भारत के बातूनी सैन्य अधिकारी!

शशांक राय– भारत में सैन्य अधिकारियों के बोलने या जरूरत से ज्यादा बोलने की परंपरा कभी नहीं रही है। सेना के जनरल बोलने में कम और काम करने में ज्यादा यकीन रखते थे। ध्यान नहीं आता है कि पाकिस्तान के 96 हजार सैनिकों का समर्पण कराने वाले सैन्य अधिकारियों ने भी कभी सीना ठोक कर इस बारे में कुछ कहा हो। वे सही या गलत कुछ भी नहीं बोलते थे क्योंकि बोलना उनका काम नहीं होता था। अफसोस की बात है कि पिछले एक दशक में धीरे धीरे यह परंपरा टूटने लगी है। सेना के जनरल्स सही और गलत और कई बार अनर्गल बातें भी बोलने लगे हैं। यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि, जैसे जैसे भारतीय सैन्य अधिकारियों का बोलना बढ़ा है उसी अनुपात में सीमा पर तनाव बढ़ा है। पाकिस्तान और चीन की घुसपैठ बढ़ी है। सीमा पर सैनिक असुरक्षित हुए हैं और कुल मिला कर सीमा पर शांति भंग हुई है।

पिछले दिनों भारतीय सेना की कमान महाराष्ट्र से आने वाले जनरल मनोज मुकुंद नरवणे के हाथ में गई तो लंबे समय के बाद ऐसा लगा कि बोलने वाले जनरल्स की पंरपरा को ब्रेक लगेगा। असल में जनरल नरवणे से पहले हिंदी पट्टी के या सीमा से सटे इलाकों के सैन्य अधिकारी सेना प्रमुख बनते रहे थे। तभी ऐसा लगा कि मराठी सेना प्रमुख बनने से सार्वजनिक बयानबाजी कम होगी। पर अफसोस ऐसा नहीं हुआ। 31 दिसंबर को थल सेना प्रमुख की कमान संभालने के बाद से जनरल नरवणे लगातार बोल रहे हैं। पहले दिन उन्होंने कहा कि पाकिस्तान आतंकवाद बंद नहीं करता है तो भारत उसकी जड़ पर हमला करने का अधिकार रखता है। ध्यान रहे उनके यह बात कहने से पहले पिछले तीन साल में भारत दो बार आतंकवाद की जड़ पर हमला कर चुका था। पहले सितंबर 2016 में जब सेना की सर्जिकल स्ट्राइक हुई थी और फिर फरवरी 2019 में जब बालाकोट में सेना ने एयर स्ट्राइक किया था। तभी सवाल है कि नए सेना प्रमुख को यह बात कहने की क्या जरूरत थी? भले यह कहने में तकनीकी या कानूनी रूप से कुछ भी गलत नहीं हो पर इसकी जरूरत क्या थी? अब उन्होंने अपनी पहली प्रेस कांफ्रेंस की तो कहा कि अगर संसद कहे तो सेना पाक अधिकृत कश्मीर को भी हासिल कर सकती है। यह बात भी कहने की क्या जरूरत थी और इससे आखिर क्या हासिल हुआ? सेना प्रमुख की इस बात ने भारतीय सेना का मजाक बनवा दिया है। दुनिया की नजर में और हकीकत में भी भारतीय सेना हमेशा अराजनीतिक रही है और अमन पसंद रही है। कभी भी भारतीय सेना को युद्ध शुरू करने वाला नहीं माना जाता है। भारत ने भले पाकिस्तान से चार या पांच लड़ाइयां लड़ी हों पर हमेशा शुरुआत पाकिस्तान ने की है और भारत ने जवाबी कार्रवाई की है। अब भारत के सेना प्रमुख अपनी तरफ से युद्ध शुरू करने की बात कर रहे हैं!

क्या उन्होंने बोलने से पहले सोचा कि इस युद्ध की क्या कीमत भारत को चुकानी पड़ सकती है? और वह कीमत कौन चुकाएगा? पाकिस्तान से हमारी आखिरी लड़ाई अपनी करगिल की चोटी को मुक्त कराने के लिए हुई थी। यह हमारी चोटी थी, जिस पर पाकिस्तानी सैनिकों ने कब्जा कर लिया था। उसे मुक्त कराने की लड़ाई 83 दिन तक चली थी और आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 527 भारतीय जवान इस युद्ध में शहीद हुए थे और 1363 जवान घायल हुए थे। यह सब जानने के बावजूद सेना प्रमुख पाकिस्तान के साथ एक पूर्ण युद्ध की बात कह रहे हैं और वह भी बिना किसी संदर्भ के। यह सवाल भी है कि इस बयान से कहीं वे आगे का कोई राजनीतिक एजेंडा साधने का मोहरा तो नहीं बन रहे हैं?

