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लोकतांत्रिक सुधारों की जरूरत

अजीत कुमार

महाराष्ट्र के घटनाक्रम ने भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था की कमजोरियों को एक बार फिर उजागर किया है। ये कमजोरियां बार बार उजागर होती हैं। कभी महाराष्ट्र में, कभी कर्नाटक में तो कभी गोवा और मणिपुर में। ऐसा नहीं है कि यह पिछले पांच या दस साल की परिघटना है। देश में चुनी हुई सरकार को बरखास्त करने की पहली घटना के बाद से लेकर पिछले 60 साल में अनेक बार ये कमियां उजागर हुई हैं। पर अफसोस की बात है कि कभी भी इसके बारे में गंभीरता से नहीं सोचा गया।

देश में आर्थिक सुधारों की बात होती थी तो वे सुधार हो गए। अब दूसरी पीढ़ी के आर्थिक सुधारों की बात हो रही है। कहीं श्रम सुधारों की चर्चा है, कहीं बैंकिंग सुधारों की जरूरत बताई जा रही है, कहीं पुलिस सुधार की चर्चा है तो कहीं कानूनी सुधार हो रहे हैं। बिहार के मुख्यमंत्री समाज सुधार में लगे हैं। उनकी देखादेखी आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री भी समाज सुधारक की भूमिका में आ रहे हैं। पर हकीकत यह है कि आज सबसे ज्यादा जरूरत राजनीतिक और लोकतांत्रिक सुधारों की है।

आज चुनाव में बेतहाशा पैसा खर्च हो रहा है। संसद और राज्यों की विधानसभाओं में करोड़पति कानून निर्माताओं की संख्या बढ़ रही है। दागी-अपराधी नेताओं को चुनाव लड़ने से रोकने की कोई ठोस पहल नहीं हो रही है। इसका नतीजा है कि राजनीति में धनबल और बाहुबल दोनों असरकारक बने हुए हैं। चुनाव के बाद किस तरह का घटनाक्रम हो रहा है इसकी मिसाल हाल में महाराष्ट्र में देखने को मिली है और चार महीने पहले कर्नाटक में देखने को मिली थी। दलबदल या गठबंधन बदल का खेल पूरी बेशर्मी से खेला जा रहा है। चुने गए विधायकों की खरीद-फरोख्त इतनी खुलेआम हो रही है नेता खुल कर घोड़ा, अस्तबल, बाजार जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं। राज्यपाल से लेकर राष्ट्रपति तक की भूमिका सवालों के घेरे में आ रही है। अगर जल्दी ही इन सबको ठीक नहीं किया गया तो लोकतंत्र जनता का, जनता द्वारा, जनता के लिए शासन नहीं रह जाएगा।

महाराष्ट्र में सरकार बनाने के लिए जिस तरह के बेशर्म प्रयास हुए उसने पूरी लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए। एक तरफ दिल्ली में राज्यपालों का सम्मेलन हो रहा था, जिसमें राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री दोनों यह ज्ञान दे रहे थे कि राज्यपालों को संविधान की मूल भावना की रक्षा करनी चाहिए। उसी समय दूसरी तरह महाराष्ट्र के राज्यपाल सारी भावनाओं को ताक पर रख कर महाराष्ट्र में भाजपा की सरकार बनवा रहे थे। सवाल है कि महाराष्ट्र के राज्यपाल ने क्यों रातों रात राज्य से राष्ट्रपति शासन हटाने का प्रस्ताव भेजा? क्यों प्रधानमंत्री ने बिना कैबिनेट की बैठक किए, अपने विशेष अधिकार का इस्तेमाल कर उस प्रस्ताव को स्वीकार किया और उसे मंजूर करने की अनुशंसा राष्ट्रपति को भेजी? राष्ट्रपति ने क्यों बिना कोई सवाल पूछे मंजूर किया? और क्यों व कैसे राज्यपाल ने देवेंद्र फड़नवीस व अजित पवार को शपथ दिलाई?

इन सवालों से लोकतांत्रिक सुधारों की जरूरत का पता चलता है। क्या इसके लिए एक निश्चित नियम नहीं होना चाहिए? पांच दिन पहले जिस पार्टी ने राज्यपाल से मिल कर साफ शब्दों में इनकार किया हो उसके पास बहुमत नहीं है और वह सरकार नहीं बनाएगी। उसी पार्टी को बिना बहुमत का ठोस प्रमाण दिए सरकार बनाने के लिए बुलाने और शपथ दिलाने के पीछे राज्यपाल की क्या मंशा या मजबूरी रही होगी?

हर राज्यपाल को पता है कि जब भी इस तरह का मामला आता है तो सर्वोच्च अदालत का एक ही फैसला होता है। बोम्मई केस से लेकर महाराष्ट्र तक के मामले में अदालत ने यहीं कहा है कि बहुमत का परीक्षण सदन में होना चाहिए। इसके बावजूद राज्यपाल हर बार खरीद फरोख्त को बढ़ावा देने के लिए मनचाहे मुख्यमंत्री को शपथ दिलाने के बाद दो-दो हफ्ते का समय देते रहे हैं बहुमत साबित करने के लिए। मई 2018 में कर्नाटक में येदियुरप्पा को शपथ दिलाने के बाद राज्यपाल वजू भाईवाला ने यहीं किया था और 23 नवंबर की सुबह देवेंद्र फड़नवीस को शपथ दिलाने के बाद राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने यहीं काम किया।

दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र मामले में वहीं आदेश दिया, जो कर्नाटक मामले में दिया था। बहुमत साबित करने का समय घटा कर 24 घंटे कर दिया। सवाल है कि क्या महाराष्ट्र के राज्यपाल को कर्नाटक मामले में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पता नहीं था? उन्होंने सब जानते बूझते भाजपा को मौका दिया और इतना समय दिया कि वह बहुमत जुटाने के लिए कुछ भी करे।

जाहिर है कि चाहे विधायिका के जरिए कानून बना कर हो या सुप्रीम कोर्ट के व्यापक निर्देशों से हो पर सरकार गठन के बारे में कुछ निश्चित नियम बनने चाहिए। चुनाव पूर्व और चुनाव बाद होने वाले गठबंधनों के बारे में भी स्पष्ट नियमों की जरूरत है। कोई किसी के साथ चुनाव लड़े और किसी के साथ मिल कर सरकार बना ले तो इससे लोकतंत्र का मजाक बनता है।

भाजपा के साथ लड़ी शिव सेना का कांग्रेस के साथ जाना और कांग्रेस के साथ लड़ी जनता दल यू का भाजपा के साथ जाना कोई अच्छी लोकतांत्रिक परंपरा नहीं है। इस तरह की घटनाएं अंततः आम लोगों के मोहभंग का कारण बनती हैं। राजनीतिक व लोकतांत्रिक दोनों सुधारों की जरूरत है और संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के अधिकारों की ठोस व्याख्या भी जरूरी है।

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