पुलिस सुधारों की जरूरत किसी को नहीं

उत्तर प्रदेश के गैंगेस्टर विकास दुबे की घटना की बाद एक बार फिर देश में पुलिस सुधारों की चर्चा शुरू हुई है। पिछले कई दशकों से इस बारे में सिर्फ चर्चा हो रही है, सुधार नहीं हो रहे हैं। उत्तर प्रदेश के ही पुलिस प्रमुख रहे आईपीएस अधिकारी प्रकाश सिंह ने 24 साल पहले 1996 में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी, जिसमें उन्होंने पुलिस सुधारों के लिए सरकारों को निर्देश देने की अपील की थी। इसके एक दशक बाद 2006 में जस्टिस वाईके सबरवाल की बेंच ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए कई अहम निर्देश दिए थे पर किसी भी राज्य ने ईमानदारी से उन निर्देशों को लागू करने की जरूरत नहीं समझी है।

बड़ी मुश्किल से यह नियम लागू हो पाया है कि पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों की तैनाती नीयत समय के लिए की जाए। हालांकि इसमें भी सरकारें मनमानी करती रहती हैं। कानून व्यवस्था और अभियोजन के लिए अलग अलग काम करने वाले पुलिस बल के गठन की भी बात कही गई थी, जो अभी शायद ही कही लागू है। हर राज्य में एक सुरक्षा परिषद बनाने का निर्देश सुप्रीम कोर्ट ने दिया था पर उसे किसी राज्य ने लागू नहीं किया। सुरक्षा परिषद बनाने का निर्देश इसलिए दिया गया था ताकि पुलिस को राजनीतिक नेतृत्व के हस्तक्षेप से अलग किया जा सके। इसके अलावा भी पुलिस में ज्यादा भरती करने, उनको बेहतर प्रशिक्षण मुहैया कराने, उनके कामकाज की स्थितियों में सुधार करने, उनके लिए बेहतर हथियार और दूसरे तकनीकी उपकरण मुहैया कराने जैसे कई सुझाव समय समय पर अलग अलग कमेटियां देती रही हैं पर इनमें से किसी को लागू नहीं किया गया है।

तभी हालात ऐसे हैं कि पुलिस का खुफिया तंत्र पूरी तरह से लचर है। उसके पास सर्विलांस के बेहतर उपकरण नहीं है, पुलिस से बेहतर हथियार अपराधियों के पास होते हैं, पुलिसकर्मियों की संख्या कम होने से एक-एक जवान या पुलिस अधिकारी को तय समय से बहुत ज्यादा काम करना होता है, कानून-व्यवस्था और अभियोजन के लिए अलग-अलग पुलिस बल की व्यवस्था नहीं होने से न कानून-व्यवस्था ठीक हो पा रही है और न अभियोजन का काम ठीक से हो रहा है। पुलिसकर्मियों की कमी से अभियोजन के काम में देरी होती है, जिससे बरसों तक मामले अदालतों में लंबित रहते हैं। पुलिस सुधारों को नहीं लागू करने का एक गंभीर नुकसान यह हुआ है कि पुलिस फोर्स पूरी तरह से राज्यों की सरकारों के अधीन काम करती है और राज्य के राजनीतिक नेतृत्व की कृपा पर उनकी तैनाती और पदोन्नति आदि होती है। इससे पुलिसकर्मी दबाव में रहते हैं और सरकारों को एक हथियार के तौर पर उनका इस्तेमाल करने में आसानी हो जाती है।

