केजरीवाल के सामने अनेक चुनौतियां

अरविंद केजरीवाल तीसरी बार दिल्ली के मुख्यमंत्री बन गए हैं। उनमें और प्रधानंमत्री नरेंद्र मोदी में कई समानताएं हैं। दोनों राजनीति को 24 घंटे और सालों भर चलने वाला काम मानते हैं। बाकी राजनेताओं की तरह वे सिर्फ चुनाव के समय ही चुनावी मोड में नहीं आते हैं, बल्कि सालों भर चुनावी मोड में रहते हैं। तभी उनकी नीतियां, फैसले सब चुनाव की संभावना लिए हुए होते हैं। पांच साल तक केजरीवाल ने दिल्ली में इसी अंदाज में काम किया। उन्होंने बिजली और पानी का वादा सरकार में आते ही पूरा कर दिया। शिक्षा और स्वास्थ्य पर पांच साल काम करते रहे और फ्री वाई-फाई, डीटीसी में महिलाओं की मुफ्त यात्रा, बस मार्शल की नियुक्ति, सीसीटीवी कैमरे आदि का फैसला चुनाव से छह महीने पहले शुरू किया। अब उन्होंने दस चीजों की लिखित गारंटी दी है और यह वादा किया है कि दिल्ली में प्रदूषण कम करेंगे। उन्होंने मुफ्त की सारी योजनाएं जारी रहने का वादा किया है और साथ ही कुछ और नए समूहों को कुछ चीजें मुफ्त में देने का वादा भी किया है।

तभी सवाल है कि वे इन कामों को कैसे अंजाम देंगे? यह तय मानना चाहिए कि केंद्र सरकार की ओर से उन्हें बहुत ज्यादा सहयोग नही मिलने वाला है। हां, यह जरूर है कि पिछली बार के मुकाबले इस बार थोड़ी कम अड़ंगेबाजी होगी। दूसरे, पड़ोसी राज्यों से भी उनको कितना सहयोग मिलेगा यह अभी नहीं कहा जा सकता है। ध्यान रहे बिना पड़ोसी राज्यों के सहयोग के दिल्ली में प्रदूषण कम करना संभव नहीं होगा। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान धान के पुआल जलाते हैं तो उसके धुएं से दिल्ली का दम घुटता है। हरियाणा में पानी खराब होता है तो दिल्ली में पानी का संकट हो जाता है। हरियाणा पानी रोक दे तो दिल्ली में पानी नहीं आए और ज्यादा पानी छोड़ दे तो बाढ़ आ जाती है। पड़ोस के इन तीनो राज्यों में विपक्षी पार्टियों की सरकार है।

सो, केजरीवाल के सामने सबसे बड़ी चुनौती साफ पानी और स्वच्छ हवा की है, जिसका उन्होंने बड़ा वादा दिल्ली के लोगों से किया है। इसके लिए उनके प्रशासनिक प्रयास चाहे जो हों, पर वास्तविक सुधार के लिए उनको राजनीतिक प्रयास करने होंगे। वे दिल्ली में जगह जगह पर बड़े एयर फिल्टर लगवा देंगे, पानी साफ करने का जलशोधन संयंत्र लगा देंगे पर पानी और हवा की समस्या तब तक नहीं सुलझेगी, जब तक चार राज्यों का साझा प्रयास नहीं होगा। ध्यान रहे केजरीवाल ने पिछली सरकार में कोई विभाग अपने पास नहीं रखा था। बाद में उन्होंने पानी का विभाग अपने पास रखा। इससे जाहिर हुआ कि पानी उनकी प्राथमिकता में है। सो, पानी और हवा की अपनी प्राथमिकता में केजरीवाल को विपक्षी पार्टियों की सरकारों से बात करनी होगी और उन्हें अपने प्रयासों में शामिल करना होगा। उन्हें दिल्ली में मिली भारी भरकम जीत के बाद अब हर सवाल का जवाब अपने समर्थकों को ही देना है।

