आरसीईपी से ही नहीं एफटीए से भी नुकसान

अजीत द्विवेदी

सरकार इस बात के लिए अपनी पीठ थपथपा रही है कि उसने क्षेत्रीय समग्र आर्थिक संधि, आरसीईपी में शामिल होने से इनकार कर दिया। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का कहना है कि यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नेतृत्व है, जो भारत ने यह फैसला किया। हालांकि हकीकत यह है कि प्रधानमंत्री के बैंकॉक जाने से पहले तक भाजपा के सारे नेता इस संधि का जीतोड़ बचाव कर रहे थे। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने तो इस संधि का विरोध करने के लिए कांग्रेस की जम कर लानत मलानत की थी और याद दिलाया था कि इस संधि पर वार्ता कांग्रेस ने ही शुरू की थी। वह तो भला हो राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ, स्वदेशी जागरण मंच और भारत के किसान संगठनों का जिनका विरोध काम आया और प्रधानमंत्री ने संधि में शामिल नहीं होने का ऐलान किया।

पर सवाल है कि क्या भारत का कारोबार असंतुलन अब ठीक हो जाएगा? भारत इस संधि में शामिल नहीं हुआ तो तात्कालिक रूप से यह कहा जा सकता है कि भारत में किसानों और पशुपालकों को बड़ी राहत मिली है। सबसे ज्यादा खतरा इस संधि से उनके लिए ही हो रहा था। ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड दोनों इस संधि में साझीदार देश हैं, जिन्हें भारत में अपने उत्पाद के खुले आय़ात की छूट मिल जाती। ध्यान रहे इस संधि के तहत ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड को अपने ज्यादातर उत्पादों के लिए भारत में शुल्क रहित आयात की छूट मिल जाती। फिर उनके डेयरी उत्पादों से भारत का बाजार भर जाता। सो, इस लिहाज से कहा जा सकता है कि भारत के आरसीईपी में नहीं शामिल होने से किसानों को तात्कालिक राहत मिल जाएगी।

पर इसका दूसरा पहलू भी है। भारत के अलावा आसियान के सारे दस देश और उनके अलावा चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड इस संधि में शामिल हो गए हैं। अगर भारत को इसमें जोड़ लेते तो दुनिया की आधी आबादी इसके दायरे में आती। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि इसका बाजार कितना बड़ा है। अगर भारत इसके लिए तैयार रहता। अपने कारोबारियों, उद्यमियों और किसानों को तैयार किया गया रहता तो भारत को कितना बड़ा बाजार मिलता। भारत अगर इसमें शामिल देशों को अपने यहां शुल्क रहित आयात की सुविधा दे रहा था तो भारत को भी अपने सामानों के शुल्क रहित निर्यात के लिए बहुत बड़ा बाजार मिल रहा था, जिसे भारत ने गंवा दिया।

इससे एक बात जाहिर होती है कि भारत अब तक किसी भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार नहीं है। माई बाप सरकार की मदद पर पल रहे भारत के कारोबारी दुनिया के देशों का यहां तक कि आसियान और एशिया के दूसरे देशों का मुकाबला करने में भी सक्षम नहीं हैं। ध्यान रहे इसी आधार पर नब्बे के दशक में भारत में गैट और डंकल प्रस्तावों का विरोध हुआ था। दूसरी बात यह जाहिर हुई है कि पांच साल तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मेक इन इंडिया अभियान चलाने के बावजूद भारत में कुछ भी बनना शुरू नहीं हुआ है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में निर्यात करने के लिए भारत कुछ भी ऐसा नहीं बना पा रहा है, जिसके दम पर भारत किसी अंतरराष्ट्रीय कारोबारी संधि में शामिल हो सके।

अब इसके दूसरे पहलू पर नजर डालें। भारत ने भले आरसीईपी समझौते पर दस्तखत नहीं किया है पर इस संधि में शामिल सभी देशों के साथ उसका मुक्त व्यापार का समझौता है। इस समझौते के तहत ये देश भारत में पहले से अपना सामान बेच रहे हैं और उनको शुल्क से छूट भी मिली हुई है। भाजपा के नेता इन देशों के साथ हुए मुक्त व्यापार समझौतों, एफटीए के लिए कांग्रेस कि पिछली सरकारों को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं पर उससे भाजपा की अपनी सरकार की जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती है। इन देशों के साथ हुए मुक्त व्यापार समझौते की वजह से भारत और इन देशों का कारोबार असंतुलन लगातार बढ़ता जा रहा है पर ऐसा नहीं दिख रहा है कि कम से कम पिछले पांच साल में ही मौजूदा सरकार ने भारत में उद्यम को बढ़ावा देने और अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करने का काम किया है।

भारत अभी आरसीईपी में शामिल नहीं है पर इसमें शामिल देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते की वजह से भारत को बड़ा नुकसान पहले से ही हो रहा है। आसियान के दस देशों के साथ भारत का कारोबार असंतुलन करीब 22 अरब डॉलर का है। यानी भारत के मुकाबले ये देश इतने ज्यादा रुपए का सामान भारत को बेचते हैं। चीन के साथ यह कारोबार असंतुलन आसियान के दोगुने से ज्यादा है। चीन भारत के मुकाबले साढ़े 53 अरब डॉलर यानी साढ़े तीन लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का सामान बेचता है। दक्षिण कोरिया से भी कारोबार असंतुलन 12 अरब डॉलर का है। ऑस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड के साथ भी भारत का कारोबार असंतुलन दस अरब डॉलर यानी 70 हजार करोड़ रुपए का है।

सोचें, यह असंतुलन पिछले बरसों में धीरे धीरे करके बढ़ता गया है। भारत में कारोबारी गतिविधियों और उद्यमियों को बढ़ावा देने के लिए कुछ भी नहीं किया गया, जिसका नतीजा यह हुआ है कि वे सामान बनाने की बजाय आसियान और एशिया प्रशांत के देशों से सस्ता सामान लाकर भारत में बेचने लगे। निर्माता की बजाय सब विक्रेता बन गए। यह स्थिति आरसीईपी से बाहर होने भर से नहीं ठीक होने वाली है और न सरकार पुराने एफटीए को एकतरफा ढंग से बदल सकती है। इसलिए सरकार को अपने देश में उद्यम को बढ़ावा देने के उपायों पर जोर देना चाहिए। पर यहां तो उलटे नोटबंदी और जीएसटी जैसे प्रयोगों से उद्यम का और उद्यम की भावना का भट्ठा बैठाया गया है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shares