ऐसे ही बिना किसी संदर्भ के पिछले सेना प्रमुख, जनरल बिपिन रावत, जिनको अब चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ बना दिया गया है, ने कुछ दिन पहले देश भर में चल रहे छात्रों के प्रदर्शन और नागरिकता कानून विरोधी आंदोलनों पर टिप्पणी की थी और इनका नेतृत्व करने वालों पर सवाल उठाए थे। जब इसका विरोध हुआ तो उन्होंने सफाई के अंदाज में कहा कि भारतीय सेना अराजनीतिक है और सरकार के कहे मुताबिक काम करती है। इसी से मिलती जुलती बात मौजूदा सेना प्रमुख जनरल नरवणे ने भी कही है। उन्होंने कहा कि संविधान सेना के लिए सबसे ऊपर है। अब यह भी कहने का भी कोई मतलब नहीं है क्योंकि संविधान सबके लिए सर्वोच्च है। यह एक राजनीतिक स्टेटमेंट है, जो युद्ध भड़काने की बात कहने के बाद राजनीतिक रूप से सही दिखने के लिए दिया गया है। जनरल रावत और जनरल नरवणे दोनों के बयान किसी न किसी राजनीतिक मकसद से भरे हुए दिख रहे हैं, जो अंततः भारतीय सेना की परंपरा और उसके अराजनीतिक स्वरूप के लिए ठीक नहीं है।

असल में पिछला एक दशक भारतीय सेना के स्वरूप के लिए बहुत चिंताजनक रहा है। देश के पहले सिख सेना प्रमुख से लेकर रिटायर सेना प्रमुख के केंद्र सरकार में मंत्री बनने तक कई ऐसी घटनाएं हुई हैं, जिनके पीछे सैन्य संस्थानों की राजनीति खुल कर सामने आई। थल सेना के साथ साथ दूसरी सेनाएं भी इसका शिकार हुईं। तभी वायु सेना के एक अधिकारी ने राजनीतिक लाइन पर यह बयान दिया कि अगर वायु सेना के पास राफेल विमान होते तो विंग कमांडर वर्धमान अभिनंदन को लड़ने के लिए सीमा पार नहीं जाना होता। राफेल विमान की जरूरत बताने के लिए वर्धमान का प्रतीक चुनना अपने आप में एक राजनीतिक मकसद दिखाता है। सरकार के रक्षा मंत्री या सत्तारूढ पार्टी का कोई नेता इस किस्म के बयान दे तो बात समझ में आती है पर किसी सैन्य अधिकारी के सार्वजनिक रूप से ऐसा कहने का कोई मतलब नहीं बनता है। सेना की जरूरतों की चर्चा सेना के फोरम पर होनी चाहिए। पर ऐसा लग रहा है कि सेना के अधिकारी भी सारी बातें नेताओं की तरह सार्वजनिक रूप से करने लगे हैं।

5 thoughts on “भारत के बातूनी सैन्य अधिकारी!

  1. The year 1965. India-Pak war. Indian defense forces gave a very befitting reply to the erring misadventure of Pak. Our then Prime Minister Lal Bahadur Shastri went to Moscow on invitation of USSR’S President for talks with Pakistan president and returned most of the Pakistanis areas captured by our forces. There was a very big debate among young blood which culminated into “What soldiers win on ground, leaders return on table “. What is at issue is that none of our then three chiefs (heroes) – Gen Chaudhry, Vice Admiral (then our CNS was only Vice Admiral but I think he was VA Chatterjee) and Air Chief Marshal (latter Marshal of the AF) Arjan Singh didn’t mince a word either political or otherwise. God knows where these present day military leaders want to take our otherwise apolitical armed forces.

    1. I completely Agree with the above statements when it comes to Army chief He thinks he has the power of fighters and king itself but he didn’t forgot one thing peacefully environment for the indian Army must be the first priority of the chief.

    2. Jab dushman ko bol ne se hi pasine chhut jaate hai to bolne me kya jata hai
      Sena ka modernization ho raha hai samaj nahi aata kya

  2. Sena ka nya motto h- Agar Yudh ki conditions ho to phla war apni taraf se hona chahiye, Indian Miltery will be attacking as well as defencive understood anyone…

  3. Aapko article likh ne adhikaar hai to armed forces ke chief ko bolne ka adhikaar hai
    Bo Afspa ke under rahete hue bol rahe hai
    Media ko saval puchh ne me maja aata hai par sahi javab sunne me taklif hota hai
    Aap log hi unhe bol ne ko bulate ho baaki unhe koi sokh nahi bol ne ka

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