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ईरान पर भारत की कूटनीतिक परीक्षा

अजित कुमार- ऐसा लग रहा है कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने इरादे में कामयाब हो गए हैं। उन्होंने एक तीर से कई निशाने साधे हैं। ट्रंप ने अपनी घरेलू राजनीतिक मजबूरी में ईरान पर हमला किया है पर उसमें उन्होंने भारत को भी उलझा दिया है। असल में वे काफी समय से इस प्रयास में थे कि खाड़ी के मामलों में किसी तरह से भारत को घसीटा जाए। ध्यान रहे भारत अब तक हमेशा खाड़ी की भू-राजनीतिक घटनाओं से अपने को अलग रखता आया है। उसने पूरी तरह से तटस्थता की नीति अपनाए रखी है। चाहे नब्बे के दशक के शुरू में जॉर्ज बुश सीनियर का छेड़ा खाड़ी युद्ध हो या 2001 में जॉर्ज बुश जूनियर द्वारा छेड़ा गया युद्ध हो। दोनों बार भारत इस मामले से अलग रहा। चूंकि खाड़ी देशों के साथ भारत के कई तरह के हित जुड़े हैं और दूसरे वहां के मामले में शामिल होने से भारत में और दक्षिण एशिया में भू-राजनीतिक परिदृश्य प्रभावित होने की भी आशंका रहती है इसलिए भारत इससे दूर रहता है।

पर इस बार ट्रंप ने ईरान के खिलाफ अपनी कार्रवाई को आतंकवाद से जोड़ते हुए कह दिया कि भारत की राजधानी नई दिल्ली में हुए आतंकी हमले में भी ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के प्रमुख कासिम सुलेमानी का हाथ था। गौरतलब है कि कुछ समय पहले भारत में इजराइल के राजदूत की गाड़ी पर बम से हमला हुआ था, जिसमें दिल्ली पुलिस ने रिवोल्शनरी गार्ड्स से जुड़े लोगों पर मुकदमा दर्ज किया था। ट्रंप ने सुलेमानी को मारने की अपनी कार्रवाई को न्यायसंगत ठहराने के लिए इजराइली राजदूत पर हुए हमले से उसे जोड़ दिया है। अब भारत की दुविधा यह है कि उसे ईरान से संबंध रखते हुए अमेरिका और इजराइल दोनों से अच्छे संबंध रखने हैं।

बहरहाल, ट्रंप ने पिछले दिनों ईरान पर पाबंदी लगा कर भारत को इस मामले में उलझाना चाहा। ध्यान रहे ईरान के साथ भारत के बहुत अच्छे संबंध हैं और बहुत पुराने संबंध हैं। तेल उत्पादक देशों में ईऱान एकमात्र देश है, जो भारत को कच्चे तेल की आपूर्ति के बदले में रुपए में भुगतान लेता है। भारत अपनी जरूरत का करीब 40 फीसदी कच्चा तेल ईरान से खरीदता है। सो, अगर अमेरिकी पाबंदी की वजह से भारत ईरान से तेल खरीदना बंद करता है तो उसे बड़ा नुकसान होगा। तेल की कीमत भी बढ़ेगी और भारत का विदेशी मुद्रा भंडार, जो अभी लगातार बढ़ रहा है वह खाली होना शुरू हो जाएगा।

ईरान के साथ भारत का दूसरा हित यह जुड़ा है कि हाल ही में चाबहार बंदरगाह का काम पूरा हुआ है। यह बंदरगाह रणनीतिक रूप से भारत के लिए बहुत उपयोगी साबित हो सकता है। इसकी मदद से भारत पाकिस्तान से गुजरे बगैर अफगानिस्तान तक पहुंच सकता है और वहां से पश्चिम एशिया होते हुए यूरोप तक जाया जा सकता है। इसका आर्थिक महत्व भी है और सामरिक भी। भारत का तीसरा हित यह जुड़ा हुआ है कि खाड़ी में करीब एक करोड़ भारतीय रहते हैं। भारत उनका जीवन खतरे में नहीं डाल सकता है। दूसरे खाड़ी देशों में काम करने वाले भारतीय बड़ी संख्या में विदेशी धन भारत भेजते हैं, जिसका कई राज्यों और अनेक जिलों की अर्थव्यवस्था को ठीक रहने में खासा योगदान रहता है।

इसलिए अमेरिका के ईरान पर पाबंदी लगाने और उससे टकराव बढ़ाने के बावजूद भारत ने ईरान से बेहतर संबंध रखे हैं। पर अब अमेरिका ने सीधे हमला बोल दिया है। उसने ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के प्रमुख कमांडर जनरल कासिम सुलेमानी को मार गिराया है। उसके बाद भी उसने कथित तौर पर बगदाद में ईरान समर्थकों के एक काफिले पर हमला किया, जिसमें छह लोग मारे गए। तीन जनवरी को कासिम सुलेमानी को मारने के बाद अमेरिका ने चार हजार से ज्यादा और अमेरिकी सैनिकों को बगदाद भेजा है और वहां से अपने नागरिकों को निकालना शुरू कर दिया है। कहा जा रहा है कि अमेरिका ने एक लाख से ज्यादा सैनिकों को तैयार रहने को कहा है। एक तरफ ईरान ने बदला लेने की धमकी दी है और उसने अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी वाले बगदाद के एक इलाके में रॉकेट से हमला भी किया है तो दूसरी ओर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि अगर ईरान ने उसके ऊपर हमला किया तो वह ईरान के 52 ठिकानों को निशाना बनाएगा।

अमेरिक और ईरान के इस टकराव को देखते हुए तीसरे विश्व युद्ध की चर्चा शुरू हो गई है। तीसरा विश्व युद्ध भले न शुरू हो पर तीसरी दुनिया पर इस टकराव का बड़ा असर होगा। भारत खास तौर से इस लड़ाई से प्रभावित होगी। वहां मौजूद भारतीयों की जान को खतरा बढ़ेगा और साथ ही कच्चे तेल की कीमतों में भी इजाफा शुरू होगा। सुलेमानी के मारे जाने के तुरंत बाद कच्चे तेल की कीमतों में दस डॉलर प्रति बैरल तक की बढ़ोतरी हो गई। अगर हालात ऐसे ही रहते हैं तो यह भी संभव है कि ईरान से होकर गुजरने वाले तेल टैंकरों पर भी रोक लगे। इससे आपूर्ति और कीमत दोनों प्रभावित होंगे। अब इसमें भारत की कूटनीतिक परीक्षा होनी है कि वह कैसे इस हालात को संभालता है ताकि ईरान के साथ उसके संबंध भी प्रभावित न हों और अमेरिका व इजराइल के साथ संबंधों पर भी असर न हो।

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