अब बढ़ानी होगी इलाज की सुविधा

कोरोना वायरस के खिलाफ देश की लड़ाई अब बहुत गंभीर दौर में पहुंच गई है। अब पहले के मुकाबले इस बात की ज्यादा जरूरत है कि इलाज की सुविधा को बेहतर किया जाए। साथ ही टेस्टिंग की सुविधा बढ़ाई जाए और इस बात पर ध्यान दिया जाए कि गंभीर संक्रमण वाले मरीजों को कैसे बेहतर सुविधा दी जाए। इसका मतलब यह है कि क्रिटिकल केयर सिस्टम को यानी गंभीर मरीजों के इलाज की सुविधा पर अब सबसे ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। ऐसा इसलिए है क्योंकि अब संक्रमण की संख्या तेजी से बढ़ रही है। भले उसमें से ज्यादातर लोग ठीक हो जा रहे हैं पर अगर मौजूदा दर से संक्रमण बढ़ी और उसमें मौजूदा दर से ही गंभीर मरीजों की संख्या बढ़ी तब भी बहुत बड़ी फैसिलिटी की जरूरत होगी। क्रिटिकल केयर का मतलब है कि अस्पतालों में ऑक्सीजन की सुविधा, आईसीयू बेड्स की सुविधा और वेंटिलेटर की संख्या बढ़ानी होगी।

भारत में अब हर दिन औसतन 50 हजार नए केस आ रहे हैं और इसके मुकाबले से 30 से 35 हजार लोग ठीक हो रहे हैं। इसका मतलब है कि 15 से 20 हजार की वास्तविक संख्या हर दिन बढ़ रही है। इनमें से अगर ज्यादातर लोगों को होम केयर में या होम क्वरैंटाइन में रखा जाता है तब भी अस्पताल में भरती होने वाले मरीजों की संख्या बढ़ेगी। अभी तो स्थिति ठीक है क्योंकि पहले से भरती मरीज ठीक हो गए हैं और ज्यादातर बड़े शहरों में बने कोविड अस्पतालों में बेड़्स खाली हैं। लेकिन अगर संख्या इसी रफ्तार से बढ़ती रही तो अगले कुछ दिनों में संकट बढ़ेगा। दूसरी बात यह है कि अब दूरदराज के इलाकों में ऐसे राज्यों में केसेज बढ़ रहे हैं, जहां मेडिकल की सुविधा नहीं के बराबर है।

बिहार में अब हर दिन औसतन ढाई हजार केसेज आ रहे हैं। पश्चिम बंगाल में भी दो हजार से ज्यादा संक्रमित रोज मिल रहे हैं। ओड़िशा में संक्रमितों का रोजाना का औसत एक हजार से ऊपर है। गुजरात में पिछले आठ दिन से एक हजार से ज्यादा मरीज आ रहे हैं। ओड़िशा के साथ साथ बड़ी आदिवासी आबादी वाले राज्यों जैसे छत्तीसगढ़ और झारखंड में भी मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ी है। झारखंड में मरीजों के संख्या एक-दो दिन में दस हजार पहुंचने वाली है तो छत्तीसगढ़ में भी आठ हजार से ज्यादा मरीज हो गए हैं। झारखंड के 95 सौ मरीजों में से आधे से ज्यादा करीब 55 सौ एक्टिव केस हैं। पूर्वोत्तर के राज्यों में संक्रमितों की संख्या तेजी से बढ़ रही है, जहां मेडिकल की सुविधा अच्छी नहीं है। यहीं हाल उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात आदि राज्यों में भी है।