अगर विकास दुबे से जुड़े पूरे प्रकरण को ध्यान से देखें तो पुलिस बल की दर्जनों खामियां दिखाई देंगी और ऐसा नहीं है कि ये खामियां सिर्फ उत्तर प्रदेश की पुलिस फोर्स में हैं, यहीं कहानी लगभग पूरे देश की है। गैंगेस्टर विकास दुबे के मामले में यह पता चल रहा है कि कई पुलिसवाले उसके संपर्क में थे और उन्हीं में से एक ने उसे इस बात की जानकारी दी कि आधी रात के बाद पुलिस फोर्स उसके घर पर छापा मारने और उसे पकड़ने आ रही है। राज्य सरकार ने एक एसआईटी बनाई है, जो इस पहलू से मामले की छानबीन करेगी। पर शुरुआती खबरों से ही जाहिर है कि बरसों से स्थानीय थाने के अधिकारी और जिले के पुलिस अधिकारियों का उसके साथ दोस्ताना रिश्ता था। यह रिश्ता राजनीतिक पहुंच के दम पर बना, जातीय समीकरण के आधार पर बना या रुपए-पैसे की लालच में बना यह अलग जांच का विषय है। पर पुलिस-अपराधी गठजोड़ की हकीकत इस मामले में जाहिर हुई है।

इसके बाद पुलिस की इंटेलीजेंस की विफलता भी पूरी तरह से जाहिर हुई। पुलिस के छापे की खबर लीक हो गई पर पुलिस को पता नहीं चला कि गैंगेस्टर को उसके छापे की जानकारी हो गई है। पुलिस को यह भी पता नहीं चला कि कानपुर से सटे बिकरू गांव में जिस गैंगेस्टर के यहां वे जा रहे हैं उसके पास कितने हथियार और कितने लोग हैं, जिनसे लोहा लेना पड़ सकता है। गांव में पहुंचने के बाद भी जब लाइट कटी हुई मिली और जेसीबी लगा कर सड़क जाम किया हुआ दिखा तब भी पुलिस हालात को भांप नहीं सकी, जिसका नतीजा यह हुआ कि अपराधियों की फायरिंग में आठ पुलिसवाले मारे गए। यह पुलिस की ट्रेनिंग की कमी थी, जो उन्होंने इस किस्म के अभियान में मानक संचालन प्रक्रिया, एसओपी का पालन नहीं किया।

उसके बाद भी पुलिस लगातार फेल होती रही। पुलिस की विफलता कई स्तर पर है। जैसे उसे आठ दिन तक पता नहीं चला कि विकास कहां फरार हो गया। उसने बदले की कार्रवाई करते हुए विकास के रिश्तेदारों को मारा, उसका घर गिरा दिया, उसकी पत्नी और नाबालिग बेटे को गिरफ्तार किया और बाद में जब विकास पकड़ा गया या उसने सरेंडर किया तो बिना किसी कानूनी कार्रवाई के एक कथित मुठभेड़ में उसे मार दिया गया। इस पूरे मामले में पहले तो पुलिस बुरी तरह से विफल रही और उसके बाद उसने विकास दुबे गैंग के मुकाबले एक राइवल गैंग की तरह कार्रवाई की और न्याय की बजाय बदला लिया। ऐसा नहीं है कि पुलिस ने सब कुछ अपने मन से किया। संभव है कि अपने राजनीतिक आकाओं के किसी एजेंडे को पूरा करने के लिए ऐसा किया गया हो क्योंकि ज्यादातर राजनेता पुलिस का इस्तेमाल हथियार के तौर पर करते हैं।

यह स्थिति तभी बदलेगी, जब व्यापक पुलिस सुधार होंगे। पुलिस की बहाली का तरीका बदलेगा, नए पढ़े-लिखे और तकनीकी जानकारों की नियुक्ति होगी, पुलिस का बेहतर प्रशिक्षण होगा और उसे संवेदनशील बनाने के प्रयास होंगे, उसे आधुनिक तकनीक और हथियारों से लैस किया जाएगा और सबसे जरूरी यह कि उसे राजनीतिक दखल से मुक्त किया जाएगा तभी एक सभ्य समाज में पुलिस अपनी वास्तविक भूमिका निभा पाएगी। ऐसा इसलिए भी जरूरी है क्योंकि आम लोगों की नजर में पुलिस नाम की संस्था की साख कम होते होते खत्म होने की कगार पर पहुंच गई है।

 

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