मुनाफे वाली कंपनियों को बेचने की मजबूरी!

अजित कुमार

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए पैसे की सख्त जरूरत है। सरकार यह बात कह नहीं रही है। यहां तक कि सरकार के मंत्री घूम घूम कर यह बता रहे हैं कि कोई आर्थिक मंदी जैसी स्थिति नहीं है। यह भी कहा जा रहा है कि देश की आर्थिकी का बुनियादी ढांचा पूरी तरह से सही है और अर्थव्यवस्था की स्थिति बताने वाले आंकड़ों में जो गिरावट दिख रही है वह चक्रीय है, जो एक-दो तिमाही के बाद ठीक हो जाएगी। जबकि हकीकत यह है कि ठीक होने की बजाए स्थितियां बिगड़ती जा रही हैं।

चालू वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही यानी अक्टूबर से दिसंबर के बीच आर्थिक विकास की दर में और गिरावट का अंदेशा है। हो सकता है कि यह चार फीसदी पर ही रहे तभी देश के सबसे बड़े बैंक भारतीय स्टेट बैंक का आकलन है कि चालू वित्त वर्ष में विकास दर पांच फीसदी रहेगी। महीना दर महीना सरकार का कर राजस्व संग्रहण कम होता जा रहा है। सरकार को अनुमान था कि उसे इस वित्त वर्ष में 24 लाख करोड़ रुपए से कुछ ज्यादा का कर राजस्व मिलेगा। पर इसमें दो लाख करोड़ रुपए की कमी का अंदाजा है। यानी भारत की जीडीपी के एक फीसदी के बराबर कमी कर राजस्व में संभव है।

दूसरी ओर सरकार के खर्च कम नहीं हो रहे हैं तभी राजकोषीय घाटे के 3.3 फीसदी की सीमा पार करके 3.8 फीसदी पहुंचने का अनुमान है। यानी सरकार की कमाई घट रही है, खर्च बढ़ रहा है और वित्तीय अनुशासन बिगड़ रहे है। सो, इसे कैसे ठीक किया जाए? इसके लिए सरकार के पास इसके सिवा कोई आइडिया या रास्ता नहीं है कि सरकारी संपत्तियों को बेच दिया जाए। सरल शब्दों में कहें तो सरकार को घर चलाने के लिए बरतन-भांडे बेचने पड़ रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिका में हाउडी मोदी कार्यक्रम में दस भाषाओं में कहा था कि भारत में सब ठीक है। पर असल में देश की हर भाषा में लोग कह रहे हैं कि हालत खराब है।

असल में केंद्र सरकार का अनुमान था कि उसे चालू वित्त वर्ष में 24.6 लाख करोड़ रुपए का कर राजस्व मिलेगा। यह अनुमान वस्तु व सेवा कर, जीएसटी लागू होने के बाद करीब डेढ़ साल के अनुभव पर आधारित था। पर ऐसा लग रहा है कि सरकार का अनुमान फेल हो गया है। नोटबंदी और जीएसटी दोनों के असर से बाजार पूरी तरह के दबा हुआ है। तभी सरकार को अनुमान से दो लाख करोड़ रुपए कम कर राजस्व मिलने का अंदेशा है।

इस बीच आर्थिक मंदी से उबरने के लिए किए जा रहे उपायों के तहत केंद्र सरकार ने कारपोरेट जगत को एक लाख 45 हजार करोड़ रुपए की कर राहत दी है। इससे भी सरकार के ऊपर बोझ बढ़ा है। इस बड़ी कर राहत की वजह से अंदाजा है कि राजकोषीय घाटा 3.3 फीसदी की तय सीमा पार करके 3.8 फीसदी तक जा सकता है। इन सब कारणों का मिला जुला असर यह हुआ है कि सरकार आनन-फानन में अपनी मुनाफा कमाने वाली कंपनियों को भी बेच रही है।

सरकार नवरत्न और महारत्न कंपनियों में भी अपनी हिस्सेदारी खत्म करने या कम करने जा रही है। वैसे भी सरकार ने इस साल के लिए विनिवेश का बड़ा लक्ष्य तय किया था। और चूंकि घाटे में चल रही कंपनियों के खरीदार नहीं मिल रहे थे इसलिए सरकार ने मुनाफे वाली कंपनियों को ही बेच कर पैसे जुटाने का फैसला किया।

केंद्र सरकार हर साल सात से आठ हजार करोड़ रुपए मुनाफा कमाने वाली पेट्रोलियम क्षेत्र की दूसरी सबसे बड़ी कंपनी भारत पेट्रोलियम को बेचने जा रही है। इस कंपनी का बाजार मूल्य एक लाख 18 हजार करोड़ रुपए का है, जिसमें भारत सरकार की हिस्सेदारी 53.29 फीसदी है। सरकार यह पूरी हिस्सेदारी करीब 63 हजार करोड़ रुपए में बेचेगी। सरकार मुनाफा कमाने वाली दूसरी कंपनी शिपिंग कारपोरेशन में भी अपनी हिस्सेदारी बेच रही है। इसमें सरकार की हिस्सेदारी 63.75 फीसदी है, जिसे पूरा बेच दिया जाएगा। इससे दो हजार करोड़ रुपए सरकार को मिलेंगे।

कंटेनर कारपोरेशन में भी सरकार अपनी आधी से ज्यादा हिस्सेदारी बेचेगी। कंटेनर कारपोरेशन में 30 फीसदी से ज्यादा शेयर बेच कर सरकार करीब 11 हजार करोड़ रुपए जुटाएगी। केंद्र की मोदी सरकार इस बार भी पहले की तरह विनिवेश का लक्ष्य पूरा करने के लिए सरकारी कंपनी से ही दूसरी सरकारी कंपनी की खरीद करवा रही है। बताया जा रहा है कि नकदी के मामले में धनी कंपनी एनटीपीसी के हाथों टीएचडीसी इंडिया और एनईईपीसीओ को बेचा जाएगा। इन दोनों कंपनियों में अपनी सारी हिस्सेदारी सरकार बेच देगी। सोचें, कैसे विनिवेश का एक लाख पांच हजार करोड़ का लक्ष्य पूरा करने के लिए सरकार सोने का अंडा देने वाली मुर्गी को मार रही है। केंद्रीय कैबिनेट की आर्थिक मामलों की समिति ने एक बड़ा फैसला यह भी किया है कि सरकार देश की सबसे बड़ी पेट्रोलियम कंपनी इंडियन ऑयल में भी अपनी कुछ हिस्सेदारी बेचेगी। इसमें सरकार का 51.5 फीसदी के साथ पूरे नियंत्रण वाली हिस्सेदारी है। पर बताया जा रहा है कि इसमें से 26.4 फीसदी हिस्सेदारी बेच कर सरकार 33 हजार करोड़ रुपए की कमाई करने वाली है। इस तरह सरकार का प्रत्यक्ष नियंत्रण इसके ऊपर से खत्म हो जाएगा।

हालांकि एलआईसी और ओएनजीसी के पास इसमें 25 फीसदी से ज्यादा शेयर हैं, जिससे सरकारी नियंत्रण रहेगा पर प्रत्यक्ष नियंत्रण नहीं रहने से इसका कामकाज भी सीएजी की जांच के दायरे से बाहर हो जाएगा। एक तरफ तो सरकार दावा कर रही है कि सब कुछ ठीक है और दूसरी ओर ऐसे कदम उठा रही है, जो सबसे खराब स्थिति में ही उठाए जाते हैं, जैसे घर के बरतन-भांडे बेचने का कदम।

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