चिंता की एक और अहम बात यह है कि दिल्ली और मुंबई में जहां सिरो सर्वेक्षण कराया गया है वहां बड़ी संख्या में आबादी के संक्रमित होने की रिपोर्ट आई है। दिल्ली में 23 फीसदी से ज्यादा लोगों में एंटीबॉडी मिलने की रिपोर्ट है तो मुंबई की झोपड़ पट्टियों में रहने वालों में 57 फीसदी में एंटीबॉडी पाए गए हैं। एंटीबॉडी पाए जाने का मतलब है कि इतने लोगों को संक्रमण हुआ और वे अपने आप ठीक हुए। यह तो अच्छी बात है कि वे अपने आप ठीक हो गए लेकिन उन्होंने कितने लोगों को संक्रमित किया यह पता नहीं चल पा रहा है।

भारत सरकार भले न माने कि देश में सामुदायिक संक्रमण फैल गया है पर हकीकत यह है कि अब पूरे देश में सामुदायिक संक्रमण हो गया है। जितनी बड़ी सख्या में लोगों में एंटीबॉडी मिलने की खबर है उतने लोगों की कांटैक्ट ट्रेसिंग संभव ही नहीं है। इसलिए कांटैक्ट ट्रेसिंग की बजाय सरकारों को इलाज की सुविधा बेहतर करने पर ध्यान देना होगा ताकि गंभीर मरीजों की संख्या कम की जा सके और लोगों को मरने से बचाया जा सके।

इसके दो तरीके हैं। पहला तरीका टेस्टिंग बढ़ाने का है। भारत में रोजाना की टेस्टिंग पांच लाख पहुंच गई है और प्रधानमंत्री ने कहा है कि जल्दी ही इसे दस लाख किया जाएगा। टेस्टिंग ज्यादा करने से समय रहते संक्रमित का पता चलेगा। ऐसा नहीं होने पर लोग गंभीर हालत में अस्पताल पहुंच रहे हैं। इसे ठीक नहीं किया गया तो आने वाले दिनों में मरने वालों की संख्या बढ़ेगी। अभी मरने वालों की संख्या के लिहाज से भारत बेहतर स्थिति में है। भारत में प्रति दस लाख की आबादी पर अभी सिर्फ 25 लोगों की मौत हो रही है। अमेरिका में दस लाख की आबादी पर 460 लोगों की मौत हो रही है। भारत को अपना औसत बनाए रखने या इसमें सुधार के लिए ज्यादा और भरोसेमंद टेस्टिंग करनी होगी। ध्यान रहे एंटीजन टेस्ट में 40 फीसदी तक नतीजे गलत आ रहे हैं। इसलिए आरटी-पीसीआर टेस्ट की सुविधा बढ़ानी चाहिए।

इस मामले में बड़ी चिंता यह है कि डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी कहां से आएंगे? भारत में मरीजों की बढ़ती संख्या के बाद यह जरूरी हो गया है कि स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या बढ़ाई जाए। ध्यान रहे भारत में एक सौ से ज्यादा डॉक्टरों की कोरोना संक्रमण से मौत हो चुकी है। हाल ही में दिल्ली में 27 साल के डॉक्टर जोगेंदर की मौत हुई है। इससे यह मिथक भी टूट रहा है कि नौजवान लोगों को खतरा नहीं है। इसलिए सरकार को डॉक्टरों को सुरक्षित रखते हुए उनकी संख्या बढ़ानी होगी। रिटायर डॉक्टरों और आखिरी वर्ष के मेडिकल के छात्रों की सेवाएं ली जा रही हैं तो साथ ही इनकी सुरक्षा का भी ख्याल रखना होगा।

जैसा कि नोएडा, मुंबई और कोलकाता में आधुनिक टेस्टिंग सुविधा की शुरुआत करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा था कि खतरा अभी टला नहीं है तो इस बात का ध्यान रखते हुए आगे की रणनीति बननी चाहिए। दिल्ली में मरीजों की कम होती संख्या के बाद निजी अस्पतालों ने कहना शुरू किया है कि अब कुछ कोविड बेड्स को नॉन कोविड बेड्स में बदल दिया जाए। लेकिन अभी ऐसा नहीं करना चाहिए। इन बेड्स को रखते हुए क्रिटिकल केयर सुविधाओं को बढ़ाना चाहिए।

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