अब आसान नहीं आगे की राह

दरअसल प्रदेश में पिछले 15 वर्षों में भाजपा की सरकार के दौरान विपक्ष के रूप में कांग्रेस एक तरह से हथियार डाले हुए नजर आई। केवल 2018 के आखिर के 6 महीनों को छोड़ दें। इसके पहले कांग्रेस में विपक्षी दल जैसी ना आक्रामकता थी और ना ही नेताओं के बीच एकजुटता थी। इसी का परिणाम था कि कांग्रेस को सत्ता में वापसी करने के लिए 15 वर्ष लग गए जबकि 15 वर्षों के बाद सत्ता से बाहर हुई भाजपा शुरू से ही कांग्रेस के प्रति आक्रामक हो गई।  यहां तक कि सरकार को अस्थिर और कभी भी गिर जाने वाली सरकार बताते रहेे लेकिन कांग्रेसी जिस तरह से भाजपा को झटके पर झटके दिए हैं उससे भाजपा का भ्रम टूट गया है।

अब दोनों ही दलों में आगे के लिए मंथन का दौर चल रहा है। हो सकता है प्रदेश में असली राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी का दौर देखने को मिले। कांग्रेस सत्ता में है भले ही विपक्ष की भूमिका ढंग से ना निभा पाई हो लेकिन सत्ता के खेल में कांग्रेस को महारत हासिल है। यही हाल भाजपा का है। भाजपा के बारे में शुरू से ही कहा जाता है कि विपक्षी दल के रूप में भाजपा का कोई मुकाबला नहीं है। बहरहाल प्रदेश के दोनों ही प्रमुख दलों कांग्रेस और भाजपा की प्रदेश इकाइयों पर राष्ट्रीय नेतृत्व ने ध्यान देना शुरू कर दिया है।

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अपने-अपने कारण हैं। जहां तक विपक्षी दल भाजपा का सवाल है तो यहां के तमाम भाजपा नेता राष्ट्रीय नेतृत्व को अब तक यह समझाते रहे कि टिकट वितरण या कुछ छोटी-मोटी गलतियों के कारण भले ही हम सत्ता से बाहर हो गए हों लेकिन जनता हमारे साथ है और विधायकों का समर्थन भी हमें हासिल हो जाएगा। पार्टी का राष्ट्रीय नेतृत्व जब भी इशारा कर देगा तब प्रदेश में सरकार गिरा देंगे। इसके लिए लोकसभा चुनाव के परिणाम का भी हवाला देते थे जिसमें से 29 में से 28 सीटें भाजपा ने जीती थी लेकिन भाजपा का राष्ट्रीय नेतृत्व भली भांति जानता था कि यदि राष्ट्रीय मुद्दे हावी नहीं होते तो फिर मध्यप्रदेश में इतनी सीटें भाजपा नहीं जीत पाती।

अब जबकि मध्यप्रदेश में झाबुआ विधानसभा भाजपा खो चुकी है। पवई विधानसभा पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। सदन और सड़क पर भाजपा के विधायक जब चाहे इशारों-इशारों में पार्टी के खिलाफ और मुख्यमंत्री कमलनाथ की तारीफ करने लगते हैं। ऐसे में राष्ट्रीय नेतृत्व का ध्यान मध्यप्रदेश की ओर गया है कि आखिर भाजपा का गढ़ बनने जा रहा यह हृदय प्रदेश इतना खोखला कैसे होते जा रहा है।

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महाराष्ट्र में सरकार बनाने के बाद राष्ट्रीय नेतृत्व क पूरा फोकस उन राज्यों पर है जो कभी भाजपा के लिए मजबूत थे और अब कमजोर होने जा रहे हैं। ऐसे में मध्यप्रदेश में भाजपा नेताओं की अब आगे की राह आसान नहीं है। राष्ट्रीय नेतृत्व के निर्देशन में अब पार्टी की गतिविधियां संचालित होंगी और जब पार्टी राष्ट्रीय नेतृत्व के निर्देश पर चलेगी तब यहां सत्ताधारी दल कांग्रेस की भी मुश्किलें बढ़ेंगी। भाजपा नेताओं को भी एकजुटता के साथ संघर्ष करना पड़ेगा और शीर्ष नेताओं को असलियत में प्रतिद्वंद्विता प्रदर्शित करनी पड़ेगी।

कांग्रेस का राष्ट्रीय नेतृत्व भी और राज्यों को लेकर सतर्क है। जहां लंबे अंतराल के बाद पार्टी सरकार में आई है वहां कोई ऐसी पार्टी गलती नहीं दोहराना चाहती जिसके कारण वह सत्ता से ऐसी बेदखल हो और वापसी के लिए उसे लंबा इंतजार करना पड़े। इसके लिए सत्ता और संगठन में समन्वय बनाने पर विशेष जोर दे रहे हैं।

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यही कारण है कि प्रदेश में पार्टी के प्रदेश प्रभारी दीपक बावरिया लगातार हर विवादास्पद मुद्दे पर पार्टी कार्यकर्ताओं का फीडबैक लेते हैं जिससे पार्टी नेताओं के बीच भी असंतोष न पनपे साथ ही मंत्रियों पर भी नजर रखी जा रही है कि कौन मंत्री किस कार्य पद्धति से काम कर रहा है। कहीं उसके कारण पार्टी के प्रति एंटी इनकंबेंसी तो नहीं पनप रही।  पहली बार सरकार को सुझाव देने और अधिकांश मुद्दों पर फीडबैक देने के लिए पर्दे के पीछे टीम काम कर रही है। यही कारण है तमाम प्रकार की विपरीत परिस्थितियों के बाद भी धीरे-धीरे सरकार अपना संदेश बना रही है।

कुल मिलाकर किसानों के मुद्दे पर जिस तरह से प्रदेश के दोनों दल कांग्रेस और भाजपा आमने सामने आए हैं और दोनों ही दलों के राष्ट्रीय नेतृत्व ने प्रदेश पर ध्यान देना शुरू किया है उससे अब प्रदेश में दोनों ही दलों की राह आसान नहीं है। अगली परीक्षा पवई विधानसभा पर भी हो सकती है अन्यथा नगरीय निकाय और त्रिस्तरीय पंचायती राज के चुनाव में तो होना ही है। इसके पहले दिसंबर में प्रस्तावित विधानसभा सत्र के दौरान सदन के अंदर भी शक्ति परीक्षण हो सकता है।

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