हिंदुत्व और सेक्यूलरिज्म के बीच उद्धव

भाजपा के समर्थकों ने सोशल मीडिया पर उद्धव ठाकरे के खिलाफ अभियान शुरू कर दिया है। बाला साहेब ठाकरे के पुराने भाषणों और साक्षात्कारों के वीडियो वायरल हो रहे हैं। इन वीडियो में बाला साहेब ठाकरे ने सोनिया गांधी और शाद पवार पर जम कर हमले किए हुए हैं तो उद्धव ठाकरे की टीम भी डेमेज कंट्रोल में लगी हुई है उनकी तरफ से बाला साहेब ठाकरे की इंदिरा गांधी से मुलाक़ात और शरद पवार के साथ बातचीत करते हुए कुछ फोटो लगाए गए हैं। बाला साहेब ठाकरे एक बार लखनऊ को छोड़ कर शायद कभी मुम्बई से बाहर नहीं गए।

उनका एक वीडियो बहुत प्रचारित किया जा रहा है , जिस में वह कह रहे हैं कि उन की पार्टी हिंदुत्व की विचारधारा पर आधारित है , जिस के साथ वह कभी समझौता नहीं करेंगे , अगर समझौता करने की नौबत आई तो वह अपनी शिवसेना की दूकान बंद कर देंगें। उन्होंने यह भी कहा था कि सत्ता शिवसेना का लक्ष्य नहीं है , अगर कुर्सी के लिए विचारधारा से समझौते का दबाव पड़ा तो वह चुनावों की राजनीति से बाहर होने का ऐलान भी कर सकते हैं।

ये सभी वीडियो उद्धव ठाकरे के सत्ता के लिए सोनिया और पवार के साथ किए गए सेक्यूलर गठबंधन से कतई मेल नहीं खाते। उद्धव ठाकरे की शिवसेना ने मुख्यमंत्री पद की कुर्सी के लिए उन्हीं सोनिया गांधी और शरद पवार से समझौता कर लिया , और माना जाता है कि हिंदुत्व के साथ भी समझौता कर लिया है क्योंकि दोनों पार्टियों का आग्रह हिंदुत्व विरोधी है। नेतृत्व की नई आबोहवा को पहचान कर शिवसेना के कई कार्यकर्ताओं ने अति उत्साह में मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए कर्बला में इमाम हुसैन की कुर्बानी को सलामी के लिए उर्दू में पोस्टर भी लगवा दिए।

यह स्थिति भाजपा के लिए लाभकारी और शिवसेना के लिए घाटे का सौदा होगी , क्योंकि हिंदुत्व की विचारधारा के कारण शिवसेना से जुड़ा काडर भाजपा की तरफ आकर्षित होगा , जिस का 2020 के मध्य में होने वाले महा नगर पालिकाओं के चुनाव में भाजपा को लाभ होगा। जो दोनों पार्टियों के लिए बड़ी इज्जत का सवाल है।

सोशल मीडिया में उन को कटघरे में खडा किए जाने और शिवसेनिकों के दिग्भ्रमित होने की खबरों ने मातोश्री की नींद उड़ा दी है , क्योंकि ख़तरा सिर्फ काडर का नहीं ह, अलबत्ता शिवसेना के विधायकों और सांसदों के खिसकने का भी है। इस लिए पारिवारिक विचार-विमर्श के बाद उद्धव ठाकरे ने महाराष्ट्र विधानसभा में ताल ठोक कर कह दिया है कि वह हिंदुत्व की विचारधारा से कोई समझौता नहीं करेंगे। जिस समय उद्धव ठाकरे यह बात कह रहे थे , उस समय उन के पीछे बैठे उन के पुत्र आदित्य ठाकरे जोर जोर से मेज थपथपा रहे थे। शिवसेना के सारे विधायक झूम उठे , जब कि कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस के विधायक हतप्रभ थे। सवाल यह है कि उद्धव ठाकरे की इस घोषणा के बाद सोनिया गांधी और शरद पवार खुद को असहज महसूस कर रहे होंगे या जहर का घूँट पी लेंगे।

खबर यह है कि राष्ट्रवादी कांग्रेस के नेतृत्व ने जस्टिस लोया और शहरी नक्सलियों के मामले में पूर्व की भाजपा-शिवसेना सरकार की ओर से लिए गए स्टैंड को बदलने और नए सिरे से जांच करवाने की मांग उठा कर उद्धव ठाकरे को असहज करने की रणनीति बनाई है। यह मांग निश्चित रूप से शिवसेना और मुख्यमंत्री को असहज करने वाली होगी।

अगर गृहमंत्री , जो कि कांग्रेस या राष्ट्रवादी कांग्रेस से ही होगा , इन सभी मामलों की एकतरफा नए सिरे से जांच के आदेश दे देंगेतो उद्धव ठाकरे क्या करेंगे। सोशल मीडिया के हमले और पार्टी को एकजुट रखने के लिए हिंदुत्व पर डटे रहने का बयान दे कर उद्धव ठाकरे ने फौरी इलाज तो कर लिया है , लेकिन सच यही है कि उन के हिंदुत्व और सेक्यूलरिज्म के बीच झूलते रहने का इम्तिहान तो हर रोज होगा।

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