कश्मीर पर विदेशी प्रमाणपत्र की चिंता

भारत सरकार ने पांच अगस्त को जम्मू कश्मीर का दर्जा बदल दिया। उसे विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 के ज्यादातर प्रावधानों को हटा कर उसका विशेष दर्जा खत्म किया गया और साथ ही दो हिस्सों में बांट भी दिया गया। 31 अक्टूबर से जम्मू कश्मीर और लद्दाख दो अलग अलग केंद्र शासित प्रदेश हो जाएंगे। पांच अगस्त के उस फैसले के बाद से ही भारत सरकार इस चिंता में है कि कैसे विश्व समुदाय को भरोसा दिलाया जाए कि कश्मीर में सब ठीक है।

यहीं भरोसा दिलाने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने 22 सितंबर को अमेरिका के ह्यूस्टन में हाऊडी मोदी कार्यक्रम में दस भाषाओं में कहा कि देश में सब ठीक है। प्रधानमंत्री ने निजी तौर पर मुस्लिम देशों के बीच लॉबिंग की। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने चीन से लेकर कई यूरोपीय देशों की यात्रा की और संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक के दौरान दर्जनों दोपक्षीय बैठकें करके दुनिया के देशों का समर्थन जुटाया। इसी कड़ी में अब यूरोपीय संघ से जुड़े देशों के 27 सांसद कश्मीर के दौरे पर गए हैं। जिस समय यूरोपीय सांसद कश्मीर गए उसी समय प्रधानमंत्री मोदी एक बार फिर सऊदी अरब की यात्रा पर गए। इसी के बरक्स अगर घरेलू राजनीति को देखें तो अब भी देश के किसी नेता को कश्मीर जाने के लिए अदालत की मंजूरी लेनी पड़ रही है। कश्मीर घाटी के ज्यादातर नेता नजरबंदी में रखे गए हैं।

तभी सवाल है कि जम्मू कश्मीर के नेताओं को भरोसे में लेने और देश की तमाम विपक्षी पार्टियों को कश्मीर के हालात के बारे में संतुष्ट करने की बजाय सरकार क्यों विश्व बिरादरी को संतुष्ट करने में लगी है? यह भी सवाल है कि अगर देश की विपक्षी पार्टियां या कश्मीर के नेता व अवाम संतुष्ट नहीं होगी तो दुनिया के देशों का प्रमाणपत्र मिल जाने से क्या सब कुछ ठीक हो जाएगा? एक तरफ सरकार कह रही है कि कश्मीर उसका आंतरिक मामला है और दूसरी ओर खुद ही इसका वैश्वीकरण कर रही है।

सबसे पहले तो यह देखने की जरूरत है कि यूरोपीय संघ के जो सांसद कश्मीर के दौरे पर गए हैं वे कौन हैं और किस हैसियत से कश्मीर की यात्रा कर रहे हैं। सबसे पहली हकीकत तो यह है कि ये सांसद यूरोपीय संघ के प्रतिनिधिमंडल के तौर पर कश्मीर नहीं गए हैं। ये सांसद निजी हैसियत से कश्मीर गए हैं। यह भी कहा जा रहा है कि इनकी यात्रा एक गैर सरकारी संगठन की ओर से आयोजित की गई है। यानी इसे आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल नहीं कहा जा सकता है। यह सांसदों की निजी यात्रा है। इसलिए उनकी निजी राय से यूरोप में या विश्व बिरादरी में कश्मीर के बारे में लोगों की राय बदलेगी, इसमें संदेह है।

दूसरी हकीकत यह है कि इन 27 यूरोपीय सांसदों में से 22 धुर दक्षिणपंथी पार्टियों के प्रतिनिधि हैं। फ्रांस की कट्टरपंथी नेता ला पेन की नेशनल रैली पार्टी के भी सांसद इसमें शामिल हैं। अगर फ्रांस या यूरोपीय संघ का आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल होता तो उसमें हर विचारधारा की पार्टी के नेता शामिल होते। पर इन 27 सांसदों में ज्यादातर दक्षिणपंथी या धुर दक्षिणपंथी पार्टियों के ही नेता शामिल हैं। चूंकि यह आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल नहीं है इसलिए इसकी सामूहिक या आधिकारिक रिपोर्ट नहीं होगी और चूंकि सारे नेता एक ही विचारधारा के हैं इसलिए उनकी निजी राय का भी कोई खास मतलब नहीं होगा।

अभी कुछ दिन पहले ही अमेरिका के छह सांसदों ने भारतीय राजदूत को पत्र लिखा था कि उनको जम्मू कश्मीर जाने की इजाजत दी जाए। उन्होंने यह भी कहा था कि अंतरराष्ट्रीय पत्रकारों को भी कश्मीर जाने की इजाजत दी जानी चाहिए। अमेरिकी सांसद भी निजी हैसियत से कश्मीर जाना चाहते हैं पर सरकार उनको अनुमति नहीं दे रही है।

तभी सवाल है कि यूरोप के चुनिंदा सांसदों को कश्मीर घाटी में भेजने से क्या मकसद पूरा होगा? अगर वहां सचमुच हालात सामान्य हैं तो फिर सरकार को चाहिए कि सबके लिए दरवाजे खोले और अगर सचमुच हालात ठीक नहीं हैं तो यह सीना ठोक कर कहे कि राज्य में हालात ठीक नहीं हैं इसलिए किसी को वहां जाने की इजाजत नहीं दी जा सकती है। हो सकता है कि यूरोपीय सांसद अपने दौरे में कुछ अच्छी बातें कहें और भारत में प्रायोजित मीडिया द्वारा इसका प्रचार भी किया जाए पर उससे घरेलू या अंतरराष्ट्रीय मंच पर कुछ भी बदलने वाला नहीं है।

विदेश मंत्रालय की ओर से यूरोपीय सांसदों की प्रायोजित कश्मीर यात्रा पर भाजपा के ही सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी ने सवाल उठाए हैं। उन्होंने इसे भारतीय विदेश नीति का भटकाव बताया है। उन्होंने सरकार से तत्काल यह यात्रा रद्द करने की भी अपील की थी। इससे इस फैसले की खामियां अपने आप जाहिर होती हैं। सबसे पहले पहले तो भारत को इस लाइन पर टिके रहने की जरूरत थी कि कश्मीर हमारा आंतरिक मामला है और दुनिया के देशों का इससे कोई लेना देना नहीं है।

ध्यान रहे भारत कोई उत्तर कोरिया नहीं है, जो विदेशी पत्रकार या नेता वहां जाएंगे और सर्टिफिकेट देंगे। वह भी ऐसा सर्टिफिकेट, जिसकी दुनिया में कोई कद्र नहीं होगी। उस पर सरकार ने इतना जोर दिया है। प्रधानमंत्री और उप राष्ट्रपति इन यूरोपीय सांसदों से मिले और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने 40 मिनट तक उनको ब्रीफ दी। अब सवाल है कि इसके बाद सरकार कैसे कह पाएगी कि कश्मीर आंतरिक व घरेलू मामला है और इसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर नहीं उठाया जाना चाहिए या दुनिया के देशों को इससे मतलब नहीं होना चाहिए?

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