रेलवे के निजीकरण से राजनीतिक नुकसान!

अजीत कुमार

भारत सरकार कह रही है कि वह रेलवे का निजीकरण नहीं कर रही है। पर उसकी इस बात पर कैसे यकीन किया जाए, जब वह एक एक करके ट्रेनों का परिचालन निजी हाथों में सौंप रही है और रेलवे स्टेशनों कों निजी हाथों में दे रही है? जब रेलवे में माल ढुलाई के लिए निजी कंपनियों को ठेके पर बोगियां दी जाने लगीं तब भी अगर सरकार कह रही है कि वह इसका निजीकरण नहीं कर रही है तो यह असल में लोगों की आंख में धूल झोंकना है। पता नहीं सरकार ऐसा क्यों कर रही है पर यह राजनीतिक रूप से आत्महत्या करने की तरह है। केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी को इसका बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है।

आखिर भारतीय रेल को देश की लाइफ लाइन माना जाता है। देश में बहुत कम लोग ऐसे होंगे, जिनके जीवन को भारतीय रेल में नहीं छुआ होगा या किसी न किसी रूप में प्रभावित नहीं किया होगा। करोड़ों लोगों का रेलवे के साथ आत्मा का संबंध है। इसी तरह रेलवे स्टेशन पर एक पूरा समाज बसता है। कुलियों से लेकर खोमचे वाले और एएच व्हीलर की किताब की दुकानों से लेकर चाय के खोखे तक और बेवजह मटरगश्ती करने वाले लोगों से लेकर भीख मांगने वालों तक का एक पूरा समाज रेलवे स्टेशन पर बसता है। रेलवे हर शहर का अपना एक चौराहा है, जलसाघर है, सेमिनार हॉल है। रेलवे के निजीकरण के साथ साथ यह सब बदल जाएगा। सवाल है कि क्या लोग इसे सहज रूप में स्वीकार कर लेंगे?

सरकार ने एक ट्रेन- तेजस एक्सप्रेस निजी कंपनी के जरिए चलवाई है। दिल्ली से लखनऊ जाने वाली इस ट्रेन का किराया इस रूट पर चलने वाली दूसरी ट्रेनों से दोगुनी है। कहा जा रहा है कि ट्रेन लेट होगी तो यात्रियों को मुआवजा मिलेगा। एक घंटे की देरी पर ढाई सौ रुपए मिलेंगे। अव्वल तो जो व्यक्ति इतनी महंगी टिकट खरीद कर यात्रा करेगा, उसके लिए समय का ज्यादा महत्व होगा और ढाई सौ रुपए में उसका समय नहीं खरीदा जा सकेगा। दूसरे, इस निजी ट्रेन को समय पर चलाने का बंदोबस्त कैसे होगा? और अगर इस निजी ट्रेन के लिए ऐसा हो सकता है तो बाकी ट्रेनों के लिए ऐसा क्यों नहीं किया जा सकता है? जाहिर है रेलवे का प्रबंधन सरकारी ट्रेनों में भेड़-बकरियों की तरह भर कर सफर कर रहे आम लोगों के समय की कीमत पर ही इस ट्रेन को समय पर चलाएगी। उनकी ट्रेनें रोकी जाएंगी और इसे आगे निकाला जाएगा। सवाल है कि सरकार को इस भेदभाव की इजाजत किसने दी है?

इस एक ट्रेन के बाद सरकार डेढ़ सौ और ट्रेनें निजी हाथों में देने जा रही है। उनके किराए का स्ट्रक्चर क्या होगा यह अभी पता नहीं है पर अगर उन्हें भी तेजस की तरह किराया तय करने की छूट दी गई तो निश्चित रूप से इसका विरोध होगा। सबसे पहले तो सरकार लोगों के टैक्स के पैसे से बिछी पटरियों और रेलवे के इंफ्रास्ट्रक्चर पर किसी निजी कंपनी को मुनाफा कमाने की इजाजत दे रही है। यह सही है कि अभी इसका विरोध नहीं हो रहा है पर जब ज्यादा ट्रेनें निजी हाथों में जाएंगी और वे मनमाना किराया वसूलना शुरू करेंगे और उनकी ट्रेनों को समय पर चलाने के लिए सरकारी ट्रेनों में देरी की जाएगी तो लोगों का गुस्सा फूटेगा।

सरकार अगर यह समझ रही है कि इसका भी हाल सरकारी संचार कंपनियों बीएसएनएल और एमटीएनएल वाला कर दिया जाएगा और लोग कुछ नहीं बोलेंगे तो यह उसकी गलतफहमी है। भारतीय रेल बीएसएनएल और एमटीएनएल की तरह की चीज नहीं है। यह सीधे लोगों के जीवन से जुडी हुई है। यह उनके सामाजिक जीवन और आर्थिक व्यवहार को दोनों को प्रभावित करता है। एक तथ्य यह भी है कि सरकार रेलवे को निजी हाथों में देने से पहले कर्मचारियों की छंटनी करने जा रही है। 50 साल से ज्यादा उम्र के तीन लाख से ज्यादा कर्मचारी जबरन रिटायर कराए जाएंगे। वैसे ही रेलवे में काफी समय से भरती नहीं हो रही है और जहां पहले इसमें 16 लाख लोग काम करते थे उनकी संख्या अब घट कर 13 लाख रह गई है। उसमें से भी तीन लाख लोग हटाए जाएंगे।

इस तरह लाखों, करोड़ों लोग सीधे तौर पर सरकार के इस फैसले से प्रभावित होंगे। लोगों की नौकरियां जाएंगी। स्थायी या ठेके पर की नौकरियों की बजाय कैजुअल नौकरियां मिलेंगी। किराया बढ़ेगा। इसे लोग सहज रूप से स्वीकार नहीं करेंगे। रेलवे में नौकरी करने वालों के साथ साथ रेलवे करोड़ों लोगों के लिए अलग से रोजगार का साधन है, जो उनसे छिन सकता है। सरकार को यह समझना चाहिए कि पावर सेक्टर से लेकर बिजली बनाने तक और पेट्रोलियम से लेकर शिपिंग या कंटेनर कारपोरेशन तक उसके जो पीएसयू हैं उनके बारे में देश के ज्यादातर लोग जानते भी नहीं हैं। इसलिए वे उनके बिकने की परवाह नहीं करते हैं। पर भारतीय रेल उनके जीवन से जुड़ी है। रेल की बोगियों से लेकर स्टेशन तक पर उन्होंने यह लिखा देखा है कि रेलवे आपकी संपत्ति है या रेलवे राष्ट्रीय संपत्ति है। इस अपनी या राष्ट्रीय संपत्ति का बिकना या निजी हाथों में जाना लोगों पर बड़ा मनोवैज्ञानिक असर डालने वाला होगा, जिसका राजनीतिक असर सत्तारूढ़ पार्टी को झेलना पड़ेगा। अभी नहीं तो थोड़े समय के बाद!

One thought on “रेलवे के निजीकरण से राजनीतिक नुकसान!

  1. वैसे निजीकरण नहीं करना चाहिए नहीं तो लोगो का सरकार के प्रति विश्वास टूटे गा और सरकार बदलने के ,,,

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