दूसरी चुनौती भ्रष्टाचार रोकने की है। याद करें, जब केजरीवाल पांच साल पहले सत्ता में आए थे तब उन्होंने भ्रष्टाचार पर बड़े भाषण दिए थे। उससे पहले 49 दिन की सरकार से उन्होंने इस्तीफा ही जन लोकपाल के नाम पर दिया था। फरवरी 2015 में 67 सीटों के साथ मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने दिल्ली के लोगों को खूब समझाया कि भ्रष्टाचार से कैसे लड़ें। उन्होंने कहा कि मोबाइल फोन लोगों का हथियार है। लोग उससे रिश्वत मांगने वालों की वीडियो बनाएं और उसे पोस्ट करें, सरकार कार्रवाई करेगी। थोड़े समय यह मुहिम चली। पर अब किसी को पता नहीं है कि जिन लोगों की वीडियो बनी थी उनका क्या हुआ और अभी सरकारी विभागों में क्या चल रहा है। असलियत यह है कि दिल्ली के सरकारी विभागों में अब भी सब कुछ वैसे ही चल रहा है, जैसे पहले चल रहा था। केजरीवाल ने भी इसे ऐसा लग रहा है कि स्वीकार कर लिया है। इस कार्यकाल में उनके सामने ईमानदारी सरकार देने की एक बड़ी चुनौती होगी। उन्होंने लिखित वादे में लोकपाल बनाने का वादा भी किया है। इसे वे कैसे पूरा करेंगे यह देखना दिलचस्प होगा क्योंकि लोकपाल बिल केंद्र के पास लंबित है।

दिल्ली को साफ-सुथरा बनाने और इसके दुनिया के सबसे बड़े झुग्गी-झोपड़ी शहर में बदल जाने की प्रक्रिया को रोकना भी एक बड़ी चुनौती है। केजरीवाल सरकार की नीतियों की वजह से दिल्ली में झुग्गी-झोपड़ियों की अचानक बाढ़ आ गई है और इसी अनुपात में सड़कों पर रेहड़ियों की संख्या भी बढ़ी है। वोट बैंक की राजनीति इससे जरूर सधती है पर यह दिल्ली को विश्वस्तरीय शहर बनाने के उनके वादे के अनुरूप नहीं है। गरीबों और पूर्वांचल के वोट बैंक को बचाए रखते हुए केजरीवाल दिल्ली को कैसे साफ-सुथरा और विश्वस्तरीय बनाते हैं यह भी देखने वाली बात होगी।

दिल्ली के लोगों को मुफ्त बिजली, पानी, बस यात्रा, अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य की जो योजनाएं केजरीवाल सरकार ने चलाई हैं, उन्हें उनको चलाए रखना है। आम लोगों को यहीं लग रहा है कि यह सरकार के लिए बड़ी चुनौती है। पर असल में ऐसा नहीं है। इन योजनाओं पर सरकार का बहुत ज्यादा खर्च नहीं होता है। तभी कई चीजें मुफ्त करने के बावजूद दिल्ली का वित्तीय घाटा राष्ट्रीय औसत और दिल्ली की पिछली सरकारों के समय रहे वित्तीय घाटे के मुकाबले बहुत कम है। अगर देश का वित्तीय घाटा तीन फीसदी से ज्यादा है तो दिल्ली का वित्तीय घाटा आधा फीसदी से भी कम है। ऐसे ही राजस्व संग्रह के मामले में भी दिल्ली की स्थिति राष्ट्रीय औसत से बेहतर है और पहले की सरकारों के मुकाबले भी अच्छी है। दिल्ली में पांच साल में कोई नया कर लगाए गए और किसी भी कर में बढ़ोतरी किए बगैर केजरीवाल सरकार ने यह लक्ष्य हासिल किया है। सो, नए कार्यकाल में यह ज्यादा बड़ी चुनौती नहीं होगी।

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