विश्वामित्र: राजर्षि से ब्रह्मर्षि वाले एकमात्र ऋषि
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विश्वामित्र: राजर्षि से ब्रह्मर्षि वाले एकमात्र ऋषि

पुरुषार्थ, सच्ची लगन, उद्यम और तप की गरिमा के प्रतिमान महर्षि विश्वामित्र ने अपने पुरुषार्थ से, अपनी तपस्या के बल से क्षत्रियत्व से ब्रह्मत्व पद अर्थात राजर्षि से ब्रह्मर्षि पद प्राप्त करने के कारण ही वे देवताओं और ऋषियों के लिए पूज्य बन गए और सप्तर्षियों में अन्यतम स्थान प्राप्त कर सबके लिये वे वन्दनीय भी बन गये। इन्हें अपनी समाधिजा प्रज्ञा से अनेक मन्त्रस्वरूपों का दर्शन हुआ। यही कारण है कि वे मन्त्रद्रष्टा ऋषि कहलाते हैं। pitru paksha 2021 shraaddh

श्राद्ध पक्ष में पूर्वजों को नमन-2  संदेह नहीं कि पुरातन भारतीय वाङ्मय के पूर्ण पुरुष, तपस्वी, साधक, रागी, विरागी युगद्रष्टा महर्षि विश्वामित्र मात्र पौराणिक आख्यान नहीं, वरण अपने कर्मपथ पर चलकर जीवन के सर्वोच्च लक्ष्य पर विजय प्राप्त करने वाले वह चरित्र नायक हैं, जिनका जीवन चरित प्रत्येक उस व्यक्ति के लिए प्रकाश स्तम्भ है, जो जीवन के प्रत्येक बाधा को पार कर असीम पथ का अभिलाषी है। भारतीय पुराण साहित्य के अद्वितीय चरित्र विश्वामित्र ने राजा के रूप में राज्य विस्तार किया, साधक के रूप में साधना की और राजर्षि पद से ब्रह्मर्षि पद पाकर एकमात्र तपस्वी व्यक्तित्व के शक्तिशाली ऋषि बन सप्तर्षियों में शामिल हो सबके लिए वन्दनीय हो गये। दशरथ पुत्र श्रीराम को राक्षसत्व के नाश के लिए तैयार करने वाला गुरु और एक अखण्ड आर्यावर्त का आलोकित सूर्य ऋषि विश्वामित्र ब्राह्मणत्व की प्राप्ति के पूर्व बड़े पराक्रमी और प्रजावत्सल नरेश थे। प्रजापति के पुत्र कुश, कुश के पुत्र कुशनाभ, कुशनाभ के पुत्र राजा गाधि और राजा गाधि के पुत्र विश्वामित्र थे।

विश्वामित्र के जन्म अर्थात आविर्भाव की कथा महाभारत अनुशासन पर्व के दानधर्म पर्व के अंतर्गत अध्याय 4 के साथ  विभिन्न पुराणों में अंकित है। पुरातन ग्रन्थों में विश्वामित्र के जन्म के विषय में दो प्रकार के उल्लेख मिलते हैं। पौराणिक आख्यानों के अनुसार इनका वंश, प्रजापति से प्रारम्भ माना जाता है जिसमें प्रजापति-कुश-कुश-नाभ -गाधि (गाथिन) और फिर विश्वामित्र। इसी प्रसंग में विश्वामित्र का साधना से पहले का नाम विश्वरथ माना गया है। वंश की दूसरी परम्परा में सबसे पहले इशीरथ, फिर कुशिक, फिर गाथिन और फिर विश्वामित्र। उनकी जन्म से सम्बन्धित कथा वैचित्र्यता से भरी कथा पृथक है। विश्वामित्र अर्थात विश्वरथ सौ पुत्रों के पिता थे। धनुर्विद्या में पारंगत विश्वामित्र कई महत्वपूर्ण ग्रन्थों के रचयिता भी थे। उनकी प्रसिद्ध रचनाएँ विश्वामित्रकल्प, विश्वामित्रसंहिता, विश्वामित्रस्मृति आदि हैं। वसिष्ठ ऋषि से कामधेनु माँगना, अप्सरा मेनका से प्रेम, त्रिशंकु की स्वर्ग जाने की इच्छा आदि उनके जीवन की प्रसिद्ध घटनाएँ सहस्त्राब्दियों से ही लोगों के लिए कौतुहल का विषय रही हैं ।

