सीमा है और कु मजबूरियां भी हैं, जिनकी वजह से वे सिर्फ वहीं दिखाते हैं, जो सरकारें चाहती हैं। पर सोशल मीडिया इस मामले में स्वतंत्र है। अगर एक तरफ इससे लोकतंत्र को इससे कोई खतरा हो रहा है तो दूसरी ओर इससे लोकतंत्र मजबूत भी हो रहा है। विपक्षी पार्टियों से ज्यादा प्रभावी विपक्ष की भूमिका सोशल मीडिया पर आम लोग निभा रहे हैं। इसमें संदेह नहीं है कि इसका दुरुपयोग हो रहा है पर इस बहाने इसे नियंत्रित करने का कानून नहीं बनना चाहिए।

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