नागरिकता रजिस्टर में हिन्दू, मुस्लिम पेंच

जब असम में नागरिकता पहचान की प्रक्रिया शुरू हुई तो देश भर में सवाल उठने लगा कि सिर्फ असम में ही नागरिकता रजिस्टर क्यों बन रहा हैपूरे देश में क्यों नहीं? क्या अमेरिका और यूरोपियन देशों की तरह देश के हर नागरिक को एक पहचान पत्र नहीं मिलना चाहिए जो सभी उद्देश्यों की पूर्ति करता हो? तभी अब मोदी सरकार ने बीड़ा उठाया है कि उनके इसी शासन काल में नागरिकता रजिस्टर बने|

जैसे असम में नागरिकों को अपने भारतीय होने का सबूत देकर नागरिकता पहचान रजिस्टर ( एनआरसी ) में अपना नाम लिखवाना पड़ा है वैसे ही सारे देश में ऐसा होगा। नागरिकता संशोधन बिल उस का पहला कदम है ताकि पहले घुसपैठियों और शरणार्थियों की पहचान हो जाए। शरणार्थियों को नागरिकता देने की प्रक्रिया शुरू हो जाए उस के बाद अगले साल नागरिकता पहचान रजिस्टर का बिल पास होगा , ताकि अगली कोई सरकार आधार कार्ड की तरह उसे चुनौती न दे सके।

असम में एनआरसी पहली बार नहीं बना है। असम में बाहरी लोगों की पहचान के लिए 1951 में नागरिकता रजिस्टर बना था| यहां यह जान लेना ज़रूरी है कि 1905 में जब अंग्रेजों ने बंगाल का विभाजन किया, तब पूर्वी बंगाल और असम के रूप में एक नया प्रांत बनाया गया था| जब देश का बंटवारा हुआ तो ये डर भी पैदा हो गया था कि असम का यह क्षेत्र कहीं पूर्वी पाकिस्तान के साथ जोड़कर भारत से अलग न कर दिया जाए। तब असम को भारत के साथ रखने के लिए गोपीनाथ बारडोली की अगुवाई में आन्दोलन हुआ जो सफल रहा , असम को भारत में शामिल किया गया , लेकिन उस का सिलहट इलाका पूर्वी पाकिस्तान में चला गया।

दरअसल अंग्रेजों के जमाने में चाय बागानों में काम करने और खाली पड़ी जमीन पर खेती करने के लिए बिहार और बंगाल के लोग असम जाते रहते थे। वहां के स्थानीय लोगों का तभी से बाहरी लोगों का विरोध रहता था| 50 के दशक में बाहरी लोगों का असम आना राजनीतिक मुद्दा बनने लगा था, उधर आजादी के बाद तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान और बाद के बांग्लादेश से भी असम में घुसपैठ होने लगी जिसे लेकर आवाज उठने लगी थी, इसलिए 1951 की जनगणना के बाद स्थानीय लोगों का रजिस्टर तैयार हुआ था और इसमें तब के असम के रहने वाले लोगों को शामिल किया गया था।

हालात तब ज्यादा खराब हुए जब पूर्वी पाकिस्तान यानी बांग्लादेश में भाषा विवाद को लेकर आंतरिक संघर्ष शुरू हुआ , उस समय पूर्वी पाकिस्तान में परिस्थितियां इतनी हिंसक हो गई कि वहां रहने वाले हिन्दुओं की बड़ी आबादी ने भारत में घुसपैठ शुरू कर दी। माना जाता है कि 1971 में जब पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना ने दमनकारी कार्रवाई शुरू की तो करीब 10 लाख हिन्दुओं और मुस्लिमों ने बांग्लादेश सीमा पारकर असम में शरण ली। बांग्लादेश अलग राष्ट्र बन जाने के बाद कम से कम बांग्ला भाषी मुस्लिम घुसपैठियों को वापस भेजा जाना चाहिए था क्योंकि उन पर जातीय और भाषाई आधार पर उत्पीडन करने वाले पाकिस्तान का शाषण खत्म हो गया था , और बांग्ला भाषी नए मुस्लिम देश का उदय हो गया था।

उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कहा था कि शरणार्थी चाहे किसी भी धर्म के हों उन्हें वापस जाना होगा। लेकिन इंदिरा गांधी ने किया इसके उल्ट मुस्लिम घुसपैठियों को संरक्षण दे कर अपना वोट बैंक बना लिया। जिसके खिलाफ पिछले पचास साल से देश भर में आन्दोलन चल रहा है। अब जब 2019 में एनआरसी के आंकड़े सामने आए तो पता चला कि जितने अवैध घुसपैठिए मुस्लिम हैं , उतने ही हिन्दू भी हैं , जो बांग्लादेश की धार्मिक असहिष्युणता के कारण वहां से जान बचा कर भाग आने को मजबूर हुए।

मोदी सरकार ने हिंदुओं को शरणार्थी और मुसलमानों को घुसपैठिए मानने की अलग अलग परिभाषा तय की और इस सम्बन्ध में जनवरी 2019 में लोकसभा में बिल पास करवाया गया , लेकिन यह बिल राज्यसभी से पास नहीं हुआ था| अलग अलग परिभाषा के कारण असम गण परिषद ने भाजपा से गठबंधन खत्म कर दिया था , हालांकि लोकसभा चुनावों में वह दुबारा भाजपा के साथ आ गई।

अब जब कि मोदी सरकार ने दुबारा उसी तरह का बिल केबिनेट से पास किया है तो असम गण परिषद के भाजपा की असम सरकार से समर्थन वापस लेने के अलावा सिक्किम , मणिपुर , मेघालय और नगालैंड में भी आक्रोश की खबरे हैं। कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, एनसीपी , सपा , बसपा और वामपंथी धार्मिक आधार पर घुसपैठियों की अलग अलग पहचान बनाने के खिलाफ हैं , लेकिन हाल ही में इस सेक्यूलर खेमे में गई शिवसेना ने बिल का समर्थन किया है।

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