ऐतरेय ब्राह्मण आदि में  हरिश्चन्द्र के आख्यान में महर्षि विश्वामित्र की महिमा का वर्णन अंकित है।ऋग्वेद के तृतीय मण्डल में 30, 33 तथा 53वें सूक्त में अंकित विश्वामित्र के परिचयात्मक विवरण से वे कुशिक गोत्रोत्पन्न कौशिक ही सिद्ध होते हैं। ऋग्वेद 53वें सूक्त के 9वें मन्त्र से ज्ञात होता है कि महर्षि विश्वामित्र अतिशय सामर्थ्यशाली, अतीन्द्रियार्थद्रष्टा, देदीप्यमान तेजों के जनयिता और अध्वर्यु आदि में उपदेष्टा हैं तथा राजा सुदास के यज्ञ के आचार्य रहे हैं। उल्लेखनीय है कि ऋग्वेद के दस मण्डलों में तृतीय मण्डल के बासठ  62 सूक्तों के द्रष्टा ऋषि के रूप में जहाँ विश्वामित्र की प्रसिद्धि है, वहीं वसिष्ठ द्वारा कामधेनु न देने पर उनसे युद्ध और फिर पराजय उनके जीवन की मुख्य अपकीर्तियों में गिनी जाती हैं । मान्यता है कि तपस्या के धनी विश्वामित्र को गायत्री-माता सिद्ध होने और इनकी पूर्ण कृपा प्राप्त होने के कारण ही नवीन सृष्टि तथा त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग आदि भेजने और ब्रह्मर्षि पद प्राप्त करने जैसे असम्भव कार्य विश्वामित्र ने सिद्ध किये।

पुरुषार्थ, सच्ची लगन, उद्यम और तप की गरिमा के प्रतिमान महर्षि विश्वामित्र ने अपने पुरुषार्थ से, अपनी तपस्या के बल से क्षत्रियत्व से ब्रह्मत्व पद अर्थात राजर्षि से ब्रह्मर्षि पद प्राप्त करने के कारण ही वे देवताओं और ऋषियों के लिए पूज्य बन गए और सप्तर्षियों में अन्यतम स्थान प्राप्त कर सबके लिये वे वन्दनीय भी बन गये। इन्हें अपनी समाधिजा प्रज्ञा से अनेक मन्त्रस्वरूपों का दर्शन हुआ। यही कारण है कि वे मन्त्रद्रष्टा ऋषि कहलाते हैं। इन्द्र, अदिति, अग्निदेव, उषा, अश्विनी तथा ऋभु आदि देवताओं की स्तुतियों और अनेक ज्ञान-विज्ञान, अध्यात्म तथा गौ-महिमा के वर्णनों से युक्त तृतीय मण्डल के बासठ सूक्तों के द्रष्टा ऋषि विश्वामित्र के होने के कारण तृतीय मण्डल वैश्वामित्र -मण्डल कहलाता है। इसके साथ ही प्रथम, नवम तथा दशम मण्डल की कतिपय ऋचाओं के द्रष्टा विश्वामित्र के मधुच्छन्दा आदि अनेक पुत्र हुए हैं। तृतीय मण्डल के बासठवें सूक्त के 10 वें मन्त्र में अंकित ब्रह्म-गायत्री के मूल मन्त्र को सभी वेदमन्त्रों का मूल अर्थात बीज माना जाता है, और इसी मन्त्र से सभी मन्त्रों का प्रादुर्भाव हुआ माना जाता है। यही कारण है कि गायत्री पंथ वाले गायत्री को वेदमाता कहते मानते हैं।

