सादगी और संतुलन की बानगी कमलनाथ की कार्यशैली

दरअसल किसी भी नेता का असली चरित्र तब समझ में आता है जब वह किसी महत्वपूर्ण पद पर पहुंचता है क्योंकि तब उसकी कार्यशैली ही उसकी सबसे बड़ी गवाह होती है। भारतीय राजनीति में ऐसे अनेक उदाहरण मिले हैं जिसमें सीधे, सहज, सरल और ईमानदार देखने वाले नेता पद पर पहुंचने के बाद अहंकारी और भ्रष्टाचारी निकले तो कुछ ऐसे ही थे जो पहले आडंबर में जीने वाले पद पैसा और प्रतिष्ठा को सब कुछ मान कर चलते थे लेकिन पद पर आने के बाद वे सहज, सरल और अपने काम से काम रखने वाले माने गए।

बहरहाल मुख्यमंत्री कमलनाथ अब तक के मुख्यमंत्रियों में अलग शैली के मुख्यमंत्री दिखाई दे रहे हैं। इसके पहले 13 वर्षों से अधिक समय तक मुख्यमंत्री रहे शिवराज सिंह चौहान की कार्यशैली एकदम उलट थी। वे सुबह से निकल जाते थे प्रदेश के दौरे पर, बड़ी-बड़ी सभाओं में जनता से संवाद करते थे, मुख्यमंत्री निवास पर पंचायतें लगाते थे, सामाजिक सरोकारों से जुड़ी योजनाओं को लागू करते थे और संपर्क में अधिक भरोसा करते थे लेकिन मुख्यमंत्री कमलनाथ बहुत जरूरी हुआ तभी राजधानी से बाहर प्रदेश में कहीं किसी कार्यक्रम में शामिल होते हैं अन्यथा सुबह 10 बजे से देर रात तक मंत्रालय में बैठकर फाइलें निपटाते हैं।

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वे ना तो लंबा-चौड़ा भाषण देते हैं और ना ही सामाजिक सरोकारों की जुड़ी हुई नई योजनाओं का सर्जन करते हैं। अधिकांश नेता मौसम के अनुरूप या फिर कार्यक्रम के अनुरूप अपना ड्रेस कोड तय करते हैं लेकिन मुख्यमंत्री कमलनाथ सिंपल कुर्ता-पजामे में ही अधिकांश कार्यक्रम में शिरकत करते हैं। यहां तक कि पिछले दिनों इंदौर में हुई उद्योगपतियों की समिट में भी वे कुर्ते-पजामे में ही नजर आए।

राजनीति की शुरुआत में भले ही बने अनुकूल परिस्थितियां मिलीं। इंदिराजी जहां उन्हें तीसरा बेटा कहती थीं वहीं छिंदवाड़ा जैसी कांग्रेस के लिए सुरक्षित सीट से उन्हें चुनाव लड़ने का मौका मिला लेकिन उन्होंने छिंदवाड़ा में सांसद, केंद्रीय मंत्री रहते हुए जो विकास किया उसके चलते छिंदवाड़ा मॉडल की चर्चा पूरे प्रदेश में होती है। बाकी प्रदेश में ऐसा कोई सांसद और केंद्रीय मंत्री नहीं हुआ जो अपने संसदीय क्षेत्र को मॉडल क्षेत्र के रूप में प्रस्तुत कर सके। इसके बावजूद उन्हें मुख्यमंत्री के पद तक पहुंचने में लंबा इंतजार करना पड़ा और जब उन्हें मौका दिया गया तब प्रदेश में कांग्रेस के लिए बेहद प्रतिकूल परिस्थितियां थीं।

पार्टी के क्षत्रप नेता गुटों और स्थानीय नेता तो उपगुटों में बंटे हुए थे। दूसरी तरफ तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में पूरी भाजपा एकजुट थी और 15 वर्षों में बूथ स्तर तक भाजपा ने मजबूत जमावट कर ली थी। यहां तक कि भाजपा नेता कांग्रेसमुक्त प्रदेश का नारा दे रहे थे लेकिन राजनीति के दीर्घकालिक अनुभव को समेटे मुख्यमंत्री कमलनाथ ने पार्टी द्वारा सौंपी गई जिम्मेवारी को ना केवल स्वीकार किया, वरन पार्टी के भरोसे को कायम रखते हुए उन्होंने 15 वर्षों के बाद प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनाने में सफलता हासिल की। पिछले 1 वर्ष से वे अपना अधिकांश समय राजधानी भोपाल में ही बिता रहे हैं। इसके पहले यदा-कदा ही भोपाल आया करते थे।

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मुख्यमंत्री बनने के बाद भी कमलनाथ की चुनौतियां कम नहीं हुईं, क्योंकि पार्टी के अंदर और बाहर से आज भी उन्हें सतर्क और सावधान रहना पड़ता है। पार्टी के विधायक कमलनाथ दिग्विजय और सिंधिया खेमे में बंटे हैं तो सपा, बसपा और निर्दलीयों का भी सहयोग लेना पड़ रहा है। पार्टी के कार्यकर्ता और नेताओं की अपेक्षाएं भी बीच-बीच में हिलोरें मारती रहती हैं। जबकि आम जनता अभी भी कमलनाथ से किसी चमत्कार करने की उम्मीद लगाए बैठी है जिसमें सभी किसानों के कर्ज माफ हो जाएं, बेरोजगारों को रोजगार मिल जाए, महंगाई कम हो जाए, कमलनाथ किस-किस को समझाएं कि सरकार का खजाना पूरी तरह खाली है, मंत्रिमंडल का विस्तार करना है, नया प्रदेश अध्यक्ष बनवाना है, निगम-मंडलों में नियुक्तियां करवाना है, आगामी दिनों में नगरीय निकाय और त्रिस्तरीय पंचायती राज के चुनाव करवाना है, फिर इसके बाद ही कुछ और किया जा सकेगा।

कुल मिलाकर चौतरफा चुनौतियों से जूझते हुए कमलनाथ सादगी और संतुलन बनाने की मिसाल तो कायम कर पाए हैं, लेकिन आम जनता में सरकार का स्थायित्व और उनकी उम्मीदों में खरा उतरना बाकी है। आज जन्मदिन है। एक महीने बाद सरकार 1 वर्ष पूरा करेगी। सो मूल्यांकन तो होगा ही और अनुभवी कमलनाथ आगे की राह कैसे तय करते हैं, यह तो आने वाला समय ही बताएगा।

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