भाजपा को बदलनी होगी शैली

वैसे कांग्रेस और भाजपा की कार्यशैली में कोई अंतर नहीं है। लीडर आधारित पार्टियां ज्यादा समय तक लोकप्रिय नहीं रहती| जनता जब उखाड़ने को आती है तो 1971 की शेरनी को सिर्फ छह साल बाद 1977 में उखाड़ फैंकती है। भाजपा का नेतृत्व लालू, मुलायम, माया, जयललिता की पार्टियों को व्यक्तिगत दुकाने कहता रहा हॉ| कई बार कांग्रेस को भी एक परिवार की प्राईवेट लिमिटेड कपंनी कहती है। फिर भाजपा खुद ऐसी क्यों बनती जा रही है। भाजपा की खासियत तो सामूहिक नेतृत्व की रही है।

पर भाजपा के कार्यकर्ता अब ऐसा क्यों कहने लगे हैं कि उनका नेतृत्व दो नेताओं के इर्द गिर्द सिमट गया है। पार्टी में उन की शिकायतों को सुनने वाला कोई नहीं रहा| पार्टी अब अपने कार्यकर्ताओं को संभाल भी नहीं सकती जैसा कि संघ परिवार की पद्धति रही है। संगठन पर पहले संघ से आए संगठन मंत्रियों की पकड़ रहती थी वह भी लाचार हो गए है।

एक जमाना था ,जब कांग्रेस एक राजनीतिक दल नहीं , बल्कि एक राजनीतिक आन्दोलन था। हर कोई उससे सहज ही जुड़ जाता था। अपन आज़ादी से पहले की बात नहीं कर रहे , इंदिरा गांधी के पार्टी का एकछत्र नेता बनने से पहले तक यह हालत थी। कांग्रेस का सदस्य न होते भी कोई शख्स कांग्रेस कार्यालय में जा कर अपनी शिकायत, नाराजगी , उस के साथ हो रहे अन्याय या यहाँ तक कि कोई सुझाव दे सकता था। धीरे धीरे कांग्रेस जन जन की पार्टी बने रहने के बजाए एलीट क्लास की पार्टी बन गई। नतीजा यह निकला कि एलीट क्लास ही हाई कमान के आँख-कान बन गए। समाज के एलीट वर्ग का जमीनी हकीकत से कोई मतलब नहीं होता , हालांकि उन के सुझाव कई बार बहुत महत्वपूर्ण हो जाते हैं पर वे कभी नेता नहीं हो सकते। न वे चुनावी राजनीति के मर्मग्य होते हैं , न जमीनी समस्याओं और हकीकत को समझ पाते हैं| कांग्रेस के रसातल में जाने का एक बड़ा कारण यह भी रहा कि राजीव गांधी के जमाने से ही पार्टी के प्रदेशों के प्रभारी राज्यसभा वाले बनाए जाने लगे थे।

वे पार्टी हाईकमान को सलाह देते थे , और अपने सलाह के मुताबिक सहमती ले कर राज्य ईकाईयों को हुक्म सुनाने लगे। वे ऊपर से आदेश के नाम पर प्रदेश और जिला अध्यक्ष नियुक्त करने लगे, यहाँ तक कि मुख्यमंत्री भी ऊपर से तय होने लगॉ| जिस कारण पार्टी में पहले निराशा , फिर आक्रोश और अंत में बगावत होने लगी| इस तरह कांग्रेस आज इस हालत में पहुंच गई है।

महाराष्ट्र और झारखंड के बाद भाजपा के बारे में अब कुछ लिखने को नहीं रह गया है| हूँ-ब-हूँ वही तो हुआ है , जो कांग्रेस में हुआ। कांग्रेस में व्यापक सुधार हो रहा है , महाराष्ट्र में सरकार बनाने का श्रेय जमीनी राजनीति से जुड़े मल्लिकार्जुन खड्गे को जाता है जिन्होंने सोनिया गांधी को जमीनी हकीकत से रूबरू करवाया। कांग्रेस कार्यसमिति में भारी विरोध के बावजूद उन्होंने यह कह कर सोनिया को राजी किया कि प्रदेश के नेताओं और विधायकों की बात सुननी पड़ेगी। क्या भाजपा में ऐसा हो रहा है?

अगर हो रहा होता तो झारखंड में भाजपा के अनेक नेता अपनी पार्टी की हार पर खुश नहीं होते, जैसा उन्होंने सोशल मीडिया पर खुशी का इजहारकरकेकिया है। भाजपा केंद्र से राज्यों को चलाने वाली अपनी शैली नहीं बदलेगी तो एक एक कर सभी राज्य गंवा लेगी| हालांकि कांग्रेस की मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति के कारण भाजपा को राष्ट्रीय स्तर पर कोई खतरा नहीं। नागरिकता संशोधन क़ानून का विरोध करके उस ने अपनी ही जड में एकबार फिर मठ्ठा डाला है। राज्यों में भाजपा की हार के कारण कांग्रेस इस मुगालते में न रहे कि भाजपा का हिन्दू वोट बैंक खिसक रहा है।

बड़ा सवाल यह है कि जिस तरह भाजपा राज्यों में हार रही है , मोदी सरकार इसी टर्म में राज्य सभा में फिर अल्पमत में आ जाएगी, फिर उस के हाथ बंध जाएंगे। राज्यों में भाजपा उन बीमारियों के कारण हार रही है, जिन का जिक्र अपन ने ऊपर किया , जो कांग्रेस से भाजपा में पहुंच चुकी हैं। भाजपा में कभी हाईकमान की परम्परा नहीं हुआ करती थी। राज्यों के प्रभारी राज्यों में जा कर हाईकमान का हुक्म नहीं बजाया करते थे। प्रदेश अध्यक्ष और मुख्यमंत्री ऊपर से थोंपे नहीं जाते थे। अब भाजपा अपने चुनाव प्रभारी भी उन नेताओं को बनाती है जिन्होंने कभी चुनाव नहीं जीता न ही कभी जीत सकते हैं। वे जा कर बताते हैं कि चुनाव कैसे जीते जाते हैं।

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