श्राद्ध पक्ष में पूर्वजों को नमन-1 ऋषि वसिष्ठः विराट व सचमुच विशिष्ठ

सनातन परम्परा के जीवन में अनन्य रूप से अनुस्यूत व अन्यतम महिमा प्राप्त यह मन्त्र उपनयन-संस्कार, गुरुमुख द्वारा द्विजत्व प्राप्त करने और नित्य-सन्ध्याकर्म में मुख्य रूप से प्राणायाम, सूर्योपस्थान आदि द्वारा गायत्री-मन्त्र जप सिद्धि में प्रयुक्त होता है । गायत्री-मन्त्र को महर्षि विश्वामित्र का देन और वे इसके आदि आचार्य माने जाते हैं। इन्होंने गायत्री-साधना तथा दीर्घकालीन संध्योपासना की तपः शक्ति से काम-क्रोधादि विकारों पर विजय प्राप्त कर तपस्या के आदर्श बन गये। इसलिए गायत्री-उपासना में इनकी कृपा प्राप्त करना भी आवश्यक माना जाता है। इनके आविर्भाव दिवस कार्तिक शुक्ल द्वितीया को इनकी विशेष पूजा का विधान किया गया है। महर्षि के रूप में वैदिक मन्त्रों के माध्यम से ही गायत्री-उपासना पर बल देते हुए उन्होंने अन्य अनेक ग्रन्थों का प्रणयन किया, उनमें भी मुख्य रूप से गायत्री-साधना का ही उपदेश प्राप्त होता है। उनके मुख्य ग्रन्थ विश्वामित्रस्मृति, विश्वामित्रकल्प आदि में भी सर्वत्र गायत्री की आराधना का वर्णन करते हुए यह निर्देश दिया गया है कि अपने अधिकारानुसार गायत्री-मन्त्र के जप से सभी सिद्धियाँ तो प्राप्त हो ही जाती हैं। तपस्या के धनी विश्वामित्र को गायत्री-माता सिद्ध थीं और इनकी पूर्ण कृपा इन्हें प्राप्त होने के कारण ही इन्होने नवीन सृष्टि तथा त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग आदि भेजने और ब्रह्मर्षि पद प्राप्त करने-सम्बन्धी जो भी असम्भव कार्य किये।

वाल्मीकि रामायण, महाभारत और विविध पुराणों तथा अनेक ग्रन्थों में अनेक प्रकार से विश्वामित्र की कथा का उल्लेख अंकित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार विश्वामित्र और वशिष्ठ का नन्दिनी को लेकर संघर्ष और विश्वामित्र का त्रिशंकु को सदेह देवलोक में भेजने का प्रयास तथा विश्वामित्र का राम को लेकर वन में राक्षसों के वध की भूमिका तैयार करना और तपस्या करते हुए इन्द्र के द्वारा भेजी गई मेनका के साथ संसर्ग के उपरांत शकुन्तला नामक एक कन्या का जन्म होना, जिसे बाद में कण्व ऋषि ने पाला, आदि विश्वामित्र से सम्बन्धित कथाएं लोकख्यात हैं। इसी शकुन्तला से कण्व के आश्रम में राजा दुष्यन्त ने गन्धर्व विवाह किया। जिससे भरत नामक वीरपुत्र पैदा हुआ। विश्वामित्र से सम्बन्धित इन महत्त्वपूर्ण घटनाओं के क्रम में बहुत कुछ असमानताएं हैं। बहुत लम्बी कालावधि में विश्वामित्र से सम्बन्धित अतिरंजित घटनाओं व एक दूसरे से गड्डमड्ड हुई कथाओं से भरी पड़ी आख्यानों के समीचीन अध्ययन से स्पष्ट होता है कि यह किसी एक व्यक्ति से सम्बन्धित विवरणी नहीं हो सकती, फिर भी कुछ विद्वान इन सब कथाओं को एक व्यक्ति विश्वामित्र से ही सम्बन्धित मानते हुए कहते हैं कि यह विश्वामित्र एक ही, थे जो समय के इतने अन्तराल तक इन घटनाओं के साथ जीवित रहे।

