भाजपा के नए अध्यक्ष की चुनौतियां

सुशांत कुमार– जगत प्रकाश नड्डा भारतीय जनता पार्टी के नए अध्यक्ष बने हैं। वे पिछले छह महीने से ज्यादा समय से कार्यकारी अध्यक्ष के तौर पर काम कर रहे थे। केंद्र में दूसरी बार नरेंद्र मोदी की सरकार बनी तो उन्हें मंत्री नहीं बनाया गया। उसी समय यह तय हो गया था कि वे पार्टी के नए अध्यक्ष बनेंगे। इसलिए उनका अध्यक्ष बनना कोई चौंकाने वाली घटना नहीं है। भाजपा की राजनीति और उसके संगठन स्वरूप को देखते हुए यह भी कोई हैरान करने वाली बात नहीं है कि प्रदेश की राजनीति से निकल कर आने के दस साल के अंदर कोई नेता राष्ट्रीय अध्यक्ष बन जाए। आखिर नितिन गडकरी भी सीधे महाराष्ट्र की राजनीति से निकल कर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने थे।

नितिन गडकरी ही जेपी नड्डा को हिमाचल प्रदेश से दिल्ली लेकर आए थे। गडकरी जब राष्ट्रीय अध्यक्ष बने उस समय नड्डा हिमाचल प्रदेश सरकार में मंत्री थे। वे मंत्री पद छोड़ कर दिल्ली आए और भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव बने। उसके बाद गडकरी तो अध्यक्ष पद से हट गए पर नड्डा की तरक्की जारी रही। वे पहली बार 2012 में राज्यसभा सदस्य बने, 2014 में केंद्र में स्वास्थ्य मंत्री बने, भाजपा के संसदीय बोर्ड में शामिल हुए, सदस्य सचिव बने, 2018 में दूसरी बार राज्यसभा के लिए चुने गए, 2019 में कार्यकारी अध्यक्ष बने और अब पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए हैं।

उनका यह राजनीतिक सफर किसी भी राजनीतिक कार्यकर्ता के लिए एक सपने के सफर जैसा है। इसमें उनकी अपने मेहनत और राजनीतिक समझदारी के साथ साथ इस बात का भी बड़ा योगदान है कि वे भाजपा के मौजूदा नेतृत्व यानी नरेंद्र मोदी और अमित शाह दोनों के भरोसेमंद नेता हैं। भाजपा में राष्ट्रीय महामंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी जब दिल्ली में काम करते थे, तब वे हरियाणा, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के प्रभारी थे। उस समय नड्डा हिमाचल प्रदेश में उभरते हुए नेता थे। उनकी पृष्ठभूमि राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद वाली थी। तब से वे नरेंद्र मोदी की नजर में रहे होंगे। यह संयोग है कि जिस समय नरेंद्र मोदी वापस दिल्ली आए उस समय नड्डा पार्टी के महासचिव के नाते काम कर रहे थे।

उनकी इस राजनीतिक पृष्ठभूमि को समझना इसलिए जरूर है क्योंकि जेपी नड्डा आगे भाजपा को कैसे चलाएंगे और उनके सामने जो चुनौतियां हैं उनसे कैसे निपटेंगे इसे समझना आसान हो जाएगा। इसमें कोई भ्रम नहीं रखना चाहिए कि भाजपा वैसे ही चलेगी, जैसे अभी चल रही है। इसमें किसी तरह का बड़ा या कोई बुनियादी बदलाव नहीं आना है। भाजपा देश की सबसे बड़ी  पार्टी है और अब इसके ज्यादा विस्तार की संभावना भी बहुत कम है। दक्षिण भारत के राज्यों में जरूर भाजपा का फैलाव होना है पर वह लंबे समय की योजना का हिस्सा है। जहां तक चुनावी राजनीति का सवाल है तो पार्टी लगभग सारे चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर लड़ रही है और आगे निकट भविष्य में भी उनके नाम पर ही लड़ती रहेगी। इसलिए उसमें भी पार्टी के अध्यक्ष को बहुत कुछ नहीं करना होता है।

अमित शाह अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी छोड़ने के बाद भी पार्टी संगठन और चुनावी राजनीति में शामिल रहेंगे। हां, इतना बदलाव होगा कि पार्टी के रोजमर्रा के कामकाज में उनका दखल नहीं रहेगा। पार्टी संगठन के पदाधिकारी नए अध्यक्ष के तौर पर नड्डा को रिपोर्ट करेंगे। इस बात की भी संभावना कम है कि पार्टी संगठन में कोई बड़ी फेरबदल होगी। इसके बावजूद यह संभव नहीं है कि नड्डा पूरी तरह से अमित शाह की छाया में राजनीति करेंगे या रबर स्टैंप अध्यक्ष रहेंगे। यह सही है कि वे अमित शाह की तरह खुल कर और पूरी तरह से स्वतंत्र रूप से सारे फैसले नहीं करेंगे पर वे सिर्फ सर हिलाने वाले अध्यक्ष भी नहीं होंगे। उनके अध्यक्ष बनने के बाद एक बदलाव यह होगा कि पार्टी के पदाधिकारियों का महत्व बढ़ेगा, उनकी सक्रियता बढ़ेगी और फैसलों में संसदीय बोर्ड की भूमिका बढ़ेगी।

सो, नए अध्यक्ष के नाते नड्डा के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस धारणा को तोड़ने की होगी कि वे अमित शाह की छाया में काम करने वाले अध्यक्ष हैं। उन्हें स्वतंत्र रूप से और अपनी समझ से राजनीति करने का मैसेज बनवाना होगा। इसके साथ ही राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के साथ तालमेल बैठाना होगा। वैसे वे भी संघ की पृष्ठभूमि से हैं इसलिए उन्हें ज्यादा दिक्कत नहीं होगी। इसके बाद बतौर अध्यक्ष उनके ऊपर चुनावी अभियानों के संचालन की चुनौती होगी। ध्यान रहे मोदी और शाह ने भाजपा को चुनाव लड़ाने और जीतने वाली मशीनरी में बदल दिया है। इस मशीनरी का सफलतापूर्वक संचालन आसान नहीं होगा। वह भी तब, जबकि अगले दो  साल में होने वाले लगभग सारे चुनाव भाजपा के लिए बहुत मुश्किल हैं।

उनके अध्यक्ष बनने के बाद पहला ही चुनाव दिल्ली का है, जहां भाजपा की जीत की संभावना बेहद कम मानी जा रही है। अमित शाह को भी दिल्ली का झटका लगा था पर तब तक उनकी कमान में पार्टी तीन राज्यों के चुनाव जीत चुकी थी। नड्डा के साथ ऐसा नहीं है। उनकी शुरुआत दिल्ली की हार से हो सकती है। इसके बाद बिहार के चुनाव में भाजपा की भूमिका बहुत नहीं है। अगले साल पांच राज्यों- पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुड्डुचेरी के चुनाव हैं। इनमें से असम में सत्ता बचाने और कम से कम एक राज्य पश्चिम बंगाल में सत्ता हासिल करने की चुनौती है। संशोधित नागरिकता कानून पर देश भर में चल रहे आंदोलनों से निपटना वैसे तो सरकार की जिम्मेदारी है पर इसमें पार्टी की भी अहम भूमिका हो सकती है। बतौर अध्यक्ष नड्डा की पहली परीक्षा इसी में होनी है।

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