अवसरवाद की कोई सीमा क्या संभव?

शशांक राय

महाराष्ट्र के घटनाक्रम से यह सवाल उठा है कि क्या राजनीतिक अवसरवाद की कोई सीमा रेखा खींचना संभव है? कोई भी पार्टी किस सीमा तक समझौता कर सकती है? कहा जाता है कि राजनीति संभावनाओं का खेल है पर सवाल है किसी भी संभावना को हकीकत में बदलने के लिए किस हद तक समझौता किया जा सकता है? किसी पार्टी को किस हद तक अपनी विचारधारा से समझौता करने की छूट होनी चाहिए? क्या ऐसा हो सकता है कि कोई पार्टी अपनी कही बात से मुकरे तो उसे कठघरे में खड़ा किया जा सके? कहा जाता है कि ऊपर उठने की सीमा होती है पर नीचे गिरने की कोई सीमा नहीं हो सकती है। उसी तरह नैतिकता की राजनीति करने की सीमाएं हैं पर अनैतिक राजनीति करने की कोई सीमा नहीं हो सकती।

पिछले दिनों हरियाणा में भाजपा को समर्थन देकर सरकार बनवाने और सरकार में उप मुख्यमंत्री बनने वाले दुष्यंत चौटाला ने बहुत पते की बात कही। उनसे पूछा गया कि भाजपा ने उनके ऊपर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे और जेल भेजने की बात कही थी। इस पर उन्होंने कहा कि चुनाव प्रचार में कुछ बातें कही जाती हैं, जो प्रचार के लिए होती हैं वह बुनियादी रूप से नेता का कमिटमेंट नहीं होता है। उनके कहने का मतलब था कि नेता प्रचार में जो बात कहते हैं उसे गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है क्योंकि वह उनका कमिटमेंट नहीं होता है। सवाल है कि फिर नेता की कमिटमेंट क्या होती है? तो जवाब है कि वह चुनाव के बाद जो करता है वहीं उसका कमिटमेंट है!

अब इसके आगे सोचें तो भारत की राजनीति का मामला और उलझता है। चुनाव प्रचार में कही गई बातों से उलट आचरण का यह लॉजिक है कि प्रचार में कही गई बात नेता का कमिटमेंट नहीं है। यह एक तरह का अवसरवाद है। वोट लेने के लिए नेता एक दूसरे पर हमला करते हैं और वोट के बाद सब भूल कर एक हो जाते हैं। पर नेता का खुद का चरित्र और पार्टी का चरित्र जिन बुनियादी सिद्धांतों पर बना होता है उससे समझौते को क्या कहेंगे? क्या उसे भी सुविधा के किसी सिद्धांत के खांचे में ढाला जा सकता? वैसे सुविधा के कई सिद्धांत गढ़े गए हैं। जैसे राजनीति सत्ता के लिए होती है तो हर तरह से सत्ता हासिल करना अपने आप में एक सिद्धांत है। जैसे राजनीति में कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता है। जैसे राजनीति संभावनाओं का खेल है।

इन्हीं सुविधा के सिद्धांतों के तहत बिहार में राजद के विरोध के लिए बनी पार्टी जनता दल यू ने उसके साथ चुनावी तालमेल किया। उत्तर प्रदेश में एक दूसरे के धुर विरोधी समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी साथ आए। कांग्रेस की वैचारिक विरोधी सीपीएम ने पश्चिम बंगाल के चुनाव में उसके साथ तालमेल किया। कांग्रेस के विरोध में बनी तेलुगू देशम पार्टी का कांग्रेस से दोस्ताना बना। ऐसे ही सुविधा के सिद्धांत से तमिलनाडु की पार्टियां कभी भाजपा तो कभी कांग्रेस से तालमेल करती रही हैं। राष्ट्रवाद के सिद्धांतों की बात करने वाली भाजपा उन पार्टियों से भी तालमेल कर लेती है, जिनको वह राष्ट्रविरोधी मानती रही है। उसने जम्मू कश्मीर में पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी से तालमेल करके सरकार बनाई तो अब भी पूर्वोत्तर के कई राज्यों में भाजपा का तालमेल ऐसी पार्टियों से है, जो अलग अलग झंडा और निशान रखने का दावा करते हैं और जो भाजपा के राष्ट्रवादी सिद्धांतों के खांचे में फिट नहीं बैठती हैं। फिर भी सरकार बनाने के लिए उनसे तालमेल किया गया है।

महाराष्ट्र में इसी राजनीति का विस्तार दिख रहा है। एनसीपी नेता अजित पवार को सिंचाई घोटाले में जेल भेजने की सौगंध लेकर चुनाव लड़ी भाजपा ने उनको उप मुख्यमंत्री बना कर उनके समर्थन से सरकार बना ली है। कांग्रेस ने जीवन भर जिस सेकुलर राजनीति की कसमें खाईं, उनकी धज्जियां उड़ाने में सबसे अव्वल रही शिव सेना के साथ उसने तालमेल कर लिया है। इसके लिए ‘दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है’ इस सुविधा के सिद्धांत का इस्तेमाल किया गया। भाजपा को रोकने के लिए शिव सेना से तालमेल कर लेने को कांग्रेस के नेता जायज ठहरा रहे हैं और हैरानी है कि धर्मनिरपेक्षता के तमाम झंडाबरदार इसे सही मान रहे हैं। उनको लग रहा है कि इसलिए भाजपा को रोकना ही प्राथमिकता है और उसके लिए किसी भी सिद्धांत से समझौता किया जा सकता है।

सो, कांग्रेस हो या भाजपा, लेफ्ट हो या समाजवादी पार्टियां हों, सबने अपने आचरण से सैद्धांतिक व वैचारिक गिरावट की नई मिसाल कायम की है। सत्ता हासिल करने के अवसरवाद में उन्होंने राजनीति की न्यूनतम नैतिकता का ख्याल नहीं रखा है। सत्ता के लिए राजनीतिक नैतिकता तो छोड़ी ही गई, जो सरकार में रहा उसने संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों को भी तोड़ मरोड़ कर अपने पक्ष में इस्तेमाल किया। तभी इस समय न्यूनतम नैतिकता, वैचारिकता और राजनीतिक सिद्धांत की बहाली सबसे पहला सरोकार होना चाहिए। एक सीमा तय की जानी चाहिए, जिसके नीचे गिरने की इजाजत किसी भी पार्टी या नेता को नहीं दी जानी चाहिए। इसकी वजह ये है कि इन दिनों राजनीति ही हर चीज को गाइड करने वाली ताकत है। समाज, व्यक्ति का जीवन और राष्ट्र की शक्ति सब कुछ राजनीति से तय होना है। इसलिए उसमें रहने वाले लोगों और पार्टियों के लिए अगर गिरने की अधिकतम सीमा और नैतिकता के पालन की न्यूनतम सीमा भी तय नहीं होगी तो फिर सब कुछ खत्म हो जाएगा। इन दिनों वैयक्तिक व सामाजिक गिरावट की जो नित नई मिसालें बन रही हैं उनके पीछे राजनीतिक गिरावट ही मुख्य कारण है।

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