फिर भी विश्वामित्र से सम्बन्धित इन विवरणियों के समीचीन अध्ययन व अनुसंधान और तर्क की कसौटी पर कसने से स्पष्ट होता है कि यह एक व्यास पीठ रही होगी और उस पर बैठने वाला प्रत्येक ऋषि विश्वामित्र के नाम से अभिहित होता होगा। क्योंकि पौराणिक सन्दर्भों में कहीं वशिष्ठ का प्रसंग आता है और कहीं विश्वामित्र का। कहीं-कहीं पर तो दोनों नाम भी दिए गए हैं क्योंकि हरिश्चन्द्र कालीन विश्वामित्र हो सकता है सत्यव्रत त्रिशंकु तक चला हो और इसी का वशिष्ठ के साथ संघर्ष हुआ हो। इसी प्रसंग में विश्वामित्र का वर्णान्तर भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि एक क्षत्रिय राजा शस्त्र-बल से अपना प्राप्य न पाकर तपस्या के बल पर ब्रह्मत्व पद प्राप्त करता है। पौराणिक ग्रन्थों में अंकित विश्वामित्र की सम्पूर्ण कथा में संघर्ष की एक ऐसी प्रदीप्ति है जिसे सिर्फ अपने अन्तर-सत्य के रूप में अनुभव किया जा सकता है। अपने भीतर बैठे हुए अहंकार का विसर्जन और त्याग के चरमोत्कर्ष की प्रतिष्ठा तथा अपने प्राप्य को पाने के लिए सर्वस्व लगा देने की दृढ़ भावना विश्वामित्र के चरित्र से अनुभव की जा सकती है।

ध्यातव्य है कि वशिष्ठ से कामधेनु को मांगने से लेकर प्रारम्भ हुई उनकी लड़ाई तीन चरणों में वशिष्ठ के सौ पुत्रों की हत्या पर जाकर समाप्त हुई । पहली लड़ाई में तो वशिष्ठ की नन्दिनी नाम्नी कामधेनु गौ ने ही उनकी सेना को समाप्तप्राय कर दिया था, लेकिन इससे कुपित उनके सौ पुत्र अत्यन्त क्रोधित हो वशिष्ठ को मारने दौड़े। वशिष्ठ ने उनमें से एक पुत्र को छोड़ कर शेष सभी को भस्म कर दिया। अपनी सेना तथा पुत्रों के नष्ट हो जाने से अत्यंत दुखित विश्वामित्र ने अपने एकमात्र शेष पुत्र को राज सिंहासन सौंप कर तपस्या करने के लिए हिमालय की कन्दराओं में चले गये। कठोर तपस्या करके विश्वामित्र ने महादेव को प्रसन्न कर उनसे दिव्य शक्तियों के साथ सम्पूर्ण धनुर्विद्या के ज्ञान का वरदान प्राप्त कर लिया। दूसरी लड़ाई में, धनुर्विद्या में निष्णात हो विश्वामित्र प्रतिशोध वश वशिष्ठ ऋषि के आश्रम में पहुँच उन्हें ललकार कर उन पर अग्नि बाण चला बैठे। अग्नि बाण से समस्त आश्रम में आग लग जाने पर आश्रमवासियों को त्राण दिलाने और ब्रह्मतेज की श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए जब वशिष्ठ ने भी अपना धनुष संभाल लिया तो क्रुद्ध होकर विश्वामित्र ने एक के बाद एक आग्नेयास्त्र, वरुणास्त्र, रुद्रास्त्र, ऐन्द्रास्त्र तथा पाशुपतास्त्र आदि सहस्त्रों भयंकर व मारक आग्नेयास्त्रों का प्रयोग कर दिया। इस पर वशिष्ठ ने उन सबको नष्ट करने के लिए क्रोधवश ब्रह्मास्त्र ही छोड़ दिया। ब्रह्मास्त्र के भयंकर ज्योति और गगनभेदी नाद से सारा संसार पीड़ा से तड़पने लगा। ऋषि-मुनि उनसे प्रार्थना करने लगे कि आपने विश्वामित्र को परास्त कर दिया है। अब आजप ब्रह्मास्त्र से उत्पन्न हुई ज्वाला को शान्त करें। इस प्रार्थाना से द्रवित होकर उन्होंने ब्रह्मास्त्र को वापस बुलाया और मन्त्रों से उसे शान्त किया।

