चिंताओं का निवारण जरूरी

संसद में इन दिनों एक महत्त्वपूर्ण विधेयक पर चर्चा चल रही है। सरोगेसी (विनियमन) विधेयक लोकसभा से पारित हो चुका है और अब राज्यसभा की एक समिति उसका अध्ययन कर रही है। विधेयक का मूल उद्देश्य है व्यावसायिक सरोगेसी यानी पैसों के लिए कोख को किराए पर देने पर रोक लगाना। इस साल जुलाई में यह बिल लोकसभा में पेश किया था। इसमें परोपकारी कारणों से की गई सरोगेसी की इजाजत है, जिसमें पैसों की लेन-देन शामिल ना हो। ऐसे मामलों में सरोगेट मां जिन्हें बच्चा देगी, वो उसका करीबी रिश्तेदार होने चाहिए। विधेयक में दी गई परिभाषा के अनुसार सरोगसी ऐसी व्यवस्था है, जिसके तहत एक महिला माता पिता बनने के इक्छुक किसी दंपति के लिए बच्चे को जन्म देती है और जन्म के बाद बच्चे को उन्हें ही सौंप देती है। सरोगेट मां और बच्चे के होने वाले माता-पिता के लिए कुछ शर्तें रखी गई हैं। दंपति के पास अनिवार्यता का प्रमाण पत्र होना चाहिए, जिसके लिए कुछ जरूरी शर्तें हैं।

जिला स्तर पर गठित बोर्ड से माता या पिता या दोनों की इनफर्टिलिटी का प्रमाण पत्र, बच्चे की कस्टडी और माता-पिता के बारे में जानकारी देता मजिस्ट्रेट की अदालत से जारी किया हुआ निर्देश, और सरोगेट मां के लिए 16 महीनों के बीमा का खर्च निकल सके। इसके लिए पात्रता का प्रमाण पत्र भी अनिवार्य होगा और जिसके लिए कुछ दूसरी शर्तों को पूरा करना जरूरी है। पहला तो यह कि दंपति भारतीय नागरिक होना चाहिए और उसे पांच साल से विवाहित होना चाहिए। मगर बिल के कई प्रावधानों पर विवाद है। इस वजह से इसका विरोध हो रहा है। दंपति के विवाहित होने की अनिवार्यता का मतलब है विधवाएं, तलाकशुदा लोग, सिंगल मां-बाप, लिव इन में रहने वाले लोग और समलैंगिक दंपति सरोगेसी का रास्ता नहीं अपना सकेंगे। साथ ही करीबी रिश्तेदार होने की अनिवार्यता का गलत इस्तेमाल हो सकता है। घर की किसी महिला को जबरन इसके लिए राजी कराया जा सकता है। कुछ लोगों का कहना है कि इस से भविष्य में परिवार के अंदर संपत्ति के उत्तराधिकार को लेकर विवाद भी हो सकते हैं। इतना ही नहीं इनफर्टिलिटी के अलावा भी सरोगेसी के और कारण हो सकते हैं। ये आरोप भी है कि सरकार इस बिल के जरिए अपनी कंजरवेटिव विचारधारा को थोप रही है। अतः ये आवश्यक है कि बिल पास कराने के पहले सरकार सबकी चिंताओं पर गौर करे।

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