लौटने पर उन्हें मुस्लिम बनना पड़ता है

नागरिकता संशोधन क़ानून के खिलाफ चला वामपंथी-मुस्लिम गठजोड़ का आन्दोलन विफल हो गया है। एक महीने के हिंसक आन्दोलन और छह कांग्रेसी सरकारों की ओर से क़ानून न मानने की धमकी की परवाह किए बिना मोदी सरकार ने 10 जनवरी को नोटिफिकेशन जारी कर के 10 जनवरी से क़ानून लागू कर दिया है। अब तीनों इस्लामिक देशों से आ कर पिछले छह साल से भारत में रह रहे हिन्दुओं, सिखों, जैनिओं, बोद्धों, पारसियों और ईसाईयों को नागरिकता का आवेदन करने का अधिकार होगा।

नागरिकता संशोधन क़ानून के तहत नागरिकता के आवेदन जिलाधिकारियों को दिए जाएंगे , उन्हें सिर्फ इस बात का प्रमाण देना होगा कि वे छह साल से भारत में रह रहे हैं। संशोधित क़ानून में इन ख़ास वर्गों को सिर्फ पांच साल की छूट दी गई है , वे पहले भी नागरिकता के लिए आवेदन कर सकते थे , लेकिन संशोधन से पहले यह अवधि 11 साल थी । इन तीनों देशों से आए मुस्लिम भी तार्किक कारण बता कर नागरिकता के लिए आवेदन कर सकते हैं , लेकिन उन्हें उस से पहले 11 साल भारत में रहने का प्रमाण देना होगा। सिर्फ इतना ही फर्क है, जिस पर इतना बावेला मचा है।

यह घटना 2018 की है , पाकिस्तान के सिंध प्रांत के कोई 500 दलित हिन्दू इस उम्मींद से भारत आए थे कि वे यहीं पर बस जाएंगे और उन की 72 साल की गुलामी का अंत हो जाएगा। वे इमानदारी से वीजा अवधि बढाना चाहते थे लेकिन उन की वीजा अवधि नहीं बढी और उन्हें रोते बिलखते पाकिस्तान लौटना पड़ा। पाकिस्तान लौटते ही उन्हें हुक्म सुना दिया गया कि अब अगर उन्हें वहां रहना है तो तुरंत मुसलमान बनना पड़ेगा।

ऐसा उन सभी के साथ किया जाता है , जो वीजा खत्म होने के बाद पाकिस्तान लौटते हैं। 25 मार्च 2018 को सिंध प्रांत के मालती जिले के नज्द मदरसा में शामियाना सजा , प्रवेश द्वार पर लिखा था-“दावत-ए-इस्लाम” फूलों और इत्रों की बौछारें हुई। मंच पर मुल्ला मौलवियों का जमावड़ा था। मुख्त्यार जान सरहदी, पीर सज्जाद जान सरहदी और पीर साबिक जान सरहदी ने कलमा पढ़ा , जिसे सभी हिन्दुओं को दोहराने को कहा गया। सभी हिन्दू दुखी मन और छलकती आँखों से कलमा दोहराते रहे।

वह पाकिस्तान के लिए बड़ी खबर थी , लेकिन भारत के लिए शर्मसार करने वाली थी कि वे शरण लेने आए थे , उन का हक था , गांधी और नेहरु ने वादा किया था , लेकिन वीजा खत्म होते ही हम ने उन्हें निकाल बाहर किया। सत्रहवीं लोकसभा का दूसरा सत्र गलती सुधारने और तीनों इस्लामिक देशों के सताए अल्पसंख्यकों को मानवता के आधार पर सम्मान से जीने का हक देने में मील का पत्थर साबित हुआ । लेकिन सत्रावसान से अगले दिन 14 दिसम्बर को ही कांग्रेस ने नागरिकता संशोधन क़ानून के खिलाफ दिल्ली में रैली की और 15 दिसम्बर को जामिया मिल्लिया के मुस्लिम छात्रों ने हिंसक आन्दोलन शुरू कर दिया था।

अगले दिन से जेएनयू के चारों वामपंथी छात्र संगठनों ने नागरिकता संशोधन क़ानून के खिलाफ जलूस निकाल कर आन्दोलन की शुरुआत की। फिर तो देश भर में मुस्लिम-वामपंथी गठजोड़ सडकों पर उतर आया। वामपंथी दलों की विभिन्न क्षेत्रों की संस्थाएं खुल कर सडकों पर आ गई , जिनमें फ़िल्मी हस्तियाँ प्रमुख हैं , पहले उन्होंने मुम्बई में जामिया मिल्लिया के हिंसक छात्रों के पक्ष में रैली निकाली और बाद में जेएनयू के सिमेस्टर का रजिस्ट्रेशन ठप्प करवाने के लिए विश्व विद्यालय के सर्वर रूम में तोड़फोड़ वाले वामपंथी छात्रों के पक्ष में गेट वे आफ इंडिया पर धरना दिया।

जिस प्रकार दिल्ली पुलिस की जांच में साफ़ हो रहा है कि जेएनयू में हिंसा करने वाले नकाबपोश वामपंथी छात्र थे , उसी तरह समय आने पर यह खुलासा भी जरूर होगा कि वामपंथी दलों के नेताओं की किस किस मुस्लिम संगठन के साथ हिंसक आन्दोलन की रणनीति बनी थी। कांग्रेस को आखिर तक समझ नहीं आया कि वह क्या कर रही है , दिशाहीन पार्टी वामपंथियों का दुमछल्ला बन कर रह गई है।

बांग्लादेश के अल्पसंख्यकों को भारत की नागरिकता देने और बहुसंख्यक मुसलमानों को नागरिकता नहीं देने की सिफारिश खुद प्रणव मुखर्जी की अध्यक्षता वाली गृह मंत्रालय की संसदीय समिति ने 12 दिसम्बर 2003 में संसद में रखी अपनी 107वीं रिपोर्ट में की थी। इस कमेटी में कांग्रेस के कपिल सिब्बल , मोती लाल वोरा और अम्बिका सोनी भी थी। इस कमेटी में लालू यादव भी सदस्य थे , और इसी रिपोर्ट में नागरिकता रजिस्टर बनाने की सिफारिश भी की गई थी।

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