ब्रह्मबल से पराजित विश्वामित्र ब्रहम पद की उपाधि धारण कर ब्रह्मतेज प्राप्ति के उद्देश्य से तपस्या के लिए दक्षिण की जंगल में पत्नी सहित चले गए, तो उनका पाला मेनका नामक अप्सरा से पड़ा और वे मेनका के प्रेम में डूब गए। लम्बी अवधि पश्चात इसका भान होने पर उन्हें अत्यंत पश्चाताप हुआ और वे पुनः कठोर तपस्या में डूब गए, परन्तु काम के बाद पुनः क्रोध ने भी विश्वामित्र को पराजित किया। कथा के अनुसार राजा त्रिशंकु की सदेह स्वर्ग जानेकी इच्छा की पूर्ति हेतु आयोजित की गई कामनात्मक यज्ञ को प्रकृति के नियमों के विरुद्ध होने के कारण वसिष्ठ ने सम्पन्न कराने से इन्कार कर दिया, तो वसिष्ठ से अपने पुराने बैर को स्मरण करके विश्वामित्र ने उनका यज्ञ कराना स्वीकार कर लिया। यज्ञ की समाप्ति पर यज्ञाहुति ग्रहण करने के लिए सभी ऋषि इस यज्ञ में आये, किन्तु वसिष्ठ के सौ पुत्र नहीं आये तो क्रोध के वशीभूत होकर विश्वामित्र ने उन्हें मार डाला। वशिष्ठ से उनकी इस एकतरफा तृतीय युद्ध में हुई व्यर्थ जनहानि से उन्हें अपनी भयंकर भूल का ज्ञान होने पर विश्वामित्र ने पुनः तप किया और क्रोध पर विजय करके ब्रह्मर्षि हुए। अन्त में सर्वस्व त्याग कर वे अनासक्त पथ के पथिक बन जगद्वन्द्य हो गये। ब्रह्मा ने स्वयं उपस्थित होकर उन्हें सत्कारपूर्वक ब्रह्मर्षिपद प्रदान किया। महर्षि वसिष्ठ ने उनकी महिमा का स्थापन किया और उन्हें हृदय से लगा लिया। दो महान संतों का अद्भुत मिलन पर देवताओं ने पुष्पवृष्टि की।

विश्वामित्र  को भगवान श्रीराम का दूसरा गुरु होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। रावण के द्वारा नियुक्त ताड़का, सुबाहु और मारीच आदि राक्षसों के द्वारा दंडकारण्य में विश्वामित्र के यज्ञ में विघ्न डाले जाने पर यज्ञ रक्षा के लिए विश्वामित्र श्रीराम को दशरथ से माँग ले गए और उन्हें अपनी समस्त विद्याएँ प्रदान कीं। श्रीराम ने यज्ञ की रक्षा की, और विश्वामित्र ने उनका मिथिला में श्री सीता से विवाह सम्पन्न कराया। गुरु रूप में विश्वामित्र ने सभी शास्त्रों तथा धनुर्विद्या के आचार्य श्रीराम को बला, अतिबला आदि विद्याएँ प्रदान कीं, सभी शास्त्रों का ज्ञान प्रदान किया और भगवान श्रीराम के जीवन की कई महत्वपूर्ण कार्यों के मूल-प्रेरक तथा लीला-सहचर भी बने। सत्यधर्म के आदर्श राजर्षि हरिश्चन्द्र महर्षि विश्वामित्र की दारुण परीक्षा के वृत्तांत में महर्षि अत्यन्त निष्ठुर प्रतीत होते हैं। महर्षि ने हरिश्चन्द्र को सत्यधर्म की रक्षा का आदर्श बनाने तथा उनकी कीर्ति को सर्वश्रुत एवं अखण्ड बनाने के पूर्व उनकी कठोर परीक्षा ली, और अन्त में उन्होंने उनके पुत्र रोहिताश्व को जीवित करने के साथ ही उनका राजैश्वर्य उन्हें लौटा दिया। आजीवन पुरुषार्थ और तपस्या के मूर्तिमान प्रतीक महर्षि विश्वामित्र सप्तऋषि मण्डल में ये आज भी विद्यमान हैं। ऐसे महान पुरुष को श्राद्ध पक्ष में सादर नमन ।

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